प्रश्न 01 : मुद्रा की पूर्ति की माप से सम्बन्धित विभिन्न अवधारणाओं का वर्णन कीजिए।
परिचय
मुद्रा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार होती है। आज के समय में वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री, वेतन का भुगतान, व्यापार, बचत और निवेश जैसे सभी आर्थिक कार्य मुद्रा के माध्यम से किए जाते हैं। इसलिए यह जानना बहुत आवश्यक होता है कि किसी निश्चित समय पर देश में कुल कितनी मुद्रा उपलब्ध है। इसी को मुद्रा की पूर्ति (Money Supply) कहा जाता है।
मुद्रा की पूर्ति का सही आकलन सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसी के आधार पर मौद्रिक नीति बनाई जाती है, महँगाई को नियंत्रित किया जाता है और आर्थिक विकास की दिशा तय की जाती है। भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रा की पूर्ति को मापने के लिए M1, M2, M3 और M4 नामक विभिन्न अवधारणाओं का उपयोग करता है। यहाँ M का अर्थ Money (मुद्रा) होता है। इन अवधारणाओं के माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि देश में कुल कितनी मुद्रा प्रचलन में है।
मुद्रा की पूर्ति का अर्थ
मुद्रा की पूर्ति से आशय किसी निश्चित समय पर जनता के पास उपलब्ध कुल मुद्रा से है। इसमें लोगों के पास मौजूद नकद धन, बैंकों में जमा धन तथा डाकघरों में जमा कुछ प्रकार की राशि शामिल होती है। सरल शब्दों में, जनता के पास खर्च करने या आवश्यकता पड़ने पर उपयोग करने योग्य कुल धनराशि को मुद्रा की पूर्ति कहा जाता है।
मुद्रा की पूर्ति की माप की आवश्यकता
आर्थिक गतिविधियों का आकलन करने के लिए
मुद्रा की मात्रा से यह पता चलता है कि देश में व्यापार, उद्योग और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ किस प्रकार चल रही हैं। यदि बाजार में पर्याप्त मुद्रा उपलब्ध होगी तो आर्थिक गतिविधियाँ भी अच्छी रहेंगी।
महँगाई को नियंत्रित करने के लिए
यदि बाजार में आवश्यकता से अधिक मुद्रा पहुँच जाती है, तो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ने लगती हैं। वहीं यदि मुद्रा कम हो जाए तो व्यापार और निवेश पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए मुद्रा की सही मात्रा का पता होना आवश्यक है।
मौद्रिक नीति बनाने के लिए
भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रा की पूर्ति के आँकड़ों के आधार पर ब्याज दर, रेपो दर, नकद आरक्षित अनुपात (CRR) तथा अन्य मौद्रिक नीतियों का निर्धारण करता है।
आर्थिक विकास के लिए
उचित मात्रा में मुद्रा उपलब्ध होने से व्यापार बढ़ता है, उद्योगों का विस्तार होता है, निवेश बढ़ता है और रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
मुद्रा की पूर्ति की माप से सम्बन्धित विभिन्न अवधारणाएँ
1. M1 (संकुचित मुद्रा या Narrow Money)
M1 मुद्रा की पूर्ति का सबसे संकीर्ण तथा सबसे अधिक तरल (Liquid) माप है। इसमें केवल वही धन शामिल किया जाता है जिसका उपयोग तुरंत भुगतान करने के लिए किया जा सकता है।
M1 में निम्नलिखित शामिल होते हैं—
- जनता के पास उपलब्ध नकद मुद्रा।
- बैंकों के चालू खाते तथा बचत खाते की माँग जमा (Demand Deposits)।
- भारतीय रिज़र्व बैंक में अन्य जमा।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति के पास नकद धन है या उसके बचत खाते में ऐसी राशि है जिसे वह कभी भी निकाल सकता है, तो वह M1 का भाग मानी जाएगी।
2. M2
M2, M1 से थोड़ा व्यापक माप है। इसमें M1 के साथ डाकघर के बचत खातों में जमा राशि को भी शामिल किया जाता है।
अर्थात—
M2 = M1 + डाकघर के बचत खातों की जमा राशि
इस अवधारणा से मुद्रा की पूर्ति का अधिक व्यापक अनुमान लगाया जाता है, क्योंकि इसमें बैंकों के साथ-साथ डाकघर की बचत भी शामिल होती है।
3. M3 (व्यापक मुद्रा या Broad Money)
M3 भारत में मुद्रा की पूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक प्रचलित माप है। भारतीय रिज़र्व बैंक सामान्यतः इसी अवधारणा का उपयोग करता है।
M3 में M1 के साथ बैंकों की समय जमा (Time Deposits) भी शामिल होती है। समय जमा का अर्थ है वह राशि जो निश्चित अवधि के लिए बैंक में जमा की जाती है, जैसे फिक्स्ड डिपॉज़िट (FD)।
M3 = M1 + बैंकों की समय जमा
यद्यपि समय जमा को तुरंत नहीं निकाला जा सकता, फिर भी यह अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग होती है। इसलिए M3 को मुद्रा की पूर्ति का सबसे विश्वसनीय माप माना जाता है।
4. M4
M4 मुद्रा की पूर्ति की सबसे व्यापक अवधारणा है। इसमें M3 के साथ डाकघरों की कुल जमा राशि को भी शामिल किया जाता है। हालांकि राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (NSC) जैसी कुछ विशेष बचत योजनाओं को इसमें शामिल नहीं किया जाता।
M4 = M3 + डाकघरों की कुल जमा राशि
यह अवधारणा देश में उपलब्ध कुल मुद्रा का सबसे विस्तृत चित्र प्रस्तुत करती है।
मुद्रा की पूर्ति की विभिन्न अवधारणाओं का महत्व
मौद्रिक नीति को प्रभावी बनाना
मुद्रा की पूर्ति की सही जानकारी मिलने से भारतीय रिज़र्व बैंक उचित मौद्रिक नीति बना सकता है और अर्थव्यवस्था को संतुलित बनाए रख सकता है।
महँगाई और मंदी पर नियंत्रण
यदि मुद्रा की मात्रा आवश्यकता से अधिक या कम हो जाए तो उसके अनुसार आवश्यक कदम उठाकर महँगाई और मंदी जैसी समस्याओं पर नियंत्रण किया जा सकता है।
बैंकिंग व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना
इन अवधारणाओं से बैंकों में जमा राशि का सही आकलन किया जाता है, जिससे बैंकिंग व्यवस्था अधिक व्यवस्थित और मजबूत बनती है।
आर्थिक विकास में सहायता
मुद्रा की पर्याप्त उपलब्धता से व्यापार, उद्योग, निवेश और रोजगार को बढ़ावा मिलता है। इससे देश की आर्थिक प्रगति तेज़ होती है।
आर्थिक निर्णय लेने में सुविधा
सरकार और आर्थिक विशेषज्ञ मुद्रा की पूर्ति के आधार पर बजट, निवेश और विकास योजनाओं से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।
निष्कर्ष
मुद्रा की पूर्ति किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। इसकी सही जानकारी से सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक आर्थिक स्थिति का सही आकलन कर सकते हैं तथा आवश्यक नीतियाँ बना सकते हैं। मुद्रा की पूर्ति को मापने के लिए M1, M2, M3 और M4 जैसी विभिन्न अवधारणाओं का उपयोग किया जाता है। इनमें M1 सबसे संकीर्ण, M2 उससे व्यापक, M3 सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली, तथा M4 सबसे व्यापक अवधारणा है। इन सभी अवधारणाओं की सहायता से देश में उपलब्ध कुल मुद्रा का सही अनुमान लगाया जाता है, जिससे आर्थिक संतुलन बनाए रखने, महँगाई पर नियंत्रण करने तथा आर्थिक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
प्रश्न 02 : मुद्रा स्फीति क्या है? यह कितने प्रकार की होती है? इसको नियंत्रित करने के उपायों की व्याख्या कीजिए।
परिचय
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों का स्थिर रहना बहुत आवश्यक होता है। जब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य लगातार बढ़ने लगते हैं, तब लोगों की क्रय शक्ति कम हो जाती है। अर्थात पहले जितनी राशि में अधिक वस्तुएँ खरीदी जा सकती थीं, अब उतनी ही राशि में कम वस्तुएँ मिलती हैं। इस स्थिति को मुद्रा स्फीति (Inflation) कहा जाता है।
मुद्रा स्फीति एक सामान्य आर्थिक प्रक्रिया है, लेकिन यदि इसकी दर बहुत अधिक हो जाए तो इसका प्रभाव आम जनता, व्यापार, उद्योग तथा पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर इसे नियंत्रित करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाते हैं।
मुद्रा स्फीति का अर्थ
मुद्रा स्फीति वह स्थिति है जिसमें किसी देश में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होती रहती है तथा मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है।
सरल शब्दों में, जब समान राशि से पहले की तुलना में कम वस्तुएँ खरीदी जा सकें, तो उसे मुद्रा स्फीति कहते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि एक वर्ष पहले 100 रुपये में 5 किलोग्राम चीनी मिलती थी और आज 100 रुपये में केवल 4 किलोग्राम चीनी मिलती है, तो इसका अर्थ है कि मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो गई है और मुद्रा स्फीति बढ़ गई है।
मुद्रा स्फीति के प्रकार
1. रेंगती हुई मुद्रा स्फीति (Creeping Inflation)
इस प्रकार की मुद्रा स्फीति में कीमतों में बहुत धीमी गति से वृद्धि होती है। सामान्यतः यह अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक नहीं मानी जाती। नियंत्रित सीमा तक रहने पर यह आर्थिक विकास में सहायक भी हो सकती है।
2. चलती हुई मुद्रा स्फीति (Walking Inflation)
इसमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें सामान्य से अधिक गति से बढ़ने लगती हैं। यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो यह आगे चलकर गंभीर रूप धारण कर सकती है।
3. दौड़ती हुई मुद्रा स्फीति (Running Inflation)
इस स्थिति में कीमतों में तेज़ी से वृद्धि होने लगती है। आम जनता की क्रय शक्ति तेजी से घटती है और जीवन-यापन कठिन होने लगता है। ऐसी स्थिति में सरकार को तुरंत प्रभावी कदम उठाने पड़ते हैं।
4. अत्यधिक या उग्र मुद्रा स्फीति (Hyper Inflation)
यह मुद्रा स्फीति का सबसे गंभीर रूप है। इसमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ती हैं तथा मुद्रा का मूल्य तेजी से घट जाता है। ऐसी स्थिति में लोगों का मुद्रा पर विश्वास भी कम होने लगता है और आर्थिक व्यवस्था प्रभावित होती है।
मुद्रा स्फीति के प्रमुख कारण
मुद्रा की मात्रा में अधिक वृद्धि
यदि अर्थव्यवस्था में आवश्यकता से अधिक मुद्रा आ जाती है, तो लोगों की क्रय शक्ति बढ़ जाती है और वस्तुओं की माँग बढ़ने से कीमतें बढ़ने लगती हैं।
वस्तुओं की कमी
जब वस्तुओं का उत्पादन कम होता है और माँग अधिक रहती है, तब कीमतों में वृद्धि हो जाती है।
जनसंख्या में वृद्धि
जनसंख्या बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं की माँग बढ़ जाती है। यदि उत्पादन उसी गति से न बढ़े तो महँगाई बढ़ सकती है।
उत्पादन लागत में वृद्धि
कच्चे माल, बिजली, ईंधन, मजदूरी तथा परिवहन की लागत बढ़ने पर उत्पादन महँगा हो जाता है, जिससे वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
सरकारी नीतियाँ
कभी-कभी करों में वृद्धि, अधिक सरकारी खर्च या अन्य आर्थिक नीतियों के कारण भी मुद्रा स्फीति बढ़ सकती है।
मुद्रा स्फीति के प्रभाव
क्रय शक्ति में कमी
मुद्रा स्फीति बढ़ने पर समान धनराशि से कम वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं।
निश्चित आय वाले लोगों पर अधिक प्रभाव
वेतनभोगी, पेंशनधारी तथा निश्चित आय वाले लोगों को सबसे अधिक कठिनाई होती है क्योंकि उनकी आय जल्दी नहीं बढ़ती, जबकि खर्च बढ़ जाते हैं।
बचत पर प्रभाव
महँगाई बढ़ने से लोगों की बचत का वास्तविक मूल्य कम हो जाता है।
व्यापार और उद्योग पर प्रभाव
लगातार बढ़ती कीमतों से उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे व्यापार और उद्योग भी प्रभावित होते हैं।
मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उपाय
मौद्रिक उपाय
भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दर बढ़ा सकता है, रेपो दर में परिवर्तन कर सकता है, नकद आरक्षित अनुपात (CRR) बढ़ा सकता है तथा बाजार में मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित कर सकता है। इससे लोगों द्वारा अधिक ऋण लेने की प्रवृत्ति कम होती है और मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण मिलता है।
राजकोषीय उपाय
सरकार अनावश्यक खर्चों में कमी करती है, करों में आवश्यक परिवर्तन करती है तथा बजट के माध्यम से मुद्रा की अधिकता को नियंत्रित करने का प्रयास करती है।
उत्पादन में वृद्धि
यदि वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाया जाए तो बाजार में उनकी उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में स्थिरता आएगी।
आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाना
सरकार आवश्यक वस्तुओं का पर्याप्त भंडारण तथा उचित वितरण सुनिश्चित करती है ताकि कृत्रिम कमी न हो और कीमतें नियंत्रित रहें।
जमाखोरी और कालाबाज़ारी पर रोक
कुछ व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा करके कीमतें बढ़ा देते हैं। सरकार ऐसे लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करके महँगाई को नियंत्रित करती है।
जनजागरूकता बढ़ाना
उपभोक्ताओं को आवश्यकतानुसार ही वस्तुएँ खरीदने तथा अनावश्यक खरीदारी से बचने के लिए जागरूक किया जाता है। इससे भी माँग को संतुलित रखने में सहायता मिलती है।
निष्कर्ष
मुद्रा स्फीति एक ऐसी आर्थिक स्थिति है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होती है तथा मुद्रा की क्रय शक्ति घट जाती है। सीमित स्तर तक मुद्रा स्फीति आर्थिक विकास के लिए लाभदायक हो सकती है, लेकिन अत्यधिक मुद्रा स्फीति देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता दोनों के लिए हानिकारक होती है। इसलिए भारतीय रिज़र्व बैंक और सरकार मौद्रिक उपायों, राजकोषीय उपायों, उत्पादन बढ़ाने, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा जमाखोरी पर रोक लगाने जैसे विभिन्न उपायों के माध्यम से मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो अर्थव्यवस्था में संतुलन बना रहता है और देश का समग्र आर्थिक विकास भी संभव हो पाता है।
प्रश्न 03 : “अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रतिष्ठित सिद्धान्त” की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
परिचय
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का अर्थ है दो या दो से अधिक देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय। आज के समय में कोई भी देश अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं नहीं कर सकता। इसलिए देशों के बीच व्यापार करना आवश्यक हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार क्यों होता है और इससे देशों को क्या लाभ मिलता है, इसे समझाने के लिए अनेक अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न सिद्धान्त दिए हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध सिद्धान्त प्रतिष्ठित सिद्धान्त (Classical Theory of International Trade) है।
इस सिद्धान्त का मुख्य आधार डेविड रिकार्डो (David Ricardo) का तुलनात्मक लाभ सिद्धान्त (Comparative Advantage Theory) है। इस सिद्धान्त में बताया गया है कि प्रत्येक देश को उसी वस्तु का उत्पादन करना चाहिए जिसमें उसे तुलनात्मक लाभ प्राप्त हो और दूसरी वस्तुओं का आयात करना चाहिए। इससे सभी देशों को लाभ होता है। यद्यपि यह सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ हैं। इसलिए इसकी आलोचना भी की जाती है।
प्रतिष्ठित सिद्धान्त का अर्थ
प्रतिष्ठित सिद्धान्त से आशय उस सिद्धान्त से है जो यह बताता है कि विभिन्न देशों के बीच व्यापार का आधार तुलनात्मक लागत (Comparative Cost) होती है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक देश को उन वस्तुओं का उत्पादन करना चाहिए जिन्हें वह दूसरे देशों की तुलना में कम लागत पर बना सकता है। इससे संसाधनों का सही उपयोग होता है और सभी देशों को व्यापार से लाभ मिलता है।
प्रतिष्ठित सिद्धान्त की मुख्य मान्यताएँ
पूर्ण प्रतियोगिता का होना
इस सिद्धान्त में माना गया है कि बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता होती है और किसी भी प्रकार का एकाधिकार नहीं होता।
श्रम ही उत्पादन का मुख्य साधन है
इस सिद्धान्त के अनुसार किसी वस्तु की लागत केवल श्रम पर निर्भर करती है।
देशों के भीतर उत्पादन के साधन गतिशील होते हैं
उत्पादन के साधन एक ही देश के भीतर आसानी से एक उद्योग से दूसरे उद्योग में जा सकते हैं।
देशों के बीच उत्पादन के साधन गतिहीन होते हैं
श्रम और पूँजी एक देश से दूसरे देश में स्वतंत्र रूप से नहीं जा सकते।
परिवहन व्यय नगण्य माना गया है
सिद्धान्त में यह मान लिया गया है कि परिवहन पर होने वाला खर्च बहुत कम या नहीं के बराबर है।
सरकारी हस्तक्षेप नहीं होता
यह सिद्धान्त मुक्त व्यापार (Free Trade) की कल्पना करता है, जिसमें सरकार व्यापार पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाती।
प्रतिष्ठित सिद्धान्त के प्रमुख गुण
विशेषीकरण को बढ़ावा देता है
यह सिद्धान्त प्रत्येक देश को उसी वस्तु का उत्पादन करने की सलाह देता है जिसमें उसे तुलनात्मक लाभ हो। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ती है।
संसाधनों का उचित उपयोग
जब प्रत्येक देश अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन करता है, तो प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है।
उत्पादन लागत में कमी
विशेषीकरण के कारण उत्पादन कम लागत में होता है और वस्तुएँ सस्ती उपलब्ध होती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन
यह सिद्धान्त देशों के बीच व्यापार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे आर्थिक संबंध मजबूत होते हैं।
उपभोक्ताओं को लाभ
व्यापार के माध्यम से लोगों को अधिक विकल्प और बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ उचित कीमत पर प्राप्त होती हैं।
प्रतिष्ठित सिद्धान्त की आलोचना
अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित
इस सिद्धान्त की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसकी अधिकांश मान्यताएँ वास्तविक जीवन से मेल नहीं खातीं। पूर्ण प्रतियोगिता और शून्य परिवहन लागत जैसी स्थितियाँ व्यवहार में संभव नहीं हैं।
केवल श्रम को महत्व देना
यह सिद्धान्त उत्पादन का आधार केवल श्रम को मानता है, जबकि वास्तविकता में पूँजी, भूमि, तकनीक, प्रबंधन और उद्यमिता भी उत्पादन के महत्वपूर्ण साधन हैं।
परिवहन व्यय की उपेक्षा
वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में परिवहन, बीमा और भंडारण पर काफी खर्च होता है। सिद्धान्त इन खर्चों को महत्व नहीं देता।
सरकारी हस्तक्षेप की अनदेखी
आज लगभग सभी देशों में सरकार आयात-निर्यात पर शुल्क, कोटा, सब्सिडी और अन्य नियम लागू करती है। इसलिए मुक्त व्यापार की धारणा पूरी तरह सही नहीं मानी जा सकती।
तकनीकी विकास की उपेक्षा
इस सिद्धान्त में तकनीकी प्रगति और आधुनिक उत्पादन विधियों के प्रभाव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है, जबकि वर्तमान समय में तकनीक व्यापार का महत्वपूर्ण आधार है।
विकासशील देशों के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं
विकासशील देशों को अपने नए उद्योगों की रक्षा के लिए कई बार आयात पर प्रतिबंध या संरक्षण देना पड़ता है। इसलिए यह सिद्धान्त सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं होता।
माँग के पक्ष की उपेक्षा
यह सिद्धान्त मुख्य रूप से उत्पादन लागत पर आधारित है। इसमें उपभोक्ताओं की माँग, पसंद और बाजार की परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।
वास्तविक परिस्थितियों से अंतर
आज के समय में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, विदेशी निवेश, तकनीकी सहयोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करती हैं। इन आधुनिक परिस्थितियों का उल्लेख इस सिद्धान्त में नहीं मिलता।
प्रतिष्ठित सिद्धान्त का महत्व
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की आधारशिला
यह सिद्धान्त अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अध्ययन का प्रारंभिक और महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
विशेषीकरण की भावना को बढ़ावा
इसने देशों को अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन करने और व्यापार बढ़ाने की प्रेरणा दी।
आर्थिक विकास में सहायक
व्यापार बढ़ने से उत्पादन, रोजगार, आय और विदेशी मुद्रा अर्जन में वृद्धि होती है।
आधुनिक सिद्धान्तों का आधार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अनेक आधुनिक सिद्धान्त इसी प्रतिष्ठित सिद्धान्त से प्रेरित होकर विकसित हुए हैं।
निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रतिष्ठित सिद्धान्त अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसने यह स्पष्ट किया कि यदि प्रत्येक देश तुलनात्मक लाभ वाली वस्तुओं का उत्पादन करे और अन्य वस्तुओं का आयात करे, तो सभी देशों को लाभ प्राप्त हो सकता है। इस सिद्धान्त ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि इसकी कई मान्यताएँ आज के समय में पूरी तरह व्यावहारिक नहीं मानी जातीं और इसकी अनेक आलोचनाएँ भी की जाती हैं, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को समझने के लिए यह सिद्धान्त आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। परीक्षा की दृष्टि से यह सिद्धान्त तथा इसकी आलोचनाएँ दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 04 : भुगतान संतुलन क्या है? इसके प्रमुख घटकों की व्याख्या कीजिए।
परिचय
आज के समय में प्रत्येक देश का अन्य देशों के साथ व्यापार, निवेश, सेवाओं का आदान-प्रदान तथा वित्तीय लेन-देन होता है। इन सभी लेन-देन का पूरा हिसाब रखना आवश्यक होता है ताकि यह पता चल सके कि देश में विदेशी मुद्रा का कितना आगमन हुआ और कितना भुगतान विदेशों को किया गया। इसी उद्देश्य से भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BOP) तैयार किया जाता है।
भुगतान संतुलन किसी देश की आर्थिक स्थिति का महत्वपूर्ण सूचक माना जाता है। इसके माध्यम से यह जानकारी मिलती है कि देश की विदेशी मुद्रा की स्थिति कैसी है तथा अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध किस प्रकार चल रहे हैं। सरकार और केंद्रीय बैंक आर्थिक नीतियाँ बनाने में भी भुगतान संतुलन का उपयोग करते हैं।
भुगतान संतुलन का अर्थ
भुगतान संतुलन से आशय किसी निश्चित अवधि, सामान्यतः एक वर्ष, के दौरान किसी देश और अन्य देशों के बीच होने वाले सभी आर्थिक लेन-देन का व्यवस्थित लेखा-जोखा है।
सरल शब्दों में, एक वर्ष के दौरान विदेशों से प्राप्त होने वाली सभी राशियों और विदेशों को किए गए सभी भुगतानों का पूरा विवरण ही भुगतान संतुलन कहलाता है।
भुगतान संतुलन की विशेषताएँ
निश्चित अवधि का विवरण
भुगतान संतुलन हमेशा एक निश्चित अवधि, जैसे एक वर्ष, के लिए तैयार किया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन का लेखा
इसमें केवल विदेशों के साथ किए गए आर्थिक लेन-देन को शामिल किया जाता है।
दोहरी लेखा प्रणाली पर आधारित
भुगतान संतुलन दोहरी लेखा प्रणाली (Double Entry System) के अनुसार तैयार किया जाता है, इसलिए प्रत्येक लेन-देन का दो बार लेखा किया जाता है।
देश की आर्थिक स्थिति का संकेतक
इसके माध्यम से विदेशी व्यापार, विदेशी निवेश तथा विदेशी मुद्रा की स्थिति का पता चलता है।
भुगतान संतुलन के प्रमुख घटक
1. चालू खाता (Current Account)
चालू खाता भुगतान संतुलन का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है। इसमें वस्तुओं और सेवाओं के आयात-निर्यात तथा अन्य चालू लेन-देन का विवरण शामिल किया जाता है।
चालू खाते में मुख्य रूप से निम्नलिखित मदें शामिल होती हैं—
- वस्तुओं का आयात और निर्यात।
- सेवाओं का आयात और निर्यात।
- विदेशों से प्राप्त ब्याज, लाभांश और वेतन।
- विदेशों को किया गया ब्याज, लाभांश और वेतन का भुगतान।
- विदेशों से प्राप्त उपहार, सहायता तथा प्रेषण (Remittances)।
यदि निर्यात का मूल्य आयात से अधिक हो, तो चालू खाते में अधिशेष (Surplus) होता है। यदि आयात अधिक हो, तो चालू खाते में घाटा (Deficit) होता है।
2. पूँजी खाता (Capital Account)
पूँजी खाते में देशों के बीच होने वाले पूँजी संबंधी लेन-देन का विवरण रखा जाता है। यह देश में आने और देश से बाहर जाने वाले निवेश तथा ऋण से संबंधित होता है।
पूँजी खाते में मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल होते हैं—
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)।
- विदेशी संस्थागत निवेश (FII)।
- विदेशों से प्राप्त ऋण।
- विदेशों को दिए गए ऋण।
- विदेशी संपत्तियों की खरीद और बिक्री।
- अन्य पूँजी निवेश।
पूँजी खाते से यह पता चलता है कि देश में विदेशी पूँजी कितनी आ रही है और कितनी बाहर जा रही है।
3. आधिकारिक आरक्षित खाता (Official Reserve Account)
जब चालू खाते और पूँजी खाते में असंतुलन उत्पन्न होता है, तब केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करता है।
इस खाते में निम्नलिखित शामिल होते हैं—
- विदेशी मुद्रा भंडार।
- स्वर्ण भंडार।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से संबंधित आरक्षित निधि।
- विशेष आहरण अधिकार (SDR)।
इस खाते का उद्देश्य भुगतान संतुलन में उत्पन्न असंतुलन को नियंत्रित करना होता है।
भुगतान संतुलन का महत्व
देश की आर्थिक स्थिति का पता चलता है
भुगतान संतुलन से यह जानकारी मिलती है कि देश की विदेशी मुद्रा की स्थिति मजबूत है या कमजोर।
आर्थिक नीति बनाने में सहायता
सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक भुगतान संतुलन के आधार पर आयात-निर्यात, विदेशी निवेश तथा मुद्रा संबंधी नीतियाँ बनाते हैं।
विदेशी व्यापार को बढ़ावा
भुगतान संतुलन के अध्ययन से यह पता चलता है कि किन क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाने की आवश्यकता है।
विदेशी मुद्रा का प्रबंधन
इससे विदेशी मुद्रा भंडार का सही उपयोग और प्रबंधन करने में सहायता मिलती है।
अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध मजबूत होते हैं
भुगतान संतुलन के माध्यम से विभिन्न देशों के साथ आर्थिक संबंधों का सही मूल्यांकन किया जा सकता है।
भुगतान संतुलन में असंतुलन के कारण
आयात में अधिक वृद्धि
यदि किसी देश का आयात लगातार बढ़ता है और निर्यात कम रहता है, तो भुगतान संतुलन में घाटा उत्पन्न हो सकता है।
निर्यात में कमी
विदेशों में माँग कम होने या उत्पादन घटने से निर्यात कम हो जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति घटती है।
विदेशी ऋण का अधिक भुगतान
यदि किसी देश को अधिक विदेशी ऋण चुकाना पड़े, तो भुगतान संतुलन प्रभावित होता है।
वैश्विक आर्थिक संकट
विश्व स्तर पर आर्थिक मंदी, युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं के कारण भी भुगतान संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
भुगतान संतुलन सुधारने के उपाय
निर्यात को बढ़ावा देना
सरकार को ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो अधिक निर्यात कर सकें।
अनावश्यक आयात में कमी
देश में बनने वाली वस्तुओं का अधिक उपयोग करके आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है।
विदेशी निवेश को आकर्षित करना
विदेशी निवेश बढ़ने से देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ता है।
पर्यटन और सेवाओं का विकास
पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी तथा अन्य सेवाओं का विकास करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।
निष्कर्ष
भुगतान संतुलन किसी देश और अन्य देशों के बीच होने वाले सभी आर्थिक लेन-देन का विस्तृत लेखा-जोखा होता है। यह किसी देश की आर्थिक स्थिति, विदेशी व्यापार तथा विदेशी मुद्रा की उपलब्धता का महत्वपूर्ण संकेतक है। इसके प्रमुख घटक चालू खाता, पूँजी खाता तथा आधिकारिक आरक्षित खाता हैं। इन तीनों घटकों के माध्यम से किसी देश की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक स्थिति का सही आकलन किया जाता है। यदि भुगतान संतुलन संतुलित रहता है, तो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और आर्थिक विकास को गति मिलती है। इसलिए भुगतान संतुलन का अध्ययन अर्थशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रश्न 05 : वाणिज्यिक बैंकों द्वारा साख सृजन प्रक्रिया को समझाइए।
परिचय
आधुनिक अर्थव्यवस्था में वाणिज्यिक बैंकों का महत्वपूर्ण स्थान है। पहले बैंक केवल लोगों की जमा राशि को सुरक्षित रखने और ऋण देने का कार्य करते थे, लेकिन आज उनका कार्य इससे कहीं अधिक व्यापक हो गया है। बैंकों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य साख सृजन (Credit Creation) करना है। साख सृजन के माध्यम से बैंक अर्थव्यवस्था में ऋण की उपलब्धता बढ़ाते हैं, जिससे व्यापार, उद्योग, कृषि तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है।
वाणिज्यिक बैंक अपनी कुल जमा राशि का एक भाग अपने पास सुरक्षित रखते हैं और शेष राशि को ऋण के रूप में लोगों को देते हैं। यही प्रक्रिया आगे चलकर नई जमा राशि का निर्माण करती है, जिसे साख सृजन कहा जाता है।
साख सृजन का अर्थ
साख सृजन से आशय उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा वाणिज्यिक बैंक अपनी जमा राशि के आधार पर ऋण प्रदान करके नई साख या नया जमा धन उत्पन्न करते हैं।
सरल शब्दों में, जब बैंक अपनी जमा राशि का एक भाग ऋण के रूप में देकर नई जमा राशि का निर्माण करता है, तो उसे साख सृजन कहते हैं।
साख सृजन की प्रक्रिया
साख सृजन की प्रक्रिया को एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने बैंक में ₹1,00,000 जमा किए।
यदि भारतीय रिज़र्व बैंक के नियमों के अनुसार बैंक को 10% नकद आरक्षित (Cash Reserve) रखना है, तो बैंक ₹10,000 अपने पास सुरक्षित रखेगा और शेष ₹90,000 किसी ग्राहक को ऋण के रूप में दे देगा।
जिस व्यक्ति को ₹90,000 का ऋण मिला, वह इस राशि से भुगतान करेगा। मान लीजिए यह राशि किसी दूसरे व्यक्ति के बैंक खाते में जमा हो जाती है। अब बैंक के पास ₹90,000 की नई जमा आ गई।
इस नई जमा में से बैंक फिर 10% अर्थात ₹9,000 अपने पास रखेगा और शेष ₹81,000 किसी अन्य व्यक्ति को ऋण दे देगा।
यह प्रक्रिया बार-बार चलती रहती है। प्रत्येक बार बैंक कुछ राशि अपने पास सुरक्षित रखता है और बाकी राशि ऋण के रूप में देता है। इस प्रकार एक छोटी-सी प्रारंभिक जमा से कई गुना अधिक साख का निर्माण हो जाता है। इसी प्रक्रिया को साख सृजन प्रक्रिया कहा जाता है।
साख सृजन की मुख्य विशेषताएँ
जमा राशि पर आधारित होती है
साख सृजन की प्रक्रिया तभी संभव होती है जब बैंक के पास पर्याप्त जमा राशि उपलब्ध हो।
बैंक पूरी जमा राशि ऋण के रूप में नहीं देता
बैंक अपनी जमा राशि का एक निश्चित भाग नकद आरक्षित के रूप में अपने पास रखता है और शेष राशि ऋण के रूप में देता है।
नई जमा राशि का निर्माण होता है
जब ऋण की राशि किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में जमा होती है, तो वह बैंक के लिए नई जमा बन जाती है। इसी कारण साख का विस्तार होता है।
अर्थव्यवस्था में मुद्रा की उपलब्धता बढ़ती है
साख सृजन के कारण लोगों को ऋण आसानी से मिलता है, जिससे व्यापार और निवेश में वृद्धि होती है।
साख सृजन के लिए आवश्यक शर्तें
पर्याप्त जमा राशि
यदि बैंक के पास पर्याप्त जमा नहीं होगी, तो वह अधिक ऋण नहीं दे सकेगा।
नकद आरक्षित अनुपात (CRR) का उचित स्तर
यदि नकद आरक्षित अनुपात बहुत अधिक होगा, तो बैंक कम ऋण दे पाएगा और साख सृजन सीमित हो जाएगा।
ऋण की माँग
यदि लोगों को ऋण की आवश्यकता ही नहीं होगी, तो बैंक साख का निर्माण नहीं कर पाएगा।
जनता का बैंकिंग व्यवस्था पर विश्वास
यदि लोगों का बैंकों पर विश्वास होगा, तभी वे अपनी धनराशि बैंक में जमा करेंगे और साख सृजन संभव होगा।
स्थिर आर्थिक स्थिति
आर्थिक स्थिरता होने पर लोग अधिक निवेश करते हैं और ऋण लेने की प्रवृत्ति बढ़ती है, जिससे साख सृजन में वृद्धि होती है।
साख सृजन का महत्व
व्यापार और उद्योग को बढ़ावा
साख सृजन से व्यापारियों और उद्योगपतियों को ऋण आसानी से उपलब्ध होता है, जिससे उत्पादन और व्यापार बढ़ता है।
रोजगार के अवसर बढ़ते हैं
जब उद्योगों और व्यवसायों को ऋण मिलता है, तो नए उद्योग स्थापित होते हैं और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
आर्थिक विकास में सहायता
साख सृजन से निवेश बढ़ता है, उत्पादन में वृद्धि होती है और देश की आर्थिक प्रगति तेज़ होती है।
बचत को प्रोत्साहन
जब लोग अपनी धनराशि बैंक में जमा करते हैं, तो बैंक उसी धन का उपयोग ऋण देने में करता है। इससे बचत और निवेश दोनों को बढ़ावा मिलता है।
मुद्रा की उपलब्धता में वृद्धि
साख सृजन से अर्थव्यवस्था में ऋण के रूप में अतिरिक्त क्रय शक्ति उपलब्ध होती है, जिससे आर्थिक गतिविधियाँ तेज़ होती हैं।
साख सृजन की सीमाएँ
नकद आरक्षित अनुपात अधिक होना
यदि भारतीय रिज़र्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात बढ़ा देता है, तो बैंक कम ऋण दे पाएँगे और साख सृजन घट जाएगा।
ऋण की कम माँग
यदि लोग ऋण लेने में रुचि नहीं दिखाते, तो बैंक चाहकर भी अधिक साख का निर्माण नहीं कर सकते।
आर्थिक मंदी
मंदी के समय लोग निवेश कम करते हैं और बैंक भी सावधानी से ऋण देते हैं, जिससे साख सृजन प्रभावित होता है।
बैंकों की सीमित जमा राशि
यदि बैंकों में जमा कम होगी, तो ऋण देने की क्षमता भी कम होगी।
निष्कर्ष
वाणिज्यिक बैंकों द्वारा साख सृजन आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इस प्रक्रिया में बैंक अपनी जमा राशि का एक भाग सुरक्षित रखकर शेष राशि को ऋण के रूप में देते हैं। यह ऋण आगे चलकर नई जमा राशि का निर्माण करता है और यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है, जिससे अर्थव्यवस्था में साख का विस्तार होता है। साख सृजन व्यापार, उद्योग, कृषि, रोजगार तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है। हालांकि इसकी सफलता जमा राशि, ऋण की माँग, नकद आरक्षित अनुपात तथा आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए साख सृजन किसी भी देश के आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01 : मुद्रा की परिभाषा दीजिए। मुद्रा के विभिन्न कार्यों की विवेचना कीजिए।
परिचय
मानव जीवन में मुद्रा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। आज के समय में वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री, वेतन का भुगतान, बचत, निवेश तथा व्यापार जैसे सभी आर्थिक कार्य मुद्रा के माध्यम से ही किए जाते हैं। यदि मुद्रा न होती, तो लोगों को वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) का सहारा लेना पड़ता, जिसमें अनेक कठिनाइयाँ थीं। इन्हीं कठिनाइयों को दूर करने के लिए मुद्रा का विकास हुआ।
मुद्रा ने आर्थिक जीवन को सरल, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया है। आज प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में मुद्रा का उपयोग करता है। यही कारण है कि अर्थशास्त्र में मुद्रा को आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है।
मुद्रा की परिभाषा
अर्थशास्त्र में मुद्रा की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं। सामान्य शब्दों में कहा जाए तो—
“मुद्रा वह वस्तु या साधन है जिसे वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय, मूल्य के भुगतान तथा ऋणों के निपटान के लिए सभी लोग सामान्य रूप से स्वीकार करते हैं।”
सरल शब्दों में, जिस साधन को सभी लोग वस्तुओं और सेवाओं के बदले स्वीकार कर लेते हैं, उसे मुद्रा कहते हैं।
मुद्रा की विशेषताएँ
सर्वमान्य होना
मुद्रा को समाज के सभी लोग भुगतान के साधन के रूप में स्वीकार करते हैं।
विनिमय का माध्यम होना
मुद्रा के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं का आसानी से क्रय-विक्रय किया जा सकता है।
मूल्य का मापक होना
मुद्रा के द्वारा प्रत्येक वस्तु और सेवा का मूल्य निर्धारित किया जाता है।
संग्रह योग्य होना
मुद्रा को भविष्य की आवश्यकताओं के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।
आसानी से ले जाने योग्य होना
मुद्रा का एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना सरल होता है।
मुद्रा के विभिन्न कार्य
अर्थशास्त्रियों ने मुद्रा के कार्यों को मुख्यतः प्राथमिक कार्य, द्वितीयक कार्य तथा आकस्मिक कार्य में विभाजित किया है।
मुद्रा के प्राथमिक कार्य
1. विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange)
मुद्रा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय का माध्यम बनना है। इसके कारण वस्तु-विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ समाप्त हो गई हैं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को गेहूँ खरीदना है, तो उसे गेहूँ के बदले कोई दूसरी वस्तु देने की आवश्यकता नहीं होती। वह केवल मुद्रा देकर गेहूँ खरीद सकता है।
2. मूल्य का मापक (Measure of Value)
मुद्रा सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य मापने का कार्य करती है। प्रत्येक वस्तु की कीमत मुद्रा में व्यक्त की जाती है, जिससे वस्तुओं की तुलना करना आसान हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि एक पुस्तक की कीमत 300 रुपये और एक बैग की कीमत 800 रुपये है, तो दोनों के मूल्य की तुलना आसानी से की जा सकती है।
मुद्रा के द्वितीयक कार्य
1. मूल्य का संचय (Store of Value)
मुद्रा को भविष्य के उपयोग के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। लोग अपनी आय का कुछ भाग बचाकर भविष्य की आवश्यकताओं के लिए रखते हैं।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपनी आय का कुछ भाग बैंक में जमा कर देता है ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग कर सके।
2. स्थगित भुगतानों का मानक (Standard of Deferred Payments)
आज अनेक लेन-देन उधार पर किए जाते हैं। ऐसे सभी ऋणों और भविष्य में किए जाने वाले भुगतानों का आधार मुद्रा ही होती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने बैंक से ऋण लिया है, तो वह भविष्य में उसी मुद्रा में उसका भुगतान करता है।
3. क्रय शक्ति का स्थानांतरण (Transfer of Purchasing Power)
मुद्रा के माध्यम से एक व्यक्ति अपनी क्रय शक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान या एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक आसानी से पहुँचा सकता है।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते से दूसरे शहर में रहने वाले अपने परिवार के सदस्य को आसानी से धन भेज सकता है।
मुद्रा के आकस्मिक कार्य
1. राष्ट्रीय आय के वितरण में सहायता
मुद्रा के माध्यम से मजदूरी, वेतन, किराया, ब्याज तथा लाभ का भुगतान किया जाता है। इससे राष्ट्रीय आय का वितरण आसान हो जाता है।
2. बचत और निवेश को बढ़ावा
मुद्रा लोगों को बचत करने के लिए प्रेरित करती है। यही बचत आगे चलकर निवेश में बदल जाती है, जिससे आर्थिक विकास होता है।
3. ऋण व्यवस्था को सरल बनाना
बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएँ मुद्रा के आधार पर आसानी से ऋण प्रदान करती हैं। इससे व्यापार और उद्योग को सहायता मिलती है।
4. आर्थिक विकास में योगदान
मुद्रा के कारण व्यापार, उद्योग, परिवहन तथा निवेश में वृद्धि होती है। इससे उत्पादन बढ़ता है और रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
5. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा
विभिन्न देशों के बीच होने वाले आयात और निर्यात में भी मुद्रा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सरल और व्यवस्थित बनता है।
मुद्रा का महत्व
व्यापार को सरल बनाती है
मुद्रा के कारण वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय बिना किसी कठिनाई के किया जा सकता है।
समय और श्रम की बचत
मुद्रा के कारण वस्तु-विनिमय प्रणाली की समस्याएँ समाप्त हो गई हैं, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है।
आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा
मुद्रा के माध्यम से उत्पादन, व्यापार, निवेश और रोजगार में वृद्धि होती है।
जीवन स्तर में सुधार
मुद्रा के कारण लोग अपनी आवश्यकताओं और सुविधाओं की वस्तुएँ आसानी से प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उनका जीवन स्तर बेहतर होता है।
निष्कर्ष
मुद्रा आधुनिक अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। यह केवल वस्तुओं और सेवाओं के क्रय-विक्रय का माध्यम ही नहीं है, बल्कि मूल्य का मापक, मूल्य का संचय, स्थगित भुगतानों का मानक तथा क्रय शक्ति के स्थानांतरण का साधन भी है। इसके अतिरिक्त मुद्रा बचत, निवेश, राष्ट्रीय आय के वितरण तथा आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि मुद्रा न होती, तो आधुनिक व्यापार और आर्थिक व्यवस्था का संचालन संभव नहीं होता। इसलिए मुद्रा को अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
प्रश्न 02 : विनिमय नियंत्रण से क्या अभिप्राय है? विभिन्न विनिमय नियंत्रण की विधियों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
परिचय
आज के समय में कोई भी देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। प्रत्येक देश को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे देशों के साथ व्यापार करना पड़ता है। इस व्यापार में विदेशी मुद्रा का उपयोग किया जाता है। यदि विदेशी मुद्रा का उपयोग बिना किसी नियंत्रण के किया जाए, तो देश में विदेशी मुद्रा की कमी हो सकती है और भुगतान संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए सरकार और केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा के क्रय-विक्रय तथा उसके उपयोग पर नियंत्रण रखते हैं। इसी व्यवस्था को विनिमय नियंत्रण (Exchange Control) कहा जाता है।
विनिमय नियंत्रण किसी भी देश की आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण भाग है। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी मुद्रा का उचित उपयोग करना, भुगतान संतुलन बनाए रखना, राष्ट्रीय मुद्रा को स्थिर रखना तथा देश के आर्थिक विकास को गति देना है।
विनिमय नियंत्रण का अर्थ
विनिमय नियंत्रण से आशय उस व्यवस्था से है जिसके अंतर्गत सरकार या केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा के क्रय-विक्रय, उपयोग और वितरण को नियंत्रित करता है।
सरल शब्दों में, जब सरकार यह निर्धारित करती है कि विदेशी मुद्रा कौन, कितनी और किस उद्देश्य से खरीद या उपयोग कर सकता है, तो उसे विनिमय नियंत्रण कहते हैं।
विनिमय नियंत्रण के उद्देश्य
विदेशी मुद्रा की बचत करना
विनिमय नियंत्रण का प्रमुख उद्देश्य विदेशी मुद्रा का अनावश्यक उपयोग रोकना और उसका सही उपयोग सुनिश्चित करना है।
भुगतान संतुलन बनाए रखना
विदेशी व्यापार में संतुलन बनाए रखने और भुगतान संतुलन की स्थिति को मजबूत करने के लिए विनिमय नियंत्रण आवश्यक होता है।
राष्ट्रीय मुद्रा के मूल्य की रक्षा करना
विनिमय नियंत्रण के माध्यम से देश की मुद्रा के मूल्य में होने वाले अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जाता है।
आर्थिक विकास को बढ़ावा देना
विदेशी मुद्रा का उपयोग विकास कार्यों, उद्योगों और आवश्यक वस्तुओं के आयात में किया जाता है, जिससे आर्थिक प्रगति होती है।
अनावश्यक आयात को रोकना
सरकार विलासिता की वस्तुओं के आयात पर नियंत्रण लगाकर विदेशी मुद्रा की बचत करती है।
विनिमय नियंत्रण की विभिन्न विधियाँ
1. विदेशी मुद्रा का केंद्रीकरण
इस विधि में देश की समस्त विदेशी मुद्रा सरकार या केंद्रीय बैंक के नियंत्रण में रहती है। विदेशी मुद्रा प्राप्त करने वाले व्यक्ति या संस्थाओं को उसे निर्धारित नियमों के अनुसार केंद्रीय बैंक को जमा कराना होता है। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार विदेशी मुद्रा का वितरण किया जाता है।
2. लाइसेंस प्रणाली
इस व्यवस्था में विदेशी मुद्रा प्राप्त करने या विदेश से वस्तुओं का आयात करने के लिए सरकार या संबंधित विभाग से अनुमति लेना आवश्यक होता है। इससे केवल आवश्यक कार्यों के लिए ही विदेशी मुद्रा का उपयोग किया जाता है।
3. आयात नियंत्रण
सरकार अनावश्यक या विलासिता की वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध या सीमा निर्धारित कर देती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और घरेलू उद्योगों को भी बढ़ावा मिलता है।
4. निर्यात को प्रोत्साहन
सरकार निर्यातकों को विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ, करों में छूट तथा अन्य प्रोत्साहन प्रदान करती है ताकि अधिक से अधिक वस्तुओं का निर्यात हो सके। इससे देश को अधिक विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
5. बहुविनिमय दर प्रणाली (Multiple Exchange Rate System)
इस विधि में अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं के लिए अलग-अलग विनिमय दरें निर्धारित की जाती हैं। आवश्यक वस्तुओं के लिए कम विनिमय दर तथा विलासिता की वस्तुओं के लिए अधिक विनिमय दर रखी जाती है।
6. विनिमय दर में परिवर्तन
सरकार आवश्यकता के अनुसार अपनी मुद्रा का अवमूल्यन (Devaluation) या पुनर्मूल्यन (Revaluation) कर सकती है। अवमूल्यन से निर्यात बढ़ाने और आयात को कम करने में सहायता मिलती है, जबकि पुनर्मूल्यन का उपयोग विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।
7. विदेशी भुगतान पर नियंत्रण
सरकार विदेशों में धन भेजने, विदेशी निवेश करने तथा अन्य विदेशी भुगतानों पर आवश्यक नियम लागू करती है। इससे विदेशी मुद्रा का अनावश्यक व्यय रोका जा सकता है।
विनिमय नियंत्रण के लाभ
विदेशी मुद्रा की बचत होती है
अनावश्यक आयात और विदेशी भुगतानों पर नियंत्रण होने से विदेशी मुद्रा का संरक्षण होता है।
भुगतान संतुलन में सुधार होता है
निर्यात बढ़ने और आयात नियंत्रित होने से देश का भुगतान संतुलन मजबूत होता है।
घरेलू उद्योगों को संरक्षण मिलता है
जब विदेशी वस्तुओं का आयात कम होता है, तो देश के उद्योगों को विकास का अवसर मिलता है।
राष्ट्रीय मुद्रा की स्थिरता बनी रहती है
विनिमय नियंत्रण के कारण देश की मुद्रा के मूल्य में अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता।
आर्थिक विकास में सहायता मिलती है
विदेशी मुद्रा का सही उपयोग होने से उद्योग, व्यापार और विकास योजनाओं को लाभ मिलता है।
विनिमय नियंत्रण की सीमाएँ
व्यापार की गति प्रभावित हो सकती है
अधिक नियंत्रण होने पर आयात-निर्यात की प्रक्रिया जटिल और धीमी हो सकती है।
काला बाज़ार बढ़ने की संभावना
यदि विदेशी मुद्रा पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाए जाएँ, तो अवैध रूप से विदेशी मुद्रा का लेन-देन बढ़ सकता है।
प्रशासनिक कठिनाइयाँ
विनिमय नियंत्रण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
विदेशी निवेश पर प्रभाव
अत्यधिक नियंत्रण होने पर कुछ विदेशी निवेशक निवेश करने से बच सकते हैं, जिससे आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष
विनिमय नियंत्रण किसी भी देश की विदेशी मुद्रा व्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है। इसके माध्यम से सरकार और केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा के उपयोग, क्रय-विक्रय तथा वितरण को नियंत्रित करते हैं। विदेशी मुद्रा का केंद्रीकरण, लाइसेंस प्रणाली, आयात नियंत्रण, निर्यात को प्रोत्साहन, बहुविनिमय दर प्रणाली, विनिमय दर में परिवर्तन तथा विदेशी भुगतान पर नियंत्रण इसकी प्रमुख विधियाँ हैं। इन विधियों के माध्यम से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, भुगतान संतुलन में सुधार होता है, राष्ट्रीय मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है तथा देश के आर्थिक विकास को गति मिलती है। इसलिए विनिमय नियंत्रण आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक और उपयोगी व्यवस्था मानी जाती है।
प्रश्न 03 : साख नियंत्रण से क्या अभिप्राय है? केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाई गई साख नियंत्रण की प्रमुख विधियों की विवेचना कीजिए।
परिचय
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में मुद्रा और साख (Credit) का महत्वपूर्ण स्थान होता है। यदि बैंकों द्वारा आवश्यकता से अधिक ऋण दिया जाए, तो बाजार में मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे महँगाई बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि ऋण बहुत कम दिया जाए, तो व्यापार, उद्योग और निवेश पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए साख की मात्रा को संतुलित रखना आवश्यक होता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) देश का केंद्रीय बैंक है, जो अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुसार साख को नियंत्रित करता है। इसी प्रक्रिया को साख नियंत्रण (Credit Control) कहा जाता है। साख नियंत्रण के माध्यम से मुद्रा की मात्रा, महँगाई तथा आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
साख नियंत्रण का अर्थ
साख नियंत्रण से आशय उन उपायों से है जिनके द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण (साख) की मात्रा और दिशा को नियंत्रित करता है।
सरल शब्दों में, जब केंद्रीय बैंक यह तय करता है कि बैंकों को कितना ऋण देना चाहिए और किस क्षेत्र को देना चाहिए, तो उसे साख नियंत्रण कहते हैं।
साख नियंत्रण के उद्देश्य
महँगाई पर नियंत्रण
यदि बाजार में अधिक मुद्रा पहुँच जाती है, तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगती हैं। साख नियंत्रण के द्वारा महँगाई को नियंत्रित किया जाता है।
आर्थिक विकास को बढ़ावा देना
उद्योग, कृषि और व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराकर आर्थिक विकास को गति दी जाती है।
मुद्रा की स्थिरता बनाए रखना
साख नियंत्रण का उद्देश्य मुद्रा के मूल्य को स्थिर बनाए रखना भी है।
बैंकिंग व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना
साख नियंत्रण से बैंक व्यवस्थित ढंग से ऋण वितरित करते हैं, जिससे बैंकिंग प्रणाली मजबूत होती है।
साख नियंत्रण की विभिन्न विधियाँ
साख नियंत्रण की विधियों को मुख्य रूप से मात्रात्मक (Quantitative) तथा गुणात्मक (Qualitative) विधियों में बाँटा जाता है।
मात्रात्मक (सामान्य) विधियाँ
1. बैंक दर नीति (Bank Rate Policy)
बैंक दर वह दर होती है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है।
जब महँगाई बढ़ती है, तब RBI बैंक दर बढ़ा देता है। इससे बैंकों के लिए ऋण लेना महँगा हो जाता है और वे कम ऋण देते हैं। इसके विपरीत, आर्थिक मंदी के समय बैंक दर कम कर दी जाती है ताकि ऋण सस्ता हो और निवेश बढ़ सके।
2. खुला बाजार परिचालन (Open Market Operations)
इस विधि में भारतीय रिज़र्व बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री करता है।
जब RBI प्रतिभूतियाँ बेचता है, तो बाजार से मुद्रा वापस आ जाती है और साख कम हो जाती है। जब RBI प्रतिभूतियाँ खरीदता है, तो बाजार में मुद्रा बढ़ती है और साख का विस्तार होता है।
3. नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR)
प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित भाग भारतीय रिज़र्व बैंक के पास नकद के रूप में रखना पड़ता है।
यदि CRR बढ़ा दिया जाए, तो बैंकों के पास ऋण देने के लिए कम धन बचेगा और साख कम होगी। यदि CRR घटा दिया जाए, तो बैंक अधिक ऋण दे सकेंगे।
4. वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR)
SLR के अंतर्गत बैंकों को अपनी जमा राशि का एक निश्चित भाग नकद, सोना या सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में अपने पास रखना होता है।
SLR बढ़ने पर ऋण देने की क्षमता कम हो जाती है और घटने पर बढ़ जाती है।
गुणात्मक (चयनात्मक) विधियाँ
1. ऋण का चयनात्मक नियंत्रण
भारतीय रिज़र्व बैंक यह तय करता है कि किन क्षेत्रों को अधिक ऋण दिया जाए और किन क्षेत्रों में ऋण सीमित रखा जाए।
2. नैतिक समझाइश (Moral Suasion)
इस विधि में RBI बैंकों को सलाह और निर्देश देकर उचित ऋण नीति अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
3. प्रत्यक्ष कार्यवाही (Direct Action)
यदि कोई बैंक RBI के निर्देशों का पालन नहीं करता, तो उसके विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।
4. ऋण सीमा निर्धारित करना
भारतीय रिज़र्व बैंक कुछ विशेष क्षेत्रों या वस्तुओं के लिए ऋण की अधिकतम सीमा निर्धारित कर सकता है, जिससे अनावश्यक सट्टेबाजी और महँगाई पर नियंत्रण रखा जा सके।
साख नियंत्रण का महत्व
महँगाई को नियंत्रित करता है
साख नियंत्रण के माध्यम से बाजार में मुद्रा की मात्रा को संतुलित रखा जाता है, जिससे महँगाई नियंत्रित रहती है।
आर्थिक स्थिरता बनाए रखता है
इससे अर्थव्यवस्था में संतुलन बना रहता है और व्यापारिक गतिविधियाँ सुचारु रूप से चलती हैं।
उत्पादन और निवेश को प्रोत्साहन
आवश्यक क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण मिलने से उद्योग, कृषि और व्यापार का विकास होता है।
बैंकिंग प्रणाली को मजबूत बनाता है
साख नियंत्रण के कारण बैंक नियमों के अनुसार कार्य करते हैं और वित्तीय व्यवस्था अधिक सुरक्षित बनती है।
विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ता है
जब किसी देश की मौद्रिक व्यवस्था संतुलित रहती है, तो विदेशी निवेशकों का विश्वास भी बढ़ता है।
निष्कर्ष
भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य करता है। यह विभिन्न मौद्रिक उपायों के माध्यम से वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण की मात्रा तथा दिशा को नियंत्रित करता है। इसी प्रक्रिया को साख नियंत्रण (Credit Control) कहा जाता है।
प्रश्न 04 : मुक्त व्यापार और संरक्षणवाद की अवधारणाओं की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
परिचय
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है। आज लगभग सभी देश एक-दूसरे के साथ वस्तुओं और सेवाओं का आयात तथा निर्यात करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को लेकर अर्थशास्त्र में दो प्रमुख विचारधाराएँ प्रचलित हैं— मुक्त व्यापार (Free Trade) और संरक्षणवाद (Protectionism)। मुक्त व्यापार में देशों के बीच व्यापार पर बहुत कम या कोई प्रतिबंध नहीं होता, जबकि संरक्षणवाद में सरकार अपने देश के उद्योगों और व्यापार की सुरक्षा के लिए आयात-निर्यात पर विभिन्न प्रकार के नियंत्रण लगाती है।
दोनों अवधारणाओं का उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है, लेकिन इनके कार्य करने के तरीके अलग-अलग हैं। इसलिए अर्थशास्त्र में इन दोनों का विशेष महत्व माना जाता है।
मुक्त व्यापार का अर्थ
मुक्त व्यापार से आशय ऐसी व्यापार व्यवस्था से है जिसमें दो देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आयात-निर्यात पर सरकार द्वारा बहुत कम या कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता।
सरल शब्दों में, जब देशों के बीच बिना अधिक कर, शुल्क, कोटा या अन्य बाधाओं के व्यापार होता है, तो उसे मुक्त व्यापार कहते हैं।
मुक्त व्यापार की विशेषताएँ
व्यापार पर कम सरकारी नियंत्रण
मुक्त व्यापार में सरकार आयात और निर्यात पर अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाती।
सीमा शुल्क कम या समाप्त होना
इस व्यवस्था में आयात-निर्यात शुल्क बहुत कम होता है या कई बार समाप्त कर दिया जाता है।
स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा
देशी और विदेशी उत्पादकों के बीच खुली प्रतिस्पर्धा होती है, जिससे अच्छी गुणवत्ता की वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं।
संसाधनों का उचित उपयोग
प्रत्येक देश उन वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनमें उसे तुलनात्मक लाभ प्राप्त होता है।
मुक्त व्यापार के लाभ
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि
मुक्त व्यापार से देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान बढ़ता है।
उपभोक्ताओं को लाभ
उपभोक्ताओं को अच्छी गुणवत्ता की वस्तुएँ उचित मूल्य पर प्राप्त होती हैं तथा उनके पास अधिक विकल्प उपलब्ध होते हैं।
उत्पादन और रोजगार में वृद्धि
व्यापार बढ़ने से उद्योगों का विस्तार होता है और रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
आर्थिक विकास को बढ़ावा
मुक्त व्यापार से निवेश, उत्पादन और विदेशी व्यापार बढ़ता है, जिससे देश का आर्थिक विकास होता है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंध मजबूत होते हैं
व्यापारिक संबंध बढ़ने से देशों के बीच सहयोग और अच्छे संबंध विकसित होते हैं।
मुक्त व्यापार की सीमाएँ
घरेलू उद्योगों पर प्रभाव
विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के कारण छोटे और नए उद्योगों को नुकसान हो सकता है।
विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता
अधिक आयात होने से देश विदेशी वस्तुओं पर निर्भर हो सकता है।
व्यापार घाटे की संभावना
यदि आयात अधिक और निर्यात कम हो जाए, तो भुगतान संतुलन प्रभावित हो सकता है।
संरक्षणवाद का अर्थ
संरक्षणवाद से आशय ऐसी व्यापार नीति से है जिसमें सरकार देश के उद्योगों और व्यापार की रक्षा के लिए विदेशी वस्तुओं के आयात पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाती है।
सरल शब्दों में, जब सरकार देश के उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए आयात पर नियंत्रण लगाती है, तो उसे संरक्षणवाद कहते हैं।
संरक्षणवाद की विशेषताएँ
आयात पर नियंत्रण
सरकार विदेशी वस्तुओं के आयात पर सीमा शुल्क, कोटा या अन्य प्रतिबंध लगाती है।
घरेलू उद्योगों को संरक्षण
नए और छोटे उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने का प्रयास किया जाता है।
सरकारी हस्तक्षेप
इस व्यवस्था में सरकार व्यापार संबंधी नीतियों में सक्रिय भूमिका निभाती है।
स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा
देश में निर्मित वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।
संरक्षणवाद के लाभ
घरेलू उद्योगों का विकास
संरक्षण मिलने से छोटे और नए उद्योगों को विकसित होने का अवसर मिलता है।
रोजगार में वृद्धि
घरेलू उद्योगों के विकास से रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
विदेशी निर्भरता में कमी
देश अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करने का प्रयास करता है, जिससे आयात पर निर्भरता घटती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा
रक्षा और आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
भुगतान संतुलन में सुधार
आयात कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत होती है और भुगतान संतुलन मजबूत होता है।
संरक्षणवाद की सीमाएँ
प्रतिस्पर्धा में कमी
जब विदेशी प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है, तो कई बार घरेलू उद्योग गुणवत्ता सुधारने पर कम ध्यान देते हैं।
वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है
प्रतिस्पर्धा कम होने से वस्तुओं के मूल्य बढ़ सकते हैं, जिसका भार उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है
अत्यधिक संरक्षणवाद से अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
मुक्त व्यापार और संरक्षणवाद का महत्व
देश की आर्थिक आवश्यकताओं के अनुसार नीति बनाना
कोई भी देश अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार मुक्त व्यापार या संरक्षणवाद की नीति अपनाता है।
आर्थिक विकास में योगदान
दोनों नीतियाँ उचित परिस्थितियों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सहायक होती हैं।
रोजगार और उद्योगों का विकास
इन नीतियों के माध्यम से उत्पादन, व्यापार और रोजगार को प्रभावित किया जाता है।
निष्कर्ष
मुक्त व्यापार और संरक्षणवाद अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। मुक्त व्यापार में देशों के बीच बिना अधिक प्रतिबंध के व्यापार किया जाता है, जबकि संरक्षणवाद में सरकार घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए आयात पर विभिन्न प्रकार के नियंत्रण लगाती है। दोनों नीतियों के अपने-अपने लाभ और सीमाएँ हैं। विकसित देश सामान्यतः मुक्त व्यापार को अधिक महत्व देते हैं, जबकि विकासशील देश अपने नए उद्योगों की रक्षा के लिए संरक्षणवाद की नीति अपनाते हैं। इसलिए किसी भी देश को अपनी आर्थिक परिस्थितियों, विकास की आवश्यकताओं तथा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए इन दोनों नीतियों का संतुलित उपयोग करना चाहिए।
प्रश्न 05 : मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
परिचय
अर्थशास्त्र में मुद्रा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा का वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसी संबंध को स्पष्ट करने के लिए अनेक अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न सिद्धान्त प्रस्तुत किए हैं। इनमें मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त (Quantity Theory of Money) सबसे प्रसिद्ध सिद्धान्तों में से एक है।
इस सिद्धान्त के अनुसार यदि अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा बढ़ती है, तो वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य भी बढ़ जाते हैं। इसी प्रकार यदि मुद्रा की मात्रा घटती है, तो कीमतों में भी कमी आती है। इस सिद्धान्त का प्रमुख प्रतिपादन अमेरिकी अर्थशास्त्री इरविंग फिशर (Irving Fisher) ने किया था। यद्यपि यह सिद्धान्त अर्थशास्त्र में महत्वपूर्ण माना जाता है, फिर भी इसकी कई सीमाएँ हैं, इसलिए इसकी आलोचना भी की जाती है।
मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त का अर्थ
मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त के अनुसार मुद्रा की मात्रा और वस्तुओं के मूल्य स्तर में सीधा संबंध होता है। यदि अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा बढ़ती है, तो कीमतें भी बढ़ती हैं और यदि मुद्रा की मात्रा घटती है, तो कीमतें भी कम हो जाती हैं।
सरल शब्दों में, “जितनी अधिक मुद्रा बाजार में होगी, वस्तुओं की कीमतें उतनी ही अधिक होंगी।”
मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की मुख्य मान्यताएँ
मुद्रा के चलन की गति स्थिर रहती है
इस सिद्धान्त में माना गया है कि मुद्रा एक निश्चित गति से चलती है और उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता।
उत्पादन की मात्रा स्थिर रहती है
यह माना गया है कि अल्पकाल में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन स्थिर रहता है।
पूर्ण रोजगार की स्थिति
सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि अर्थव्यवस्था में सभी संसाधनों का पूरा उपयोग हो रहा है।
मुद्रा की मात्रा ही मूल्य स्तर को प्रभावित करती है
इस सिद्धान्त के अनुसार कीमतों में परिवर्तन का मुख्य कारण केवल मुद्रा की मात्रा होती है।
मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त का महत्व
मुद्रा और मूल्य स्तर का संबंध स्पष्ट करता है
यह सिद्धान्त बताता है कि बाजार में मुद्रा की मात्रा बढ़ने या घटने से कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
मौद्रिक नीति बनाने में सहायता
सरकार और केंद्रीय बैंक मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए इस सिद्धान्त से मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं।
महँगाई को समझने में उपयोगी
यह सिद्धान्त महँगाई के एक प्रमुख कारण के रूप में मुद्रा की अधिकता को स्पष्ट करता है।
मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की आलोचना
अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित
इस सिद्धान्त की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसकी मान्यताएँ वास्तविक जीवन से मेल नहीं खातीं। वास्तविक अर्थव्यवस्था में उत्पादन, रोजगार और मुद्रा की गति हमेशा स्थिर नहीं रहती।
मुद्रा की गति स्थिर नहीं रहती
यह सिद्धान्त मानता है कि मुद्रा की चलन गति हमेशा समान रहती है, जबकि वास्तविकता में लोगों की आय, बचत, बैंकिंग व्यवस्था और तकनीकी विकास के कारण इसमें परिवर्तन होता रहता है।
उत्पादन में परिवर्तन की उपेक्षा
वास्तविक जीवन में उत्पादन की मात्रा बढ़ या घट सकती है। उत्पादन बढ़ने पर कीमतें कम भी हो सकती हैं, लेकिन यह सिद्धान्त इस तथ्य को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
मुद्रा की माँग की अनदेखी
यह सिद्धान्त केवल मुद्रा की पूर्ति पर ध्यान देता है। लोगों की मुद्रा रखने की इच्छा और आवश्यकता को महत्व नहीं दिया गया है।
अन्य आर्थिक कारकों की उपेक्षा
वस्तुओं की कीमतें केवल मुद्रा की मात्रा से ही प्रभावित नहीं होतीं। माँग और पूर्ति, उत्पादन लागत, कर नीति, तकनीकी विकास तथा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी कीमतों को प्रभावित करती हैं।
पूर्ण रोजगार की मान्यता सही नहीं
यह सिद्धान्त पूर्ण रोजगार की स्थिति मानता है, जबकि अधिकांश देशों में बेरोज़गारी किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है।
अल्पकाल में लागू नहीं होता
अल्पकाल में कीमतों में परिवर्तन कई कारणों से होता है। इसलिए यह सिद्धान्त अल्पकालीन परिस्थितियों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता।
आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं
आज की अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान, बैंकिंग प्रणाली, विदेशी निवेश और वैश्विक व्यापार जैसे अनेक नए कारक हैं। यह सिद्धान्त इन सभी को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त का महत्व
अर्थशास्त्र के अध्ययन का आधार
यह सिद्धान्त मुद्रा और मूल्य स्तर के संबंध को समझने का प्रारंभिक आधार प्रदान करता है।
महँगाई पर नियंत्रण में सहायक
सरकार और केंद्रीय बैंक मुद्रा की मात्रा को नियंत्रित करके महँगाई को कम करने का प्रयास करते हैं।
आधुनिक सिद्धान्तों की नींव
मुद्रा से संबंधित अनेक आधुनिक सिद्धान्त इसी सिद्धान्त से प्रेरित होकर विकसित हुए हैं।
निष्कर्ष
मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसके अनुसार मुद्रा की मात्रा और मूल्य स्तर में सीधा संबंध होता है। यह सिद्धान्त मुद्रा के महत्व तथा महँगाई के कारणों को समझने में उपयोगी है। हालांकि इसकी अनेक मान्यताएँ व्यवहारिक नहीं हैं और यह उत्पादन, माँग, तकनीकी विकास तथा अन्य आर्थिक कारकों की उपेक्षा करता है। इसलिए इसकी कई आलोचनाएँ की जाती हैं। फिर भी मुद्रा और मूल्य स्तर के संबंध को समझाने में इस सिद्धान्त का विशेष स्थान है और अर्थशास्त्र के अध्ययन में आज भी इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रश्न 06 : अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आधुनिक सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
परिचय
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का अर्थ है दो या दो से अधिक देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान। प्रत्येक देश अपनी सभी आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन स्वयं नहीं कर सकता। इसलिए देशों के बीच व्यापार आवश्यक हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार क्यों होता है और किन कारणों से देशों को व्यापार से लाभ मिलता है, इसे समझाने के लिए अनेक सिद्धान्त दिए गए हैं।
शुरुआत में एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो ने प्रतिष्ठित सिद्धान्त प्रस्तुत किए, लेकिन समय के साथ यह महसूस किया गया कि ये सिद्धान्त आधुनिक परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं समझा पाते। इसके बाद स्वीडन के अर्थशास्त्रियों एली हेक्शर (Eli Heckscher) और बर्टिल ओहलिन (Bertil Ohlin) ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory of International Trade) प्रस्तुत किया। इसे हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त (Heckscher–Ohlin Theory) भी कहा जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आधुनिक सिद्धान्त का अर्थ
आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार किसी देश का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उत्पादन के साधनों (Factors of Production) की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
इस सिद्धान्त के अनुसार जिस देश में जो उत्पादन साधन अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं, वह देश उन्हीं साधनों का अधिक उपयोग करने वाली वस्तुओं का उत्पादन और निर्यात करता है। जिन वस्तुओं के उत्पादन के लिए उसके पास आवश्यक साधनों की कमी होती है, उनका आयात करता है।
सरल शब्दों में, जिस देश के पास जो संसाधन अधिक होंगे, वह उसी प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन और निर्यात करेगा।
आधुनिक सिद्धान्त की मुख्य मान्यताएँ
उत्पादन के साधनों की उपलब्धता अलग-अलग होती है
प्रत्येक देश में भूमि, श्रम, पूँजी और प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा समान नहीं होती।
उत्पादन तकनीक समान मानी गई है
इस सिद्धान्त में माना गया है कि विभिन्न देशों में उत्पादन की तकनीक लगभग समान होती है।
पूर्ण प्रतियोगिता का होना
बाजार में खरीदारों और विक्रेताओं के बीच पूर्ण प्रतियोगिता होती है।
उत्पादन के साधनों की देश के भीतर गतिशीलता
उत्पादन के साधन एक ही देश के भीतर एक उद्योग से दूसरे उद्योग में जा सकते हैं, लेकिन एक देश से दूसरे देश में आसानी से नहीं जा सकते।
परिवहन लागत का प्रभाव कम माना गया है
सिद्धान्त में परिवहन लागत को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया गया है।
आधुनिक सिद्धान्त की मुख्य बातें
संसाधनों की अधिकता व्यापार का आधार है
जिस देश में श्रम अधिक है, वह श्रम-प्रधान वस्तुओं का उत्पादन करेगा। जिस देश में पूँजी अधिक है, वह पूँजी-प्रधान वस्तुओं का उत्पादन करेगा।
विशेषीकरण को बढ़ावा
प्रत्येक देश उन वस्तुओं के उत्पादन में विशेषता प्राप्त करता है जिनके लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से सभी देशों को लाभ
व्यापार के माध्यम से प्रत्येक देश अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ कम लागत पर प्राप्त कर सकता है और अपने अतिरिक्त उत्पादन का निर्यात कर सकता है।
आधुनिक सिद्धान्त के गुण
व्यावहारिक दृष्टिकोण
यह सिद्धान्त केवल लागत पर आधारित नहीं है, बल्कि उत्पादन के साधनों की उपलब्धता को भी महत्व देता है। इसलिए इसे प्रतिष्ठित सिद्धान्त की तुलना में अधिक व्यावहारिक माना जाता है।
संसाधनों का उचित उपयोग
देश अपने उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हैं, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ती है।
विशेषीकरण और दक्षता में वृद्धि
प्रत्येक देश अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन करता है, जिससे गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार होता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का विस्तार
यह सिद्धान्त देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देता है और आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाता है।
आर्थिक विकास में सहायता
अधिक उत्पादन, अधिक निर्यात और विदेशी मुद्रा की प्राप्ति से देश का आर्थिक विकास होता है।
आधुनिक सिद्धान्त की आलोचना
तकनीकी समानता की मान्यता सही नहीं
वास्तविक जीवन में सभी देशों की उत्पादन तकनीक समान नहीं होती। विकसित देशों की तकनीक विकासशील देशों से अधिक उन्नत होती है।
परिवहन लागत की उपेक्षा
आज के समय में परिवहन और बीमा का खर्च अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करता है, लेकिन सिद्धान्त इसे पर्याप्त महत्व नहीं देता।
सरकारी हस्तक्षेप की अनदेखी
वास्तविक व्यापार में सरकारें आयात शुल्क, कोटा, सब्सिडी और अन्य नियम लागू करती हैं, जबकि सिद्धान्त मुक्त व्यापार की कल्पना करता है।
उत्पादन साधनों की गुणवत्ता अलग-अलग होती है
सिद्धान्त केवल उत्पादन साधनों की मात्रा पर ध्यान देता है, जबकि उनकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है।
आधुनिक व्यापार की नई परिस्थितियों को नहीं समझाता
आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, डिजिटल व्यापार, तकनीकी नवाचार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करती हैं। इनका पर्याप्त उल्लेख इस सिद्धान्त में नहीं मिलता।
आधुनिक सिद्धान्त का महत्व
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को समझने में सहायक
यह सिद्धान्त बताता है कि देशों के बीच व्यापार क्यों होता है और किन आधारों पर होता है।
आर्थिक नीतियाँ बनाने में उपयोगी
सरकारें अपने संसाधनों के अनुसार उत्पादन और निर्यात की नीतियाँ बना सकती हैं।
संसाधनों का बेहतर उपयोग
देश अपने उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करके उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
आर्थिक विकास को बढ़ावा
व्यापार बढ़ने से रोजगार, उत्पादन, आय और विदेशी मुद्रा में वृद्धि होती है।
निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का आधुनिक सिद्धान्त, जिसे हेक्शर-ओहलिन सिद्धान्त भी कहा जाता है, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त बताता है कि देशों के बीच व्यापार का मुख्य आधार उत्पादन के साधनों की उपलब्धता है। जिस देश के पास जो संसाधन अधिक होते हैं, वह उसी प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन और निर्यात करता है। यद्यपि इस सिद्धान्त की कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी यह प्रतिष्ठित सिद्धान्त की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक माना जाता है। आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को समझने तथा आर्थिक नीतियाँ बनाने में इस सिद्धान्त का महत्वपूर्ण योगदान है।
प्रश्न 07 : मुद्रा स्फीति का समाज के विभिन्न वर्गों पर प्रभाव पड़ता है। विवेचना कीजिए।
परिचय
मुद्रा स्फीति (Inflation) वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण आर्थिक समस्या है। जब किसी देश में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि होती है तथा मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है, तो उसे मुद्रा स्फीति कहा जाता है। अर्थात पहले जितनी राशि में अधिक वस्तुएँ खरीदी जा सकती थीं, अब उसी राशि में कम वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं। इसका प्रभाव केवल अर्थव्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग पर भी पड़ता है। कुछ लोगों को इससे लाभ होता है, जबकि कुछ लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसलिए मुद्रा स्फीति के प्रभावों को समझना आवश्यक है।
मुद्रा स्फीति का अर्थ
मुद्रा स्फीति वह स्थिति है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य लगातार बढ़ते हैं तथा मुद्रा का वास्तविक मूल्य या क्रय शक्ति कम हो जाती है।
सरल शब्दों में, जब महँगाई बढ़ने के कारण समान धनराशि से पहले की तुलना में कम वस्तुएँ खरीदी जा सकें, तो उसे मुद्रा स्फीति कहते हैं।
मुद्रा स्फीति का समाज के विभिन्न वर्गों पर प्रभाव
1. निश्चित आय वाले लोगों पर प्रभाव
मुद्रा स्फीति का सबसे अधिक प्रभाव निश्चित आय प्राप्त करने वाले लोगों पर पड़ता है। जैसे—सरकारी कर्मचारी, पेंशनभोगी तथा अन्य वेतनभोगी व्यक्ति। महँगाई बढ़ने पर उनकी आय तुरंत नहीं बढ़ती, लेकिन खर्च लगातार बढ़ जाते हैं। इससे उनकी वास्तविक आय कम हो जाती है और जीवन स्तर प्रभावित होता है।
2. मजदूर वर्ग पर प्रभाव
यदि मजदूरी महँगाई के अनुसार नहीं बढ़ती, तो मजदूर वर्ग को सबसे अधिक कठिनाई होती है। उन्हें भोजन, कपड़े, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यकताओं को पूरा करने में परेशानी होती है। इसलिए मजदूर वर्ग पर मुद्रा स्फीति का प्रभाव सामान्यतः नकारात्मक होता है।
3. किसान वर्ग पर प्रभाव
किसानों पर मुद्रा स्फीति का प्रभाव मिश्रित होता है। यदि उनकी फसलों के मूल्य बढ़ते हैं, तो उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है। लेकिन यदि खाद, बीज, कीटनाशक, डीज़ल और सिंचाई जैसी लागत भी अधिक बढ़ जाए, तो उनका लाभ कम हो जाता है।
4. व्यापारी वर्ग पर प्रभाव
व्यापारियों को सामान्यतः मुद्रा स्फीति से लाभ होता है। यदि उन्होंने पहले कम कीमत पर माल खरीदा हो और बाद में अधिक कीमत पर बेचा हो, तो उन्हें अधिक लाभ मिलता है। हालांकि अत्यधिक महँगाई होने पर लोगों की खरीदने की क्षमता घट जाती है, जिससे व्यापार प्रभावित हो सकता है।
5. उद्योगपतियों पर प्रभाव
उद्योगपतियों को भी कई बार मुद्रा स्फीति से लाभ होता है क्योंकि वे अपने उत्पादों के मूल्य बढ़ा सकते हैं। लेकिन यदि कच्चे माल, बिजली, मजदूरी और परिवहन की लागत बहुत अधिक बढ़ जाए, तो उत्पादन महँगा हो जाता है और लाभ कम हो सकता है।
6. ऋण लेने वालों पर प्रभाव
मुद्रा स्फीति के समय ऋण लेने वालों को लाभ होता है। वे भविष्य में वही धनराशि वापस करते हैं, लेकिन उस समय उस राशि की क्रय शक्ति कम हो चुकी होती है। इसलिए ऋण का वास्तविक भार कम हो जाता है।
7. ऋण देने वालों पर प्रभाव
ऋण देने वालों को मुद्रा स्फीति से हानि होती है। उन्हें उतनी ही राशि वापस मिलती है, लेकिन उस धन का वास्तविक मूल्य पहले की तुलना में कम हो जाता है। इसलिए उनकी वास्तविक आय घट जाती है।
8. बचत करने वालों पर प्रभाव
जो लोग अपनी आय का बड़ा भाग बचत के रूप में रखते हैं, उन्हें मुद्रा स्फीति से नुकसान होता है। महँगाई बढ़ने के कारण उनकी बचत की वास्तविक कीमत कम हो जाती है और भविष्य में उसी धन से कम वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं।
9. उपभोक्ताओं पर प्रभाव
सामान्य उपभोक्ताओं पर मुद्रा स्फीति का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से परिवार का मासिक बजट बिगड़ जाता है। विशेष रूप से गरीब और मध्यम वर्ग को अपनी आवश्यकताओं में कटौती करनी पड़ती है।
10. सरकार पर प्रभाव
मुद्रा स्फीति बढ़ने पर सरकार का खर्च भी बढ़ जाता है। कर्मचारियों का महँगाई भत्ता बढ़ाना पड़ता है, विकास योजनाओं पर अधिक धन खर्च करना पड़ता है तथा कई बार आवश्यक वस्तुओं पर सब्सिडी भी देनी पड़ती है। इससे सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ता है।
मुद्रा स्फीति के सकारात्मक प्रभाव
उत्पादन में वृद्धि
यदि मुद्रा स्फीति नियंत्रित सीमा में हो, तो उद्योगों को अधिक लाभ मिलने की संभावना रहती है। इससे उत्पादन बढ़ता है और आर्थिक गतिविधियाँ तेज़ होती हैं।
निवेश को प्रोत्साहन
लाभ की संभावना बढ़ने पर उद्योगपति नए उद्योगों में निवेश करते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
रोजगार के अवसर बढ़ते हैं
जब उत्पादन और निवेश बढ़ते हैं, तो नए उद्योग स्थापित होते हैं और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।
मुद्रा स्फीति के नकारात्मक प्रभाव
महँगाई में वृद्धि
आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से आम लोगों का जीवन कठिन हो जाता है।
आर्थिक असमानता बढ़ती है
मुद्रा स्फीति से कुछ वर्गों को लाभ और कुछ वर्गों को हानि होती है, जिससे आय और संपत्ति की असमानता बढ़ सकती है।
बचत में कमी आती है
महँगाई बढ़ने पर लोगों की आय का बड़ा भाग दैनिक खर्चों में ही समाप्त हो जाता है, जिससे बचत कम हो जाती है।
आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न होती है
यदि मुद्रा स्फीति बहुत अधिक बढ़ जाए, तो व्यापार, निवेश और आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तथा अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है।
निष्कर्ष
मुद्रा स्फीति का समाज के सभी वर्गों पर समान प्रभाव नहीं पड़ता। निश्चित आय वाले लोग, मजदूर, उपभोक्ता, बचतकर्ता तथा ऋणदाता इससे अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि व्यापारी, कुछ उद्योगपति और ऋण लेने वालों को इससे लाभ भी हो सकता है। यदि मुद्रा स्फीति नियंत्रित सीमा में रहे, तो यह आर्थिक विकास में सहायक होती है, लेकिन अत्यधिक मुद्रा स्फीति देश की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों के लिए हानिकारक होती है। इसलिए सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर उचित मौद्रिक तथा राजकोषीय नीतियाँ अपनाकर मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, ताकि आर्थिक संतुलन बना रहे और समाज के सभी वर्गों का समान विकास हो सके।
प्रश्न 08 : विदेशी विनिमय दर किस प्रकार निर्धारित होती है? व्याख्या कीजिए।
परिचय
आज के समय में प्रत्येक देश का दूसरे देशों के साथ व्यापार होता है। जब एक देश दूसरे देश से वस्तुओं और सेवाओं का आयात या निर्यात करता है, तब भुगतान अलग-अलग देशों की मुद्राओं में किया जाता है। इसलिए एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा में बदलने की आवश्यकता होती है। जिस दर पर एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा से विनिमय किया जाता है, उसे विदेशी विनिमय दर (Foreign Exchange Rate) कहते हैं।
विदेशी विनिमय दर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है। इसका प्रभाव आयात, निर्यात, विदेशी निवेश, पर्यटन, विदेशी व्यापार तथा भुगतान संतुलन पर पड़ता है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि विदेशी विनिमय दर किस प्रकार निर्धारित होती है।
विदेशी विनिमय दर का अर्थ
विदेशी विनिमय दर से आशय उस दर से है जिस पर एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा से विनिमय किया जाता है।
सरल शब्दों में, एक देश की मुद्रा के बदले दूसरे देश की मुद्रा कितनी प्राप्त होगी, इसे विदेशी विनिमय दर कहते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि 1 अमेरिकी डॉलर के बदले 85 रुपये मिलते हैं, तो 1 डॉलर = 85 रुपये विदेशी विनिमय दर कहलाएगी।
विदेशी विनिमय दर का निर्धारण
विदेशी विनिमय दर मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति के आधार पर निर्धारित होती है। जिस प्रकार किसी वस्तु का मूल्य उसकी माँग और पूर्ति से तय होता है, उसी प्रकार विदेशी मुद्रा की विनिमय दर भी माँग और पूर्ति के अनुसार बदलती रहती है।
विदेशी विनिमय दर को निर्धारित करने वाले प्रमुख तत्व
1. विदेशी मुद्रा की माँग
जब किसी देश को अधिक आयात करना होता है, विदेश यात्रा करनी होती है या विदेशों में भुगतान करना होता है, तब विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ जाती है। माँग बढ़ने पर विदेशी मुद्रा महँगी हो जाती है और विनिमय दर में परिवर्तन आता है।
2. विदेशी मुद्रा की पूर्ति
जब किसी देश का निर्यात बढ़ता है, विदेशों से निवेश आता है या प्रवासी भारतीय धन भेजते हैं, तब विदेशी मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है। इससे विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ती है और विनिमय दर पर प्रभाव पड़ता है।
3. आयात और निर्यात
यदि किसी देश का निर्यात अधिक होता है, तो उसे अधिक विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। इसके विपरीत यदि आयात अधिक होता है, तो विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ जाती है। इसलिए आयात और निर्यात दोनों विनिमय दर को प्रभावित करते हैं।
4. विदेशी निवेश
जब किसी देश में विदेशी कंपनियाँ निवेश करती हैं, तब विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ता है। इससे उस देश की मुद्रा की स्थिति मजबूत होती है और विनिमय दर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
5. ब्याज दर
यदि किसी देश में ब्याज दर अधिक होती है, तो विदेशी निवेशक वहाँ निवेश करना पसंद करते हैं। इससे विदेशी मुद्रा का आगमन बढ़ता है और विनिमय दर प्रभावित होती है।
6. महँगाई की दर
यदि किसी देश में महँगाई अधिक होती है, तो उसकी मुद्रा का मूल्य कम होने लगता है। इससे विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन होता है।
7. सरकार और केंद्रीय बैंक की नीति
सरकार तथा भारतीय रिज़र्व बैंक आवश्यकता पड़ने पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करते हैं। वे विदेशी मुद्रा खरीदकर या बेचकर विनिमय दर को स्थिर रखने का प्रयास करते हैं।
विदेशी विनिमय दर के निर्धारण की प्रमुख प्रणालियाँ
1. स्थिर विनिमय दर (Fixed Exchange Rate)
इस प्रणाली में सरकार या केंद्रीय बैंक विनिमय दर निर्धारित करता है और उसे एक निश्चित सीमा में बनाए रखने का प्रयास करता है। आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा खरीदता या बेचता है।
2. लचीली विनिमय दर (Flexible Exchange Rate)
इस प्रणाली में विनिमय दर पूरी तरह विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति पर निर्भर करती है। सरकार का हस्तक्षेप बहुत कम होता है। वर्तमान समय में अधिकांश देशों में इसी प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
3. प्रबंधित विनिमय दर (Managed Exchange Rate)
इस प्रणाली में विनिमय दर का निर्धारण मुख्य रूप से बाजार की माँग और पूर्ति से होता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करता है ताकि विनिमय दर में अधिक उतार-चढ़ाव न हो।
विदेशी विनिमय दर का महत्व
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुचारु बनाती है
उचित विनिमय दर होने से आयात और निर्यात आसानी से होते हैं तथा व्यापार में वृद्धि होती है।
विदेशी निवेश को बढ़ावा देती है
स्थिर विनिमय दर विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ाती है और देश में अधिक निवेश आकर्षित करती है।
भुगतान संतुलन को प्रभावित करती है
विनिमय दर में परिवर्तन से आयात और निर्यात प्रभावित होते हैं, जिससे भुगतान संतुलन पर भी प्रभाव पड़ता है।
आर्थिक विकास में सहायता करती है
उचित विनिमय दर व्यापार, उद्योग, रोजगार तथा निवेश को बढ़ावा देती है और देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
विदेशी मुद्रा का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करती है
संतुलित विनिमय दर के कारण विदेशी मुद्रा का उचित उपयोग होता है तथा अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनी रहती है।
निष्कर्ष
विदेशी विनिमय दर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। इसका निर्धारण मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति पर निर्भर करता है। इसके अलावा आयात-निर्यात, विदेशी निवेश, ब्याज दर, महँगाई तथा सरकार और केंद्रीय बैंक की नीतियाँ भी इसे प्रभावित करती हैं। स्थिर विनिमय दर, लचीली विनिमय दर तथा प्रबंधित विनिमय दर इसके प्रमुख निर्धारण तंत्र हैं। यदि विदेशी विनिमय दर संतुलित और स्थिर रहे, तो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ता है, विदेशी निवेश में वृद्धि होती है, भुगतान संतुलन मजबूत होता है तथा देश के आर्थिक विकास को गति मिलती है।