इस पोस्ट के माध्यम से आपको उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के BA-23 के BAHI(N)302 का solved paper Feb 2026 मिलेगा।
प्रश्न 01 : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना पर एक टिप्पणी लिखिए।
भूमिका
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन था। इसकी स्थापना ने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की और देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों को एक साझा राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीयों में राजनीतिक चेतना का विकास हो रहा था। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार, सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा समाचार पत्रों के विकास ने लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की। ऐसे समय में एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की गई जो भारतीयों की समस्याओं को सरकार के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सके। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान भारत में अनेक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हुए। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों का एक नया वर्ग तैयार हुआ जो देश की समस्याओं को समझने लगा था। यह वर्ग प्रशासन में भारतीयों की अधिक भागीदारी, आर्थिक सुधार तथा राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहा था।
ब्रिटिश शासन की नीतियों के कारण भारतीय जनता अनेक कठिनाइयों का सामना कर रही थी। किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग के लोगों में असंतोष बढ़ रहा था। साथ ही, विभिन्न प्रांतों में कई राजनीतिक संस्थाओं का गठन हो चुका था, लेकिन उनके प्रयास सीमित क्षेत्र तक ही थे। इसलिए एक अखिल भारतीय संगठन की आवश्यकता महसूस की गई जो पूरे देश के लोगों का प्रतिनिधित्व कर सके।
ए. ओ. ह्यूम की भूमिका
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में ए. ओ. ह्यूम का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। वे एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी थे जिन्होंने भारतीयों के लिए एक राष्ट्रीय राजनीतिक मंच बनाने का प्रयास किया। उन्होंने शिक्षित भारतीयों को संगठित करने और उनके विचारों को एक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ए. ओ. ह्यूम का मानना था कि भारतीयों की शिकायतों और मांगों को शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से सरकार तक पहुंचाया जाना चाहिए। उनके प्रयासों से भारतीय नेताओं के बीच संपर्क स्थापित हुआ और कांग्रेस की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को बंबई (वर्तमान मुंबई) में की गई। इसका पहला अधिवेशन गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में देश के विभिन्न भागों से कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी थे। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक जागरूकता के महत्व पर बल दिया। इस अधिवेशन ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की।
कांग्रेस की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य
राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना
कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और धर्मों के लोगों को एक मंच पर लाना था। इससे राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने में सहायता मिली।
राजनीतिक जागरूकता का विकास
कांग्रेस भारतीय जनता में राजनीतिक चेतना विकसित करना चाहती थी ताकि लोग अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझ सकें।
सरकार के समक्ष भारतीयों की मांगें प्रस्तुत करना
कांग्रेस का उद्देश्य भारतीय जनता की समस्याओं और मांगों को ब्रिटिश सरकार तक पहुंचाना था। इसके माध्यम से प्रशासनिक सुधारों की मांग की गई।
भारतीयों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ाना
कांग्रेस चाहती थी कि भारतीयों को सरकारी सेवाओं और प्रशासन में अधिक अवसर प्रदान किए जाएं।
संवैधानिक सुधारों की मांग करना
कांग्रेस प्रारंभिक वर्षों में शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से सुधार प्राप्त करने में विश्वास रखती थी। इसलिए उसने याचिकाओं, प्रस्तावों और प्रतिनिधिमंडलों के माध्यम से अपनी मांगें प्रस्तुत कीं।
प्रारंभिक कांग्रेस की विशेषताएँ
कांग्रेस के प्रारंभिक नेताओं को उदारवादी नेता कहा जाता है। इनमें दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और बदरुद्दीन तैयबजी जैसे प्रमुख नेता शामिल थे।
इन नेताओं का विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार न्यायप्रिय है और उचित मांगों को स्वीकार करेगी। इसलिए वे शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक उपायों का समर्थन करते थे। उन्होंने भाषणों, प्रस्तावों और जनमत के माध्यम से राजनीतिक सुधारों की मांग की।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का महत्व
राष्ट्रीय आंदोलन की नींव
कांग्रेस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत नींव रखी। इसने देशभर के लोगों को एक राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
राजनीतिक शिक्षा का माध्यम
कांग्रेस ने भारतीयों को राजनीतिक रूप से शिक्षित किया। लोगों को शासन व्यवस्था, अधिकारों और राष्ट्रीय हितों की जानकारी प्राप्त हुई।
राष्ट्रीय एकता का विकास
कांग्रेस ने विभिन्न प्रांतों, भाषाओं और धर्मों के लोगों को एकजुट करने का कार्य किया। इससे राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हुई।
स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व
आगे चलकर कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसी संगठन के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया।
जनमत निर्माण में योगदान
कांग्रेस ने समाचार पत्रों, सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक अभियानों के माध्यम से जनमत तैयार किया। इससे लोगों में राष्ट्रीय चेतना का व्यापक प्रसार हुआ।
कांग्रेस की स्थापना के संबंध में विभिन्न मत
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना को लेकर इतिहासकारों के बीच विभिन्न मत पाए जाते हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं का परिणाम थी। वहीं कुछ विद्वान इसे ए. ओ. ह्यूम द्वारा अपनाई गई “सुरक्षा वाल्व सिद्धांत” से जोड़ते हैं, जिसके अनुसार बढ़ते हुए असंतोष को शांतिपूर्ण दिशा देने के लिए कांग्रेस का गठन किया गया।
हालांकि अधिकांश इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि कांग्रेस की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में एक महत्वपूर्ण घटना थी और इसने देश में राजनीतिक जागरूकता तथा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया।
निष्कर्ष
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। 1885 में स्थापित यह संगठन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख आधार बना। इसने भारतीयों को एक राष्ट्रीय मंच प्रदान किया, राजनीतिक चेतना का विकास किया और राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाया। प्रारंभ में कांग्रेस ने संवैधानिक और शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से सुधारों की मांग की, लेकिन आगे चलकर यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे शक्तिशाली संगठन बन गई। इसलिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत और आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
प्रश्न 02 : लखनऊ समझौता (1916) का वर्णन कीजिए।
भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) 1916 एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। यह समझौता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ था। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा था। दूसरी ओर, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद भी मौजूद थे। ऐसे समय में दोनों संगठनों का एक मंच पर आना भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। लखनऊ समझौते ने राष्ट्रीय एकता को बल प्रदान किया तथा भारतीयों की राजनीतिक मांगों को अधिक प्रभावशाली ढंग से ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया।
1916 में हुए इस समझौते ने न केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग स्थापित किया, बल्कि भारतीय स्वशासन की मांग को भी अधिक संगठित रूप में सामने रखा। इसी कारण लखनऊ समझौता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है।
लखनऊ समझौते की पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय राजनीति में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। 1905 में बंगाल विभाजन के कारण पूरे देश में असंतोष फैल गया था। इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसने राष्ट्रीय भावना को मजबूत बनाया।
1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। प्रारंभ में लीग का दृष्टिकोण कांग्रेस से भिन्न था और वह ब्रिटिश सरकार के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख रखती थी। दूसरी ओर, कांग्रेस भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रही थी।
1911 में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया गया। इसके बाद धीरे-धीरे कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच निकटता बढ़ने लगी। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान भारतीय नेताओं ने महसूस किया कि यदि वे एकजुट होकर अपनी मांगें प्रस्तुत करें तो ब्रिटिश सरकार पर अधिक प्रभाव डाला जा सकता है। यही परिस्थितियाँ लखनऊ समझौते की पृष्ठभूमि बनीं।
लखनऊ अधिवेशन, 1916
1916 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में आयोजित किया गया। इसी समय मुस्लिम लीग का अधिवेशन भी लखनऊ में हुआ। दोनों संगठनों के नेताओं ने आपसी विचार-विमर्श के बाद एक समझौते पर सहमति व्यक्त की, जिसे इतिहास में “लखनऊ समझौता” कहा जाता है।
इस समझौते में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने पहली बार मिलकर राजनीतिक सुधारों की एक संयुक्त योजना प्रस्तुत की। यह भारतीय राजनीति में हिंदू-मुस्लिम सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
लखनऊ समझौते के प्रमुख उद्देश्य
राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाना
समझौते का प्रमुख उद्देश्य विभिन्न समुदायों के बीच सहयोग स्थापित करना था ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक व्यापक समर्थन मिल सके।
ब्रिटिश शासन पर दबाव बनाना
कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों यह चाहती थीं कि भारतीयों को प्रशासन में अधिक अधिकार प्राप्त हों। संयुक्त रूप से मांग करने से उनकी आवाज अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।
स्वशासन की मांग को सशक्त बनाना
भारतीय नेताओं का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन व्यवस्था की स्थापना करना था। लखनऊ समझौते ने इस मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
राजनीतिक सहयोग स्थापित करना
दोनों संगठनों ने यह समझा कि आपसी मतभेदों को कम करके राष्ट्रीय हितों के लिए साथ कार्य करना आवश्यक है।
लखनऊ समझौते की प्रमुख शर्तें
विधान परिषदों का विस्तार
समझौते में मांग की गई कि केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सके।
निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाना
यह प्रस्ताव रखा गया कि अधिकांश सदस्य चुनाव के माध्यम से चुने जाएं और नामित सदस्यों की संख्या कम की जाए।
कार्यपालिका पर नियंत्रण
विधान परिषदों को अधिक अधिकार दिए जाने की मांग की गई ताकि वे प्रशासनिक कार्यों पर प्रभावी नियंत्रण रख सकें।
स्वशासन की दिशा में कदम
भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी देने तथा उत्तरदायी सरकार की स्थापना की मांग की गई।
अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था
मुस्लिम लीग की मांग के अनुसार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों (Separate Electorates) की व्यवस्था को स्वीकार किया गया। इसके अंतर्गत मुसलमान अपने प्रतिनिधियों का चुनाव स्वयं करते थे।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा
समझौते में विभिन्न समुदायों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधानों का समर्थन किया गया।
लखनऊ समझौते में पृथक निर्वाचन का प्रश्न
लखनऊ समझौते का सबसे चर्चित पहलू पृथक निर्वाचन क्षेत्र की स्वीकृति थी। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग बनाए रखने के लिए इस मांग को स्वीकार कर लिया।
उस समय कांग्रेस के नेताओं को विश्वास था कि इस कदम से हिंदू-मुस्लिम एकता मजबूत होगी और राष्ट्रीय आंदोलन को लाभ मिलेगा। हालांकि बाद के वर्षों में कुछ इतिहासकारों ने माना कि पृथक निर्वाचन प्रणाली ने सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया और भविष्य में कई राजनीतिक समस्याओं का कारण बनी।
लखनऊ समझौते का महत्व
कांग्रेस और मुस्लिम लीग का सहयोग
यह पहली बार था जब दोनों प्रमुख राजनीतिक संगठन एक साझा कार्यक्रम पर सहमत हुए। इससे राष्ट्रीय आंदोलन को नई शक्ति मिली।
हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक
लखनऊ समझौते को हिंदू-मुस्लिम एकता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। इसने यह संदेश दिया कि विभिन्न समुदाय राष्ट्रीय हितों के लिए मिलकर कार्य कर सकते हैं।
राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा
समझौते के कारण स्वतंत्रता आंदोलन अधिक संगठित और प्रभावशाली बना। भारतीय नेताओं की मांगों को अधिक गंभीरता से लिया जाने लगा।
स्वशासन की मांग को बल
इस समझौते ने भारत में स्वशासन की मांग को मजबूत आधार प्रदान किया और राजनीतिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
राजनीतिक जागरूकता का विस्तार
समझौते के कारण देशभर में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ और लोगों की भागीदारी बढ़ी।
लखनऊ समझौते की सीमाएँ
पृथक निर्वाचन की व्यवस्था
समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार करना माना जाता है। इससे सांप्रदायिक राजनीति को प्रोत्साहन मिला।
स्थायी एकता स्थापित न हो सकी
यद्यपि समझौते ने अस्थायी रूप से कांग्रेस और मुस्लिम लीग को निकट लाया, लेकिन यह सहयोग लंबे समय तक कायम नहीं रह सका।
ब्रिटिश सरकार की सीमित प्रतिक्रिया
भारतीय नेताओं की मांगों को तत्काल पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया गया, जिससे अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सके।
इतिहासकारों की दृष्टि में लखनऊ समझौता
अनेक इतिहासकार लखनऊ समझौते को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं। उनके अनुसार इसने भारतीय राजनीति में सहयोग और एकता की भावना को मजबूत किया। वहीं कुछ इतिहासकारों का मत है कि पृथक निर्वाचन की स्वीकृति भविष्य में सांप्रदायिक विभाजन का आधार बनी।
फिर भी अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि 1916 का लखनऊ समझौता उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम था।
निष्कर्ष
लखनऊ समझौता 1916 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक साझा मंच पर लाकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। समझौते ने स्वशासन की मांग को बल दिया, राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा दिया और भारतीयों की आवाज को अधिक प्रभावशाली बनाया। यद्यपि पृथक निर्वाचन की व्यवस्था इसकी प्रमुख कमजोरी मानी जाती है, फिर भी उस समय के संदर्भ में यह समझौता राष्ट्रीय आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि था। इसलिए लखनऊ समझौता भारतीय राजनीति में सहयोग, एकता और राजनीतिक जागरूकता का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
प्रश्न 03 : सविनय अवज्ञा आंदोलन का वर्णन कीजिए।
भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सविनय अवज्ञा आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में वर्ष 1930 में प्रारंभ किया गया था। इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों और कानूनों का अहिंसात्मक तरीके से विरोध करना था। “सविनय अवज्ञा” का अर्थ है—किसी अन्यायपूर्ण कानून का शांतिपूर्ण और खुले रूप में उल्लंघन करना तथा उसके लिए मिलने वाले दंड को स्वेच्छा से स्वीकार करना।
यह आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण था क्योंकि इसने स्वतंत्रता की मांग को जन-जन तक पहुंचाया। इस आंदोलन में किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं तथा व्यापारियों सहित समाज के विभिन्न वर्गों ने सक्रिय भाग लिया। सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया और भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा प्रदान की।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि
बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक भारतीय जनता ब्रिटिश शासन की नीतियों से अत्यधिक असंतुष्ट हो चुकी थी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्थिक संकट, बढ़ते कर, बेरोजगारी तथा राजनीतिक अधिकारों की कमी ने लोगों में असंतोष पैदा कर दिया था।
1927 में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन की नियुक्ति की, जिसमें कोई भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। इसका पूरे देश में विरोध हुआ। इसके बाद भारतीय नेताओं ने राजनीतिक सुधारों की मांग को और अधिक जोरदार तरीके से उठाया।
1929 में लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने “पूर्ण स्वराज” को अपना लक्ष्य घोषित किया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया।
आंदोलन के प्रारंभ होने के कारण
पूर्ण स्वराज की मांग
कांग्रेस अब केवल सुधारों से संतुष्ट नहीं थी। उसका लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था।
ब्रिटिश आर्थिक शोषण
ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय उद्योगों, किसानों और व्यापारियों को भारी नुकसान हो रहा था।
नमक कर का विरोध
नमक प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इस पर कर लगा रखा था। गांधीजी ने इसे अन्यायपूर्ण माना और इसके विरोध को आंदोलन का आधार बनाया।
राजनीतिक अधिकारों का अभाव
भारतीयों को शासन में पर्याप्त भागीदारी नहीं दी जा रही थी। इससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा था।
दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह
सविनय अवज्ञा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण चरण दांडी यात्रा थी। महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 सहयोगियों के साथ दांडी यात्रा प्रारंभ की।
यह यात्रा लगभग 240 मील लंबी थी। गांधीजी ने अनेक गांवों से होकर यात्रा की और लोगों को आंदोलन के उद्देश्यों से अवगत कराया। 6 अप्रैल 1930 को वे दांडी पहुंचे और समुद्र के पानी से नमक बनाकर ब्रिटिश कानून का उल्लंघन किया।
इस घटना ने पूरे देश में एक नई चेतना उत्पन्न की और लाखों लोग आंदोलन से जुड़ गए। नमक सत्याग्रह सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रतीक बन गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
नमक कानून का उल्लंघन
देश के विभिन्न भागों में लोगों ने नमक बनाकर और बेचकर ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
भारतीयों ने विदेशी कपड़ों और अन्य वस्तुओं का बहिष्कार किया तथा स्वदेशी वस्तुओं को अपनाया।
करों का भुगतान न करना
कई स्थानों पर किसानों ने भूमि कर और अन्य करों का भुगतान करने से इंकार कर दिया।
सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार
लोगों ने सरकारी कार्यालयों, न्यायालयों और शैक्षणिक संस्थानों का विरोध किया।
शराब की दुकानों के सामने धरना
महिलाओं और स्वयंसेवकों ने शराब की दुकानों के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए।
महिलाओं की भूमिका
सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने पहली बार बड़े पैमाने पर भाग लिया। सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, कस्तूरबा गांधी और अन्य अनेक महिलाओं ने आंदोलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
महिलाओं ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, नमक सत्याग्रह तथा जन-जागरण कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके योगदान से आंदोलन और अधिक व्यापक बन गया।
किसानों और मजदूरों की भागीदारी
सविनय अवज्ञा आंदोलन केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं था। किसानों और मजदूरों ने भी इसमें उत्साहपूर्वक भाग लिया।
किसानों ने करों का विरोध किया और ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। मजदूरों ने हड़तालों और सभाओं के माध्यम से आंदोलन का समर्थन किया। इससे आंदोलन को जन-आंदोलन का स्वरूप प्राप्त हुआ।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। महात्मा गांधी सहित अनेक प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया गया।
सरकार ने सभाओं, जुलूसों और प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और दमनकारी कार्रवाइयाँ भी की गईं। लेकिन इसके बावजूद आंदोलन जारी रहा और जनता का उत्साह कम नहीं हुआ।
गांधी-इरविन समझौता
आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने बातचीत का मार्ग अपनाया। मार्च 1931 में गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच गांधी-इरविन समझौता हुआ।
इस समझौते के अंतर्गत राजनीतिक बंदियों को रिहा करने तथा कुछ अन्य रियायतें देने का आश्वासन दिया गया। इसके बाद गांधीजी ने आंदोलन अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए।
आंदोलन का पुनः प्रारंभ
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। गांधीजी के भारत लौटने के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ किया गया।
ब्रिटिश सरकार ने फिर से दमनकारी नीतियाँ अपनाईं और अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अंततः 1934 में गांधीजी ने आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्व
राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार
इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को गांव-गांव तक पहुंचा दिया। बड़ी संख्या में सामान्य लोग आंदोलन से जुड़े।
अहिंसा की शक्ति का प्रदर्शन
गांधीजी ने यह सिद्ध किया कि बिना हिंसा के भी अन्यायपूर्ण शासन का प्रभावी विरोध किया जा सकता है।
महिलाओं की सक्रिय भागीदारी
इस आंदोलन ने भारतीय महिलाओं को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ब्रिटिश शासन की कमजोरियों का खुलासा
आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार जनता के व्यापक विरोध का सामना करने में कठिनाई महसूस कर रही थी।
स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करना
सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीयों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना का विकास किया। लोगों में स्वतंत्रता प्राप्ति की इच्छा और अधिक प्रबल हुई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ
पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हो सकी
आंदोलन के बावजूद तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई।
कुछ क्षेत्रों में सीमित प्रभाव
देश के कुछ भागों में आंदोलन का प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा।
कठोर सरकारी दमन
ब्रिटिश सरकार के दमन के कारण आंदोलन को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
निष्कर्ष
सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आंदोलन था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारंभ हुए इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-जागरण की नई लहर उत्पन्न की। नमक सत्याग्रह, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, करों का विरोध तथा अहिंसात्मक संघर्ष इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। इस आंदोलन ने भारतीय जनता को एकजुट किया, महिलाओं और किसानों की भागीदारी बढ़ाई तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग को और अधिक मजबूत बनाया। यद्यपि यह आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता दिलाने में सफल नहीं हुआ, फिर भी इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और अंततः भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
प्रश्न 04 : भारत छोड़ो आंदोलन पर एक निबंध लिखिए।
भूमिका
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भारत छोड़ो आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह आंदोलन वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया था। इसे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय जनता के सबसे व्यापक और शक्तिशाली आंदोलनों में से एक माना जाता है। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को भारत छोड़ने के लिए बाध्य करना तथा देश को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना था।
भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को एक निर्णायक मोड़ प्रदान किया। इस आंदोलन में छात्रों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं तथा अन्य वर्गों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने इसे कठोर दमन द्वारा दबाने का प्रयास किया, फिर भी इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारत पर अंग्रेजों का शासन अधिक समय तक नहीं चल सकता। इसी कारण इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अंतिम जनआंदोलन भी कहा जाता है।
भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को बिना भारतीय नेताओं की सहमति के युद्ध में शामिल कर लिया था। इस निर्णय से भारतीय नेताओं और जनता में असंतोष फैल गया। कांग्रेस का मत था कि यदि भारत को युद्ध में भाग लेना है, तो उसे पहले स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए।
1942 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को संतुष्ट करने के लिए सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। उन्होंने कुछ संवैधानिक प्रस्ताव प्रस्तुत किए, जिन्हें क्रिप्स प्रस्ताव कहा जाता है। लेकिन इन प्रस्तावों में तत्काल स्वतंत्रता का कोई प्रावधान नहीं था। इसलिए कांग्रेस ने इन्हें अस्वीकार कर दिया।
क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारत को शीघ्र स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं है। परिणामस्वरूप कांग्रेस ने एक व्यापक आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया, जिसे भारत छोड़ो आंदोलन कहा गया।
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रारंभ
अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (वर्तमान अगस्त क्रांति मैदान) में आयोजित की गई। इस बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया गया।
महात्मा गांधी ने अपने ऐतिहासिक भाषण में “करो या मरो” का नारा दिया। उन्होंने भारतीय जनता से कहा कि अब स्वतंत्रता प्राप्त किए बिना रुकना नहीं है। यह नारा पूरे देश में स्वतंत्रता की प्रेरणा का स्रोत बन गया।
9 अगस्त 1942 को आंदोलन औपचारिक रूप से प्रारंभ हुआ और देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया।
आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य
ब्रिटिश शासन का अंत
आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भारत से अंग्रेजी शासन को समाप्त करना था।
पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति
कांग्रेस अब किसी प्रकार के सीमित सुधार या स्वशासन से संतुष्ट नहीं थी। उसका लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता था।
राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना
आंदोलन के माध्यम से सभी भारतीयों को एकजुट कर स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक रूप देना था।
जनता को स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल करना
इस आंदोलन का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना था।
महात्मा गांधी की भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख नेता महात्मा गांधी थे। उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों के आधार पर आंदोलन का नेतृत्व किया।
गांधीजी का विश्वास था कि यदि भारतीय जनता संगठित होकर ब्रिटिश शासन का विरोध करे तो अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ेगा। “करो या मरो” का उनका आह्वान पूरे देश में अत्यंत लोकप्रिय हुआ और लोगों में नई ऊर्जा का संचार हुआ।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
आंदोलन प्रारंभ होते ही ब्रिटिश सरकार ने कठोर कदम उठाए। 9 अगस्त 1942 की सुबह ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद तथा कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
कांग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया गया। सभाओं, जुलूसों और प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पुलिस और सेना का उपयोग करके आंदोलन को दबाने का प्रयास किया गया।
हालांकि नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन रुक नहीं सका। जनता ने स्वतः आंदोलन को आगे बढ़ाया।
जनता की भागीदारी
छात्रों की भूमिका
देशभर के विद्यार्थियों ने आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने रैलियों, प्रदर्शनों और जनजागरण अभियानों का आयोजन किया।
किसानों का योगदान
ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आवाज उठाई। कई स्थानों पर उन्होंने सरकारी नीतियों का विरोध किया और आंदोलन को समर्थन दिया।
मजदूरों की भागीदारी
मजदूरों ने हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से आंदोलन में योगदान दिया। इससे आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ।
महिलाओं की भूमिका
महिलाओं ने भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, उषा मेहता तथा अनेक अन्य महिलाओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।
भूमिगत गतिविधियाँ
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कई कार्यकर्ता भूमिगत होकर आंदोलन चलाने लगे। उन्होंने गुप्त सभाओं, प्रचार अभियानों और संदेशों के माध्यम से जनता को आंदोलन से जोड़कर रखा।
उषा मेहता द्वारा संचालित गुप्त कांग्रेस रेडियो ने आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित समाचार और संदेश जनता तक पहुंचाए जाते थे।
समानांतर सरकारों की स्थापना
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ क्षेत्रों में समानांतर सरकारों की स्थापना भी की गई।
बलिया (उत्तर प्रदेश), सतारा (महाराष्ट्र) और तमलुक (बंगाल) जैसे क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने स्वतंत्र प्रशासन स्थापित करने का प्रयास किया। यह ब्रिटिश शासन के प्रति जनता के असंतोष और आत्मविश्वास का प्रतीक था।
भारत छोड़ो आंदोलन का महत्व
स्वतंत्रता संघर्ष का निर्णायक चरण
यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और सबसे व्यापक जनआंदोलन था। इसने स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रक्रिया को तेज कर दिया।
जनता की व्यापक भागीदारी
पहली बार देश के लगभग सभी वर्गों ने इतनी बड़ी संख्या में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।
ब्रिटिश शासन की कमजोरी उजागर हुई
आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता की इच्छा के विरुद्ध अधिक समय तक शासन नहीं कर सकती।
राष्ट्रीय चेतना का विकास
इस आंदोलन ने भारतीयों में राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की भावना को और अधिक मजबूत किया।
स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ
यद्यपि आंदोलन तत्काल सफल नहीं हुआ, लेकिन इसके बाद ब्रिटिश सरकार को यह समझ आ गया कि भारत में शासन जारी रखना कठिन हो गया है। अंततः 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।
भारत छोड़ो आंदोलन की सीमाएँ
नेताओं की शीघ्र गिरफ्तारी
आंदोलन के प्रारंभ में ही प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कारण केंद्रीय नेतृत्व कमजोर हो गया।
कठोर दमन
ब्रिटिश सरकार ने पुलिस और सेना के माध्यम से आंदोलन को दबाने का प्रयास किया, जिससे अनेक लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
संगठनात्मक चुनौतियाँ
नेतृत्व की अनुपस्थिति में कई स्थानों पर आंदोलन संगठित रूप से नहीं चल पाया।
भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना थी जिसने ब्रिटिश शासन की जड़ों को हिला दिया। इस आंदोलन के बाद अंग्रेजों को यह अनुभव हो गया कि भारत में उनका शासन स्थायी नहीं रह सकता। भारतीय जनता की एकता, साहस और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण ने विश्व को प्रभावित किया।
इतिहासकारों का मानना है कि भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई का आधार तैयार किया। इस आंदोलन ने भारतीयों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गौरव की भावना को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
निष्कर्ष
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक और निर्णायक आंदोलन था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारंभ हुए इस आंदोलन ने पूरे देश को स्वतंत्रता के लक्ष्य के लिए एकजुट कर दिया। “करो या मरो” का नारा भारतीय जनता के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक बन गया। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने का भरसक प्रयास किया, फिर भी यह आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन ने भारतीयों की राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया, ब्रिटिश शासन की नींव को कमजोर किया और अंततः भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए यह आंदोलन भारतीय इतिहास में सदैव एक गौरवपूर्ण और प्रेरणादायक अध्याय के रूप में स्मरण किया जाएगा।
प्रश्न 05 : “भारत का विभाजन अपरिहार्य था” – इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
भूमिका
भारत का विभाजन आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और दुखद घटनाओं में से एक माना जाता है। वर्ष 1947 में ब्रिटिश शासन की समाप्ति के साथ भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। इस विभाजन के कारण लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, व्यापक हिंसा हुई और असंख्य लोगों की जानें गईं। इसलिए इतिहासकारों, राजनीतिक विचारकों और विद्वानों के बीच लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि क्या भारत का विभाजन वास्तव में अपरिहार्य था या इसे रोका जा सकता था।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, सांप्रदायिक तनावों और कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा ब्रिटिश सरकार के बीच बढ़ते मतभेदों के कारण विभाजन को टालना लगभग असंभव हो गया था। वहीं कुछ विद्वान यह मानते हैं कि यदि राजनीतिक नेतृत्व अधिक दूरदर्शिता और समझदारी से कार्य करता, तो विभाजन को रोका जा सकता था। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर संतुलित दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।
भारत विभाजन की पृष्ठभूमि
भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोग लंबे समय तक साथ रहते आए थे। हालांकि अंग्रेजों की नीतियों ने धीरे-धीरे सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा दिया। ब्रिटिश सरकार ने “फूट डालो और शासन करो” की नीति अपनाकर विभिन्न समुदायों के बीच मतभेदों को बढ़ाने का प्रयास किया।
1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और धीरे-धीरे उसने मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा को अपना प्रमुख उद्देश्य बना लिया। 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू की गई, जिसने सांप्रदायिक राजनीति को और मजबूत किया। इसके बाद हिंदू और मुस्लिम राजनीति के बीच दूरी बढ़ती चली गई।
विभाजन को अपरिहार्य बनाने वाले कारण
सांप्रदायिक राजनीति का विकास
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही सांप्रदायिक राजनीति का प्रभाव बढ़ने लगा था। विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने धार्मिक आधार पर समर्थन जुटाने का प्रयास किया। इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर होने लगी।
मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे संगठनों की गतिविधियों ने राजनीतिक वातावरण को अधिक सांप्रदायिक बना दिया। परिणामस्वरूप दोनों समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता गया।
ब्रिटिश शासन की विभाजनकारी नीति
ब्रिटिश सरकार ने अपने शासन को मजबूत बनाए रखने के लिए समुदायों के बीच मतभेदों को बढ़ावा दिया। पृथक निर्वाचन प्रणाली और सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व जैसी व्यवस्थाओं ने सामाजिक और राजनीतिक विभाजन को गहरा किया।
ब्रिटिश अधिकारियों ने कई अवसरों पर ऐसी नीतियाँ अपनाईं जिनसे विभिन्न समुदायों के बीच सहयोग के बजाय प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की भावना विकसित हुई।
द्विराष्ट्र सिद्धांत
मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने द्विराष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया। इस सिद्धांत के अनुसार हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं और उनके राजनीतिक हित भी अलग हैं।
1940 के लाहौर प्रस्ताव में मुस्लिम लीग ने अलग राष्ट्र की मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखा। इसके बाद पाकिस्तान की मांग लगातार मजबूत होती गई।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। दोनों संगठनों के राजनीतिक दृष्टिकोण अलग-अलग थे। अनेक वार्ताओं और समझौतों के प्रयासों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकल सका।
कैबिनेट मिशन योजना जैसी महत्वपूर्ण योजनाएँ भी अंततः सफल नहीं हो सकीं। इससे विभाजन की संभावना और बढ़ गई।
1946 के सांप्रदायिक दंगे
1946 में विभिन्न क्षेत्रों में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए। कलकत्ता, नोआखाली, बिहार और पंजाब में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। इन घटनाओं ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
लगातार बढ़ती हिंसा के कारण अनेक नेताओं को लगने लगा कि विभाजन ही शांति स्थापित करने का एकमात्र उपाय रह गया है।
वे तर्क जो विभाजन को अपरिहार्य मानते हैं
राजनीतिक परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल हो चुकी थीं
1940 के दशक तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच अविश्वास बहुत बढ़ चुका था। दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ थे। ऐसे में संयुक्त भारत की कल्पना को व्यवहार में लागू करना कठिन होता जा रहा था।
पाकिस्तान की मांग व्यापक समर्थन प्राप्त कर चुकी थी
मुस्लिम लीग ने बड़ी संख्या में मुसलमानों का समर्थन प्राप्त कर लिया था। 1946 के चुनावों में लीग की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान की मांग को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिल रहा था।
गृहयुद्ध की आशंका
यदि विभाजन न किया जाता तो सांप्रदायिक संघर्ष और अधिक बढ़ सकता था। कई नेताओं को आशंका थी कि देश व्यापक गृहयुद्ध की स्थिति में पहुँच सकता है।
ब्रिटिश सरकार की जल्दबाजी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन भारत में अधिक समय तक शासन जारी रखने की स्थिति में नहीं था। वह शीघ्र सत्ता हस्तांतरण चाहता था। इस जल्दबाजी ने विभाजन को और अधिक संभावित बना दिया।
वे तर्क जो विभाजन को अपरिहार्य नहीं मानते
भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत
सदियों तक हिंदू और मुसलमान एक साथ रहते आए थे। दोनों समुदायों ने भारतीय संस्कृति, कला, साहित्य और परंपराओं को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसलिए केवल धार्मिक आधार पर विभाजन आवश्यक नहीं था।
कैबिनेट मिशन योजना एक विकल्प थी
1946 की कैबिनेट मिशन योजना ने संयुक्त भारत को बनाए रखने का प्रयास किया था। यदि सभी पक्ष इस योजना पर सहमत हो जाते, तो विभाजन टाला जा सकता था।
राजनीतिक नेतृत्व की असफलता
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार के नेताओं के बीच पर्याप्त संवाद और समझौते की कमी रही। यदि अधिक धैर्य और दूरदर्शिता दिखाई जाती, तो विभाजन से बचा जा सकता था।
विभाजन के बाद भी समस्याएँ समाप्त नहीं हुईं
विभाजन को समाधान माना गया था, लेकिन इसके बाद भी भारत और पाकिस्तान के बीच कई विवाद उत्पन्न हुए। इससे यह तर्क दिया जाता है कि विभाजन सभी समस्याओं का अंतिम समाधान नहीं था।
विभाजन के परिणाम
मानवीय त्रासदी
विभाजन के कारण लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। इतिहास में इसे सबसे बड़े जन-स्थानांतरणों में से एक माना जाता है।
सांप्रदायिक हिंसा
विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। लाखों लोग प्रभावित हुए और अनेक परिवार बिखर गए।
भारत और पाकिस्तान का गठन
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और पाकिस्तान एक अलग राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ।
दीर्घकालीन राजनीतिक प्रभाव
विभाजन का प्रभाव भारत और पाकिस्तान के संबंधों पर लंबे समय तक पड़ा। कई राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी समस्याएँ आज भी इसी ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हुई हैं।
मेरा मत
मेरे विचार से यह कहना पूरी तरह उचित नहीं होगा कि भारत का विभाजन पूर्णतः अपरिहार्य था। यह सत्य है कि 1940 के दशक तक परिस्थितियाँ अत्यंत जटिल हो चुकी थीं और विभाजन की संभावना बहुत बढ़ गई थी। सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक मतभेद और ब्रिटिश नीतियों ने स्थिति को गंभीर बना दिया था।
फिर भी इतिहास में ऐसे कई अवसर आए जब समझौते और संवाद के माध्यम से संयुक्त भारत को बनाए रखा जा सकता था। यदि राजनीतिक नेतृत्व और ब्रिटिश सरकार अधिक दूरदर्शी नीति अपनाते, तो संभवतः विभाजन से बचा जा सकता था। इसलिए विभाजन को पूरी तरह अपरिहार्य मानना उचित नहीं प्रतीत होता, हालांकि उस समय की परिस्थितियों ने इसे लगभग अनिवार्य बना दिया था।
निष्कर्ष
भारत का विभाजन भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दुखद घटना थी। इसके पीछे सांप्रदायिक राजनीति, ब्रिटिश शासन की नीतियाँ, द्विराष्ट्र सिद्धांत, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मतभेद तथा बढ़ती हिंसा जैसे अनेक कारण जिम्मेदार थे। एक पक्ष इसे तत्कालीन परिस्थितियों का अनिवार्य परिणाम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि उचित राजनीतिक समझ और संवाद के माध्यम से इसे रोका जा सकता था। वस्तुतः भारत का विभाजन कई राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों का संयुक्त परिणाम था। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यद्यपि विभाजन की संभावना अत्यधिक बढ़ चुकी थी, फिर भी इसे पूरी तरह अपरिहार्य घोषित करना इतिहास की जटिलताओं को सरल बना देना होगा।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 01 : बंगाल का विभाजन
भूमिका
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। वर्ष 1905 में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन किया गया। ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रशासनिक सुविधा के लिए आवश्यक बताया, लेकिन भारतीय जनता और राष्ट्रीय नेताओं ने इसे अंग्रेजों की “फूट डालो और शासन करो” की नीति का हिस्सा माना। बंगाल विभाजन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की और इसके विरोध में प्रारंभ हुआ स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
बंगाल विभाजन ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना को जागृत किया और लोगों को अंग्रेजी शासन के वास्तविक उद्देश्यों का एहसास कराया। इस घटना ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बंगाल विभाजन की पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक बंगाल ब्रिटिश भारत का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रांत था। इसमें वर्तमान पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार, उड़ीसा तथा असम के कुछ भाग शामिल थे। उस समय बंगाल की जनसंख्या लगभग आठ करोड़ थी।
ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि इतना विशाल प्रांत प्रशासनिक दृष्टि से संभालना कठिन हो रहा है। इसलिए प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए बंगाल का विभाजन आवश्यक है। हालांकि भारतीय नेताओं का मानना था कि यह केवल एक बहाना था और वास्तविक उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना था।
लॉर्ड कर्जन की भूमिका
लॉर्ड कर्जन 1899 से 1905 तक भारत का वायसराय रहा। वह भारतीय राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव से चिंतित था। बंगाल उस समय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था। शिक्षित वर्ग, पत्रकार, छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहे थे।
कर्जन का मानना था कि यदि बंगाल को विभाजित कर दिया जाए तो राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति कमजोर हो जाएगी। इसी सोच के तहत उसने बंगाल विभाजन की योजना तैयार की।
बंगाल विभाजन की घोषणा
16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन लागू किया गया। इसके अनुसार बंगाल को दो भागों में विभाजित किया गया—
पूर्वी बंगाल और असम
इस नए प्रांत की राजधानी ढाका बनाई गई। इसमें मुस्लिम जनसंख्या अधिक थी।
पश्चिमी बंगाल
इसमें बंगाल का पश्चिमी भाग, बिहार और उड़ीसा शामिल किए गए। इसकी राजधानी कलकत्ता रही।
ब्रिटिश सरकार ने दावा किया कि यह विभाजन प्रशासनिक सुविधा के लिए किया गया है, लेकिन भारतीय जनता ने इसे राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित निर्णय माना।
बंगाल विभाजन के वास्तविक उद्देश्य
राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना
बंगाल उस समय भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र था। अंग्रेज चाहते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को तोड़ा जाए।
हिंदू-मुस्लिम एकता में विभाजन
ब्रिटिश सरकार ने धार्मिक आधार पर लोगों को अलग-अलग करने की नीति अपनाई। इससे सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा मिला।
“फूट डालो और शासन करो” की नीति
अंग्रेजों का उद्देश्य भारतीय समाज में विभाजन पैदा करके अपने शासन को मजबूत बनाए रखना था।
राजनीतिक नेतृत्व को कमजोर करना
बंगाल के शिक्षित और जागरूक वर्ग का प्रभाव कम करने के लिए भी यह कदम उठाया गया।
बंगाल विभाजन का विरोध
बंगाल विभाजन का पूरे देश में तीव्र विरोध हुआ। भारतीय नेताओं और जनता ने इसे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध बताया। विरोध आंदोलन धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गया।
जनसभाएँ और प्रदर्शन
विभाजन के विरोध में अनेक सभाएँ आयोजित की गईं। हजारों लोगों ने जुलूसों और प्रदर्शनों में भाग लिया।
रक्षाबंधन कार्यक्रम
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के लिए रक्षाबंधन उत्सव का आयोजन किया। लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधकर एकता का संदेश दिया।
राष्ट्रीय गीतों का प्रयोग
“वंदे मातरम्” राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया। इससे लोगों में देशभक्ति की भावना और अधिक मजबूत हुई।
स्वदेशी आंदोलन का प्रारंभ
बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ हुआ। इसका उद्देश्य भारतीय वस्तुओं का उपयोग बढ़ाना और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना था।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
लोगों ने ब्रिटिश निर्मित कपड़ों और अन्य वस्तुओं का उपयोग बंद करना शुरू किया।
स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन
भारतीय उद्योगों और हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया गया। स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को राष्ट्रीय कर्तव्य माना गया।
राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन
विद्यार्थियों और शिक्षकों ने राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की स्थापना की। इसका उद्देश्य भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रदान करना था।
जन-जागरण
स्वदेशी आंदोलन ने लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई और स्वतंत्रता की भावना को मजबूत किया।
बंगाल विभाजन का राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव
राष्ट्रीय चेतना का विकास
बंगाल विभाजन ने भारतीयों में राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया। लोगों ने पहली बार बड़े पैमाने पर राजनीतिक आंदोलनों में भाग लिया।
जन-आंदोलन की शुरुआत
स्वतंत्रता संघर्ष केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं रहा। इसमें छात्र, महिलाएँ, व्यापारी और किसान भी शामिल होने लगे।
उग्र राष्ट्रवाद का उदय
इस घटना के बाद उग्रवादी नेताओं का प्रभाव बढ़ा। बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं को व्यापक समर्थन मिला।
स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का विस्तार
इन आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान की।
राजनीतिक संगठनों का विकास
बंगाल विभाजन के विरोध ने विभिन्न राजनीतिक संगठनों और आंदोलनों को मजबूत बनाया।
बंगाल विभाजन की समाप्ति
बंगाल विभाजन के विरुद्ध लगातार हो रहे जन-विरोध के कारण ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। अंततः 1911 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की।
दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने विभाजन समाप्त करने की घोषणा की। साथ ही भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।
विभाजन की समाप्ति भारतीय जनता और राष्ट्रीय आंदोलन की एक बड़ी विजय मानी गई।
बंगाल विभाजन का ऐतिहासिक महत्व
राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा मिली
इस घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अधिक व्यापक और संगठित बनाया।
जनता की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी
पहली बार बड़ी संख्या में सामान्य लोग राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े।
स्वदेशी आंदोलन का जन्म
स्वदेशी आंदोलन ने आर्थिक राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया।
ब्रिटिश नीतियों का वास्तविक स्वरूप उजागर हुआ
भारतीय जनता को यह समझ में आया कि अंग्रेज अपने राजनीतिक हितों के लिए विभाजनकारी नीतियाँ अपना रहे हैं।
भविष्य के आंदोलनों की आधारशिला
बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन ने आगे चलकर असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे आंदोलनों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
निष्कर्ष
बंगाल विभाजन भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को नई गति और दिशा प्रदान की। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रशासनिक सुविधा के नाम पर लागू किया था, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीयता को कमजोर करना था। भारतीय जनता ने इसका व्यापक विरोध किया और स्वदेशी आंदोलन के माध्यम से अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। अंततः 1911 में विभाजन रद्द कर दिया गया, जो भारतीय जनता की एक महत्वपूर्ण जीत थी। इसलिए बंगाल विभाजन को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाता है, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष को जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
प्रश्न 02 : होमरूल लीग आंदोलन
भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में होमरूल लीग आंदोलन का विशेष महत्व है। यह आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों को स्वशासन प्राप्त कराने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था। “होमरूल” का अर्थ है—अपने देश का शासन स्वयं चलाने का अधिकार। इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और जनता में राजनीतिक जागरूकता का विस्तार किया।
होमरूल लीग आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने किया। इन नेताओं ने देशभर में स्वशासन की मांग को लोकप्रिय बनाया और भारतीयों को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया। यह आंदोलन आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक मजबूत आधार सिद्ध हुआ।
होमरूल लीग आंदोलन की पृष्ठभूमि
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। 1905 के बंगाल विभाजन, स्वदेशी आंदोलन तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास ने भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाया था। दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार भारतीयों को पर्याप्त राजनीतिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थी।
1907 के सूरत अधिवेशन के बाद कांग्रेस में उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच मतभेद बढ़ गए थे। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की गति कुछ धीमी पड़ गई। इसी बीच 1914 में प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। भारतीय नेताओं को आशा थी कि युद्ध में भारत के सहयोग के बदले ब्रिटिश सरकार राजनीतिक सुधारों और स्वशासन की दिशा में कदम उठाएगी।
जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की अपेक्षाओं के अनुरूप कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तब स्वशासन की मांग को संगठित रूप देने के लिए होमरूल आंदोलन प्रारंभ किया गया।
होमरूल की अवधारणा
होमरूल का विचार आयरलैंड के आंदोलन से प्रेरित था। आयरलैंड में भी लोग ब्रिटिश शासन के अंतर्गत रहते हुए अपने लिए स्वशासन की मांग कर रहे थे। इसी प्रकार भारत में भी यह मांग उठी कि भारतीयों को अपने प्रशासन में अधिक अधिकार मिलने चाहिए और देश के शासन में उनकी निर्णायक भूमिका होनी चाहिए।
होमरूल आंदोलन का उद्देश्य तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए स्वशासन प्राप्त करना था।
होमरूल लीग की स्थापना
1916 में भारत में दो प्रमुख होमरूल लीगों की स्थापना की गई।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की होमरूल लीग
लोकमान्य तिलक ने अप्रैल 1916 में पूना में अपनी होमरूल लीग की स्थापना की। इसका कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा बरार के कुछ क्षेत्रों तक सीमित था।
तिलक का मानना था कि भारतीयों को राजनीतिक अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करना चाहिए। उन्होंने जनता को सक्रिय राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
एनी बेसेंट की होमरूल लीग
एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 में मद्रास में अपनी होमरूल लीग की स्थापना की। उनका संगठन देश के अधिकांश क्षेत्रों में सक्रिय था।
एनी बेसेंट एक प्रसिद्ध समाज सुधारक, शिक्षाविद् और राजनीतिक कार्यकर्ता थीं। उन्होंने अपने लेखों, भाषणों और सभाओं के माध्यम से स्वशासन की मांग को लोकप्रिय बनाया।
होमरूल लीग आंदोलन के उद्देश्य
भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति
आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को अपने देश के शासन में अधिक अधिकार दिलाना था।
राजनीतिक जागरूकता फैलाना
जनता को उनके अधिकारों और राजनीतिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाना आंदोलन का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था।
राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना
आंदोलन का उद्देश्य देश के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों के लोगों को एक साझा राजनीतिक लक्ष्य के लिए संगठित करना था।
राष्ट्रीय आंदोलन को पुनर्जीवित करना
सूरत विभाजन के बाद राष्ट्रीय आंदोलन की जो गति कम हो गई थी, उसे पुनः सक्रिय बनाना भी इस आंदोलन का उद्देश्य था।
होमरूल आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
सभाओं और सम्मेलनों का आयोजन
देशभर में सार्वजनिक सभाएँ आयोजित की गईं जिनमें स्वशासन की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
प्रचार साहित्य का वितरण
पुस्तिकाओं, लेखों और समाचार पत्रों के माध्यम से आंदोलन के विचारों का व्यापक प्रचार किया गया।
जन-जागरण अभियान
नेताओं ने विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर लोगों को राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
युवाओं और विद्यार्थियों को जोड़ना
आंदोलन में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और युवाओं ने भाग लिया, जिससे इसकी लोकप्रियता बढ़ी।
लोकमान्य तिलक का योगदान
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक होमरूल आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे। उनका प्रसिद्ध कथन—”स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा”—भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया।
तिलक ने विभिन्न प्रांतों का दौरा किया और लोगों को स्वशासन के महत्व से परिचित कराया। उनके नेतृत्व ने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एनी बेसेंट का योगदान
एनी बेसेंट ने होमरूल आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अनेक लेख लिखे, भाषण दिए और जनता के बीच राजनीतिक चेतना का प्रसार किया।
उनके नेतृत्व में आंदोलन दक्षिण भारत सहित देश के अनेक भागों में तेजी से फैल गया। एनी बेसेंट की लोकप्रियता के कारण बड़ी संख्या में लोग आंदोलन से जुड़े।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
होमरूल आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई। सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न प्रतिबंध लगाए।
1917 में एनी बेसेंट को नजरबंद कर दिया गया। इस कार्रवाई का पूरे देश में विरोध हुआ। जनता और राजनीतिक नेताओं ने उनकी रिहाई की मांग की। बढ़ते दबाव के कारण सरकार को अंततः उन्हें मुक्त करना पड़ा।
एनी बेसेंट की गिरफ्तारी से आंदोलन को और अधिक लोकप्रियता मिली तथा लोगों में राष्ट्रीय भावना मजबूत हुई।
लखनऊ समझौता और होमरूल आंदोलन
1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता हुआ। यह घटना होमरूल आंदोलन के लिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे राष्ट्रीय एकता को बल मिला।
कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच भी सहयोग बढ़ा। इससे राष्ट्रीय आंदोलन को नई शक्ति प्राप्त हुई और स्वशासन की मांग अधिक प्रभावशाली बन गई।
होमरूल आंदोलन का महत्व
राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा मिली
इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को पुनः सक्रिय किया और लोगों में राजनीतिक उत्साह का संचार किया।
राजनीतिक चेतना का विस्तार
देश के विभिन्न भागों में जनता अपने अधिकारों और राजनीतिक मुद्दों के प्रति अधिक जागरूक हुई।
राष्ट्रीय एकता को बल मिला
विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के लोग स्वशासन की मांग के लिए एकजुट हुए।
कांग्रेस को मजबूत आधार मिला
होमरूल आंदोलन ने कांग्रेस को जनसमर्थन बढ़ाने में सहायता की और भविष्य के आंदोलनों के लिए आधार तैयार किया।
स्वराज की मांग लोकप्रिय हुई
इस आंदोलन ने स्वशासन और स्वराज की अवधारणा को जन-जन तक पहुंचाया।
होमरूल आंदोलन की सीमाएँ
पूर्ण स्वतंत्रता की मांग नहीं थी
आंदोलन का उद्देश्य स्वशासन था, पूर्ण स्वतंत्रता नहीं। इसलिए कुछ राष्ट्रवादी इसे पर्याप्त नहीं मानते थे।
सीमित जनभागीदारी
हालांकि आंदोलन लोकप्रिय था, फिर भी इसकी पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम रही।
प्रथम विश्व युद्ध की परिस्थितियाँ
युद्धकालीन परिस्थितियों के कारण आंदोलन को कई व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
होमरूल आंदोलन का पतन
1917 में ब्रिटिश सरकार द्वारा मांटेग्यू घोषणा की गई, जिसमें भारत में क्रमिक रूप से स्वशासन की दिशा में सुधारों का आश्वासन दिया गया। इसके बाद आंदोलन की गति कुछ कम हो गई।
1920 के बाद महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। परिणामस्वरूप होमरूल आंदोलन धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
निष्कर्ष
होमरूल लीग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था। इस आंदोलन ने स्वशासन की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया और भारतीय जनता में राजनीतिक चेतना का विकास किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के नेतृत्व ने आंदोलन को व्यापक पहचान दिलाई। यद्यपि यह आंदोलन पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ, फिर भी इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और भविष्य के स्वतंत्रता संघर्षों के लिए मजबूत आधार तैयार किया। इसलिए होमरूल लीग आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।
प्रश्न 03 : जलियांवाला बाग हत्याकांड
भूमिका
जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की सबसे दर्दनाक और हृदयविदारक घटनाओं में से एक है। यह घटना 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में घटित हुई थी। इस दिन हजारों लोग बैसाखी के अवसर पर तथा रॉलेट एक्ट के विरोध में एक सभा के लिए एकत्रित हुए थे। ब्रिटिश अधिकारी जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी और शांतिपूर्ण जनता पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। इस गोलीकांड में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए।
इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और भारतीयों के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश उत्पन्न किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद भारतीयों का अंग्रेजी शासन से विश्वास पूरी तरह समाप्त हो गया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड की पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार का भरपूर सहयोग किया था। भारतीय नेताओं को आशा थी कि युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार भारत को अधिक राजनीतिक अधिकार प्रदान करेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया। इस कानून के अंतर्गत सरकार को यह अधिकार मिल गया कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तार कर सकती थी और उसे लंबे समय तक जेल में रख सकती थी। भारतीय जनता ने इस कानून को अन्यायपूर्ण और दमनकारी बताया।
महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी आंदोलन प्रारंभ किया। पंजाब में भी इस कानून का तीव्र विरोध हुआ। अमृतसर में डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल जैसे लोकप्रिय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे जनता में असंतोष और बढ़ गया।
जलियांवाला बाग का परिचय
जलियांवाला बाग अमृतसर में स्थित एक खुला मैदान था, जो चारों ओर से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। इसमें प्रवेश और निकास के लिए केवल कुछ संकरे मार्ग थे।
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का पर्व था। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग अमृतसर आए हुए थे। उसी दिन जलियांवाला बाग में एक सभा आयोजित की गई थी, जिसमें लोग रॉलेट एक्ट और नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में एकत्रित हुए थे।
सभा में शामिल अधिकांश लोग निहत्थे और शांतिपूर्ण थे। उनमें महिलाएं, बच्चे, किसान और सामान्य नागरिक भी शामिल थे।
13 अप्रैल 1919 की घटना
13 अप्रैल 1919 की शाम को जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग पहुंचा। उसके साथ लगभग पचास सैनिक थे, जिनके पास आधुनिक हथियार थे।
बाग में हजारों लोग उपस्थित थे। जनरल डायर ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने भीड़ पर लगातार गोलियां चलाईं।
लोगों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था क्योंकि बाग के अधिकांश मार्ग संकरे थे और सैनिकों ने उन्हें नियंत्रित कर रखा था। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए बाग के भीतर स्थित कुएं में कूद गए, जहां उनकी मृत्यु हो गई।
गोलीबारी तब तक जारी रही जब तक सैनिकों के पास उपलब्ध अधिकांश गोलियां समाप्त नहीं हो गईं।
हताहतों की संख्या
ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 379 लोग मारे गए और 1200 से अधिक घायल हुए। हालांकि भारतीय नेताओं और स्वतंत्र स्रोतों का मानना था कि मृतकों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक थी।
घटना के समय बाग में मौजूद लोगों की भारी संख्या को देखते हुए यह अनुमान लगाया जाता है कि सैकड़ों लोग मौके पर ही मारे गए थे और अनेक लोग बाद में घावों के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए।
जनरल डायर की भूमिका
जनरल रेजिनाल्ड डायर इस हत्याकांड का मुख्य जिम्मेदार था। उसने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
बाद में डायर ने स्वयं स्वीकार किया कि उसका उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं था, बल्कि लोगों को सबक सिखाना और उनमें भय उत्पन्न करना था। उसके इस अमानवीय व्यवहार की पूरे भारत में कड़ी निंदा हुई।
पंजाब में मार्शल लॉ
जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद पंजाब में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। लोगों की स्वतंत्रता पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए गए।
ब्रिटिश अधिकारियों ने जनता के साथ कठोर व्यवहार किया। कई स्थानों पर लोगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और दमनकारी उपाय अपनाए गए। इससे जनता का आक्रोश और बढ़ गया।
भारतीय जनता की प्रतिक्रिया
देशव्यापी आक्रोश
इस घटना की खबर फैलते ही पूरे देश में शोक और आक्रोश की लहर दौड़ गई। लोगों ने ब्रिटिश सरकार की कड़ी आलोचना की।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का विरोध
महान कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस घटना के विरोध में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई “नाइटहुड” की उपाधि लौटा दी। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक विरोध था।
महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया
महात्मा गांधी इस घटना से अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए। उन्होंने ब्रिटिश शासन की वास्तविकता को समझते हुए स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक व्यापक बनाने का निर्णय लिया।
हंटर आयोग की जांच
ब्रिटिश सरकार ने घटना की जांच के लिए हंटर आयोग की स्थापना की। आयोग ने जनरल डायर के कार्यों की आलोचना की, लेकिन उसके विरुद्ध कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।
इससे भारतीय जनता और अधिक निराश हुई क्योंकि उन्हें लगा कि ब्रिटिश सरकार न्याय करने के बजाय अपने अधिकारियों का संरक्षण कर रही है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड का स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव
ब्रिटिश शासन से विश्वास समाप्त हुआ
इस घटना के बाद भारतीयों का ब्रिटिश शासन की न्यायप्रियता पर से विश्वास पूरी तरह उठ गया।
राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा मिली
हत्याकांड ने स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक व्यापक और मजबूत बनाया। बड़ी संख्या में लोग राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने लगे।
असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई
महात्मा गांधी ने इस घटना के बाद असहयोग आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया। इससे स्वतंत्रता संघर्ष को नई गति मिली।
राष्ट्रीय एकता मजबूत हुई
इस घटना ने विभिन्न वर्गों और समुदायों के लोगों को एकजुट कर दिया। सभी ने मिलकर ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रेरणा मिली
कई युवाओं ने इस घटना से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय भाग लिया। शहीद भगत सिंह जैसे अनेक क्रांतिकारियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।
जलियांवाला बाग का ऐतिहासिक महत्व
जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना है जिसने ब्रिटिश शासन के क्रूर और दमनकारी स्वरूप को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। यह केवल एक गोलीकांड नहीं था, बल्कि मानवता और न्याय के मूल्यों पर किया गया गंभीर आघात था।
इस घटना ने भारतीयों में स्वतंत्रता प्राप्त करने का संकल्प और अधिक मजबूत कर दिया। इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलन में जनता की भागीदारी तेजी से बढ़ी और स्वतंत्रता संघर्ष एक जन-आंदोलन बन गया।
निष्कर्ष
जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे दुखद और महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर द्वारा निहत्थे और शांतिपूर्ण लोगों पर कराई गई गोलीबारी ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। इस घटना ने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को उजागर किया और भारतीयों के मन में स्वतंत्रता प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प उत्पन्न किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की तथा स्वतंत्रता संघर्ष को और अधिक व्यापक बना दिया। इसलिए यह घटना भारतीय इतिहास में सदैव शहीदों के बलिदान, राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की प्रेरणा के प्रतीक के रूप में स्मरण की जाती रहेगी।
प्रश्न 04 : वेवेल योजना
भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए कई प्रयास किए। इन्हीं प्रयासों में से एक महत्वपूर्ण प्रयास वेवेल योजना (Wavell Plan) थी। यह योजना भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल द्वारा वर्ष 1945 में प्रस्तुत की गई थी। इसका उद्देश्य भारतीय नेताओं और ब्रिटिश सरकार के बीच चल रहे राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करना तथा भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी प्रदान करना था।
वेवेल योजना ऐसे समय में प्रस्तुत की गई जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था और भारत में स्वतंत्रता की मांग अत्यंत प्रबल हो चुकी थी। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ही देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि सत्ता हस्तांतरण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले भारतीय नेताओं के बीच किसी प्रकार की सहमति स्थापित की जाए। इसी उद्देश्य से वेवेल योजना तैयार की गई।
वेवेल योजना की पृष्ठभूमि
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबा दिया था, लेकिन भारतीय जनता की स्वतंत्रता की मांग और अधिक मजबूत हो गई थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत ने ब्रिटेन का सहयोग किया था, लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीय नेताओं ने स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन की मांग तेज कर दी। दूसरी ओर, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद भी लगातार बढ़ रहे थे।
मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग को लेकर दृढ़ थी, जबकि कांग्रेस एक संयुक्त और स्वतंत्र भारत की पक्षधर थी। इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने राजनीतिक समाधान खोजने के लिए नई योजना प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।
लॉर्ड वेवेल का परिचय
लॉर्ड आर्चीबाल्ड वेवेल अक्टूबर 1943 में भारत के वायसराय नियुक्त किए गए थे। उन्होंने भारत की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया और महसूस किया कि भारतीय नेताओं को शासन में अधिक भागीदारी दिए बिना समस्या का समाधान संभव नहीं है।
इसी सोच के आधार पर उन्होंने एक नई योजना तैयार की, जिसे इतिहास में वेवेल योजना के नाम से जाना जाता है।
वेवेल योजना की घोषणा
14 जून 1945 को लॉर्ड वेवेल ने रेडियो प्रसारण के माध्यम से अपनी योजना की घोषणा की। इसके साथ ही भारतीय नेताओं को शिमला में एक सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया गया, ताकि योजना पर चर्चा करके राजनीतिक समाधान खोजा जा सके।
यह सम्मेलन बाद में शिमला सम्मेलन (Shimla Conference) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
वेवेल योजना के प्रमुख उद्देश्य
राजनीतिक गतिरोध समाप्त करना
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच चल रहे विवादों को समाप्त करके एक साझा राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना।
भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी देना
केंद्रीय प्रशासन में भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाकर शासन को अधिक उत्तरदायी बनाना।
सत्ता हस्तांतरण की दिशा में कदम बढ़ाना
भारतीयों को प्रशासनिक अनुभव प्रदान करके भविष्य में सत्ता हस्तांतरण का मार्ग प्रशस्त करना।
ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं के बीच सहयोग बढ़ाना
एक ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व हो।
वेवेल योजना की प्रमुख विशेषताएँ
वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन
योजना के अनुसार वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन किया जाना था। परिषद के अधिकांश सदस्य भारतीय होने थे।
भारतीय सदस्यों की नियुक्ति
वायसराय और सेना प्रमुख को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय बनाए जाने थे।
हिंदू और मुस्लिम प्रतिनिधित्व में समानता
कार्यकारिणी परिषद में हिंदुओं और मुसलमानों को लगभग समान प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव रखा गया था।
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व
अन्य समुदायों और अल्पसंख्यकों को भी परिषद में उचित प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई थी।
संविधान निर्माण पर तत्काल निर्णय नहीं
योजना में संविधान निर्माण के प्रश्न को भविष्य के लिए छोड़ दिया गया था तथा तत्काल प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
शिमला सम्मेलन (1945)
वेवेल योजना पर चर्चा करने के लिए जून 1945 में शिमला सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य कार्यकारिणी परिषद के गठन पर सहमति प्राप्त करना था। प्रारंभ में ऐसा प्रतीत हुआ कि समझौता संभव हो सकता है, लेकिन शीघ्र ही विभिन्न राजनीतिक मतभेद सामने आने लगे।
कांग्रेस का दृष्टिकोण
कांग्रेस का मानना था कि वह पूरे भारत की प्रतिनिधि संस्था है और उसे सभी समुदायों के प्रतिनिधियों को नामित करने का अधिकार होना चाहिए।
कांग्रेस यह नहीं मानती थी कि मुस्लिम लीग ही भारत के सभी मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था है। इसलिए उसने लीग की कुछ मांगों का विरोध किया।
मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण
मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग का दावा था कि भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व केवल मुस्लिम लीग ही कर सकती है।
लीग चाहती थी कि कार्यकारिणी परिषद में सभी मुस्लिम सदस्य उसी के द्वारा नामित किए जाएं। इस मांग को लेकर लीग और कांग्रेस के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए।
वेवेल योजना की असफलता
प्रतिनिधित्व का विवाद
सबसे बड़ा विवाद मुस्लिम प्रतिनिधियों की नियुक्ति को लेकर था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग इस मुद्दे पर सहमत नहीं हो सके।
मुस्लिम लीग की जिद
मुस्लिम लीग यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि किसी अन्य संगठन या कांग्रेस द्वारा मुस्लिम प्रतिनिधियों का चयन किया जाए।
कांग्रेस और लीग के बीच अविश्वास
दोनों प्रमुख दलों के बीच विश्वास की कमी थी, जिसके कारण समझौता संभव नहीं हो सका।
ब्रिटिश सरकार की सीमित भूमिका
ब्रिटिश सरकार भी दोनों पक्षों को किसी साझा समाधान पर सहमत कराने में सफल नहीं हो सकी।
इन कारणों से जुलाई 1945 में शिमला सम्मेलन असफल घोषित कर दिया गया और वेवेल योजना लागू नहीं हो सकी।
वेवेल योजना का महत्व
भारतीयों को शासन में भागीदारी का प्रस्ताव
यह पहली ऐसी योजनाओं में से थी जिसमें केंद्रीय प्रशासन में भारतीयों की प्रमुख भूमिका का विचार प्रस्तुत किया गया।
सत्ता हस्तांतरण की दिशा में कदम
योजना ने यह संकेत दिया कि ब्रिटिश सरकार भारत को अधिक राजनीतिक अधिकार देने के लिए तैयार हो रही है।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग की स्थिति स्पष्ट हुई
शिमला सम्मेलन के दौरान दोनों संगठनों के राजनीतिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से सामने आए।
भविष्य की योजनाओं का आधार
वेवेल योजना की असफलता ने ब्रिटिश सरकार को अधिक व्यापक समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप बाद में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया।
स्वतंत्रता की प्रक्रिया को गति मिली
योजना भले ही सफल नहीं हुई, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की राजनीतिक समस्या का समाधान अब अधिक समय तक टाला नहीं जा सकता।
वेवेल योजना की सीमाएँ
मूल राजनीतिक समस्या का समाधान नहीं
योजना कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मूलभूत मतभेदों को दूर नहीं कर सकी।
पाकिस्तान के प्रश्न की अनदेखी
मुस्लिम लीग की पाकिस्तान संबंधी मांग का कोई स्पष्ट समाधान योजना में नहीं था।
अस्थायी स्वरूप
योजना केवल प्रशासनिक सुधारों तक सीमित थी और इसमें भारत के भविष्य के संवैधानिक ढांचे पर स्पष्ट प्रावधान नहीं थे।
निष्कर्ष
वेवेल योजना 1945 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहल थी। इसका उद्देश्य कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता स्थापित करना तथा भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी देना था। यद्यपि यह योजना शिमला सम्मेलन की असफलता के कारण लागू नहीं हो सकी, फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसने भारतीय राजनीति की वास्तविक चुनौतियों को उजागर किया और सत्ता हस्तांतरण की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता को स्पष्ट किया। वेवेल योजना की असफलता ने आगे चलकर कैबिनेट मिशन योजना तथा भारत की स्वतंत्रता से संबंधित घटनाओं का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए भारतीय इतिहास में वेवेल योजना को स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
प्रश्न 05 : लोकप्रिय आंदोलन (1945-47)
भूमिका
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण में 1945 से 1947 के बीच अनेक लोकप्रिय आंदोलनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत में राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं। भारतीय जनता अब पूर्ण स्वतंत्रता से कम किसी भी समाधान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। कांग्रेस, समाजवादी संगठनों, मजदूर संगठनों, किसान आंदोलनों तथा विभिन्न जनसमूहों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक संघर्ष शुरू कर दिया था।
1945 से 1947 के बीच हुए लोकप्रिय आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि भारत पर विदेशी शासन को अधिक समय तक बनाए रखना संभव नहीं है। इन आंदोलनों ने स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रक्रिया को गति प्रदान की और जनता की राजनीतिक शक्ति का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
लोकप्रिय आंदोलनों की पृष्ठभूमि
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन की नीति अपनाई थी, लेकिन इससे भारतीय जनता की स्वतंत्रता की इच्छा कम नहीं हुई। द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था।
दूसरी ओर, भारतीय सैनिकों, मजदूरों, किसानों और विद्यार्थियों में राष्ट्रीय भावना तेजी से बढ़ रही थी। आजाद हिंद फौज के संघर्ष और सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व ने भी लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्साह उत्पन्न किया।
इन परिस्थितियों में 1945 से 1947 के बीच अनेक लोकप्रिय आंदोलनों का उदय हुआ, जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक रूप दिया।
आज़ाद हिंद फौज (आई.एन.ए.) मुकदमे और जन आंदोलन
आज़ाद हिंद फौज का महत्व
सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फौज ने भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता की भावना को मजबूत किया। युद्ध के बाद इसके अनेक अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
लाल किले के मुकदमे
1945 में आज़ाद हिंद फौज के अधिकारियों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमे चलाए गए। इनमें शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों प्रमुख थे।
जनता की प्रतिक्रिया
इन मुकदमों के विरोध में पूरे देश में प्रदर्शन हुए। विद्यार्थियों, मजदूरों और आम जनता ने व्यापक समर्थन व्यक्त किया। लोगों का मानना था कि ये अधिकारी देश की स्वतंत्रता के लिए लड़े थे, इसलिए उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन
आई.एन.ए. मुकदमों के विरोध में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग एकजुट हुए। इससे राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।
नौसैनिक विद्रोह (1946)
विद्रोह की शुरुआत
फरवरी 1946 में मुंबई स्थित रॉयल इंडियन नेवी के नाविकों ने ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसका प्रारंभ एच.एम.आई.एस. तलवार नामक नौसैनिक केंद्र से हुआ।
विद्रोह के कारण
नाविकों को खराब भोजन, कम वेतन, नस्लीय भेदभाव और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय भावना भी तेजी से बढ़ रही थी।
विद्रोह का विस्तार
कुछ ही दिनों में यह विद्रोह मुंबई से अन्य नौसैनिक ठिकानों तक फैल गया। हजारों नाविक इस आंदोलन में शामिल हो गए।
जन समर्थन
मजदूरों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों ने भी विद्रोही नाविकों का समर्थन किया। अनेक शहरों में हड़तालें और प्रदर्शन आयोजित किए गए।
मजदूर आंदोलनों का विकास
हड़तालों में वृद्धि
1945-47 के दौरान देश के विभिन्न उद्योगों में मजदूर आंदोलनों की संख्या बढ़ गई। मजदूर बेहतर वेतन, कार्य परिस्थितियों और अधिकारों की मांग कर रहे थे।
राजनीतिक चेतना
मजदूर आंदोलन केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं थे। वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता के संघर्ष से भी जुड़े हुए थे।
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विरोध
मजदूर संगठनों ने ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध किया और स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन प्रदान किया।
किसान आंदोलन
ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष
किसान लंबे समय से ऊँचे करों, जमींदारी शोषण और आर्थिक कठिनाइयों से परेशान थे। युद्धकालीन नीतियों ने उनकी समस्याओं को और बढ़ा दिया था।
तेभागा आंदोलन
बंगाल में तेभागा आंदोलन किसानों का एक महत्वपूर्ण संघर्ष था। इसमें बटाईदार किसानों ने अपनी उपज में अधिक हिस्सेदारी की मांग की।
तेलंगाना आंदोलन
हैदराबाद राज्य के तेलंगाना क्षेत्र में किसानों ने सामंती शोषण के विरुद्ध आंदोलन चलाया। यह उस समय के प्रमुख किसान आंदोलनों में से एक था।
किसानों की राजनीतिक भागीदारी
इन आंदोलनों ने किसानों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विद्यार्थी आंदोलनों की भूमिका
राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी
देशभर के विद्यार्थियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे सभाओं, प्रदर्शनों और जन-जागरण कार्यक्रमों में भाग लेते थे।
आई.एन.ए. और नौसैनिक विद्रोह का समर्थन
विद्यार्थियों ने आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों और नौसैनिक विद्रोहियों के समर्थन में व्यापक प्रदर्शन किए।
युवाओं में राष्ट्रीय चेतना
इस काल में युवा वर्ग स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण आधार बन गया था।
लोकप्रिय आंदोलनों का प्रभाव
ब्रिटिश शासन पर दबाव
इन आंदोलनों ने ब्रिटिश सरकार पर भारी दबाव डाला। सरकार को यह समझ में आ गया कि भारत में शासन जारी रखना कठिन हो गया है।
राष्ट्रीय एकता का विकास
विभिन्न वर्गों—मजदूरों, किसानों, विद्यार्थियों और सैनिकों—ने एक साथ स्वतंत्रता की मांग उठाई।
स्वतंत्रता आंदोलन को नई शक्ति
इन आंदोलनों ने राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आधारित और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
सैनिकों में राष्ट्रीय भावना
नौसैनिक विद्रोह और आई.एन.ए. आंदोलन ने यह संकेत दिया कि भारतीय सैनिक भी अब ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार नहीं रह गए थे।
स्वतंत्रता की प्रक्रिया में तेजी
इन घटनाओं ने ब्रिटिश सरकार को सत्ता हस्तांतरण के लिए गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए बाध्य किया।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
ब्रिटिश सरकार ने प्रारंभ में दमनकारी उपाय अपनाए। अनेक स्थानों पर गिरफ्तारियाँ की गईं और आंदोलनों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया।
लेकिन बदलती परिस्थितियों और बढ़ते जनदबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा। इसी क्रम में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया और अंततः सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
लोकप्रिय आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व
स्वतंत्रता संघर्ष का अंतिम चरण
1945-47 के लोकप्रिय आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम और निर्णायक चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जनशक्ति का प्रदर्शन
इन आंदोलनों ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नेताओं का लक्ष्य नहीं थी, बल्कि यह पूरे राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षा बन चुकी थी।
ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरी उजागर हुई
ब्रिटिश सरकार यह समझ गई कि भारतीय जनता की इच्छा के विरुद्ध शासन करना अब संभव नहीं है।
लोकतांत्रिक चेतना का विकास
इन आंदोलनों ने भारतीयों में राजनीतिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता को बढ़ाया।
निष्कर्ष
1945 से 1947 के बीच हुए लोकप्रिय आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आज़ाद हिंद फौज के मुकदमों के विरुद्ध जनआंदोलन, 1946 का नौसैनिक विद्रोह, मजदूर और किसान आंदोलन तथा विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने ब्रिटिश शासन की नींव को कमजोर कर दिया। इन आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की जनता अब स्वतंत्रता प्राप्त किए बिना रुकने वाली नहीं है। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को सत्ता हस्तांतरण का निर्णय लेना पड़ा और अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इसलिए 1945-47 के लोकप्रिय आंदोलनों को भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रक्रिया में एक निर्णायक और ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला चरण माना जाता है।
प्रश्न 06 : धन का निष्कासन (Drain of Wealth Theory)
भूमिका
भारतीय आर्थिक इतिहास में “धन का निष्कासन” या Drain of Wealth Theory एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। इस सिद्धांत का संबंध ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से इंग्लैंड की ओर होने वाले आर्थिक शोषण से है। भारतीय राष्ट्रवादियों का मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति, संसाधनों और आय को विभिन्न माध्यमों से इंग्लैंड भेज रहा था, जिसके कारण भारत लगातार गरीब होता जा रहा था।
इस सिद्धांत को सबसे पहले व्यवस्थित रूप से दादाभाई नौरोजी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” में बताया कि किस प्रकार भारत की राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग बिना किसी प्रतिफल के ब्रिटेन भेजा जा रहा था। धन के निष्कासन का सिद्धांत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आर्थिक आधारों में से एक था और इसने भारतीयों को ब्रिटिश शासन के वास्तविक आर्थिक स्वरूप से परिचित कराया।
धन के निष्कासन का अर्थ
धन का निष्कासन से आशय उस प्रक्रिया से है जिसके अंतर्गत भारत की संपत्ति और आय का एक बड़ा भाग ब्रिटेन भेजा जाता था, जबकि उसके बदले भारत को कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं होता था।
सामान्य व्यापार में वस्तुओं और सेवाओं के बदले भुगतान प्राप्त होता है, लेकिन धन के निष्कासन की प्रक्रिया में भारत की संपत्ति बिना किसी उचित प्रतिफल के इंग्लैंड स्थानांतरित की जाती थी। इस कारण भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई और गरीबी बढ़ती गई।
धन के निष्कासन सिद्धांत के प्रवर्तक
दादाभाई नौरोजी
दादाभाई नौरोजी को धन के निष्कासन सिद्धांत का जनक माना जाता है। उन्होंने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन के कारण भारत की संपत्ति लगातार विदेश जा रही है।
उन्होंने विभिन्न आर्थिक आँकड़ों का अध्ययन करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि भारत की गरीबी का प्रमुख कारण ब्रिटिश आर्थिक शोषण है।
अन्य राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री
दादाभाई नौरोजी के अतिरिक्त आर. सी. दत्त, महादेव गोविंद रानाडे, जी. वी. जोशी तथा अन्य राष्ट्रवादी विचारकों ने भी इस सिद्धांत का समर्थन किया और ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की आलोचना की।
धन के निष्कासन के प्रमुख माध्यम
ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और पेंशन
भारत में कार्यरत उच्च ब्रिटिश अधिकारियों को अत्यधिक वेतन दिया जाता था। सेवा समाप्त होने के बाद वे इंग्लैंड लौट जाते थे और अपनी बचत तथा पेंशन भी वहीं ले जाते थे।
इस प्रकार भारत में अर्जित धन विदेश चला जाता था।
गृह व्यय (Home Charges)
ब्रिटिश सरकार भारत से विभिन्न प्रशासनिक खर्चों के नाम पर धन वसूलती थी। इसमें ब्रिटेन में स्थित भारत कार्यालय का खर्च, अधिकारियों की पेंशन तथा अन्य भुगतान शामिल थे।
इन व्ययों का भुगतान भारतीय राजस्व से किया जाता था।
सार्वजनिक ऋण पर ब्याज
ब्रिटिश सरकार द्वारा लिए गए ऋणों का एक बड़ा भाग इंग्लैंड के निवेशकों से लिया जाता था। इन ऋणों पर ब्याज का भुगतान भारत की आय से किया जाता था।
ब्रिटिश सेना पर व्यय
भारत में तैनात ब्रिटिश सेना तथा विदेशों में ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा के लिए किए गए कई सैन्य खर्चों का भार भी भारतीय जनता पर डाला जाता था।
व्यापारिक लाभ का हस्तांतरण
भारत में कार्यरत ब्रिटिश व्यापारी और कंपनियाँ यहाँ से भारी लाभ अर्जित करती थीं और उसे इंग्लैंड भेज देती थीं।
इससे भारत की पूंजी देश में निवेश होने के बजाय विदेश चली जाती थी।
निर्यात की अधिशेष आय
भारत अक्सर आयात की तुलना में अधिक निर्यात करता था। लेकिन इस अतिरिक्त आय का लाभ भारतीय जनता को नहीं मिलता था, बल्कि इसका उपयोग ब्रिटेन के विभिन्न भुगतानों के लिए किया जाता था।
धन के निष्कासन के कारण
औपनिवेशिक शासन व्यवस्था
ब्रिटिश शासन का मुख्य उद्देश्य भारत का विकास नहीं बल्कि अपने आर्थिक हितों की पूर्ति करना था। इसलिए नीतियाँ भी उसी के अनुरूप बनाई गईं।
प्रशासन में भारतीयों की सीमित भागीदारी
उच्च प्रशासनिक पदों पर अधिकतर ब्रिटिश अधिकारी नियुक्त थे, जिनका वेतन और अन्य सुविधाएँ भारत के राजस्व से दी जाती थीं।
ब्रिटिश पूंजीवाद का विस्तार
ब्रिटिश उद्योगों और व्यापारिक संस्थानों को लाभ पहुँचाने के लिए भारत के संसाधनों का उपयोग किया जाता था।
असमान आर्थिक संबंध
भारत को कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता और ब्रिटेन को तैयार माल के उत्पादक के रूप में विकसित किया गया। इससे आर्थिक असंतुलन पैदा हुआ।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
गरीबी में वृद्धि
धन के लगातार निष्कासन के कारण भारत में पूंजी संचय नहीं हो सका। परिणामस्वरूप गरीबी बढ़ती गई।
औद्योगिक विकास में बाधा
यदि भारत की संपत्ति देश में ही निवेश होती, तो उद्योगों का विकास संभव था। लेकिन पूंजी के विदेश जाने से औद्योगीकरण धीमा रहा।
कृषि क्षेत्र की समस्याएँ
किसानों पर करों का बोझ बढ़ता गया। कृषि सुधारों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई।
रोजगार के अवसरों में कमी
उद्योगों और व्यापार के सीमित विकास के कारण रोजगार के अवसर पर्याप्त मात्रा में नहीं बढ़ सके।
बार-बार अकाल की स्थिति
आर्थिक संसाधनों की कमी और प्रशासनिक उदासीनता के कारण भारत में अनेक बार भयंकर अकाल पड़े, जिनमें लाखों लोगों की मृत्यु हुई।
राष्ट्रवादी आंदोलन में धन निष्कासन सिद्धांत का महत्व
ब्रिटिश शासन की आर्थिक आलोचना
इस सिद्धांत ने यह स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन केवल राजनीतिक प्रभुत्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वह आर्थिक शोषण पर भी आधारित था।
राष्ट्रीय चेतना का विकास
भारतीय जनता को यह समझ में आने लगा कि उनकी गरीबी और आर्थिक समस्याओं के पीछे औपनिवेशिक नीतियाँ जिम्मेदार हैं।
स्वतंत्रता की मांग को बल
जब लोगों को आर्थिक शोषण की वास्तविकता का ज्ञान हुआ, तो स्वतंत्रता की मांग और अधिक मजबूत हुई।
आर्थिक राष्ट्रवाद का विकास
धन निष्कासन सिद्धांत ने स्वदेशी आंदोलन और आर्थिक आत्मनिर्भरता की भावना को बढ़ावा दिया।
दादाभाई नौरोजी का योगदान
दादाभाई नौरोजी ने विभिन्न सरकारी आँकड़ों और आर्थिक तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि भारत की गरीबी प्राकृतिक नहीं बल्कि औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम है।
उन्होंने ब्रिटिश संसद में भी भारत के आर्थिक शोषण का मुद्दा उठाया। उनके विचारों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक और आर्थिक आधार प्रदान किया।
धन निष्कासन सिद्धांत की आलोचना
आँकड़ों की सीमाएँ
कुछ विद्वानों का मत है कि उस समय उपलब्ध आँकड़े पूर्णतः सटीक नहीं थे, इसलिए निष्कासन की वास्तविक मात्रा का निर्धारण कठिन था।
कुछ आर्थिक लाभों का उल्लेख
कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि ब्रिटिश शासन के दौरान रेलवे, डाक व्यवस्था और संचार जैसी सुविधाओं का विकास भी हुआ, जिन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
फिर भी सिद्धांत का महत्व
इन आलोचनाओं के बावजूद अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधनों का हस्तांतरण हुआ और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँचा।
निष्कर्ष
धन का निष्कासन सिद्धांत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत ने ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण को उजागर किया और भारतीयों को अपनी आर्थिक दुर्दशा के वास्तविक कारणों से परिचित कराया। ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन, पेंशन, गृह व्यय, व्यापारिक लाभ तथा अन्य माध्यमों से भारत की संपत्ति लगातार इंग्लैंड भेजी जाती रही, जिसके कारण देश में गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ापन बढ़ता गया। इस सिद्धांत ने भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत आधार प्रदान किया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। इसलिए धन का निष्कासन सिद्धांत भारतीय आर्थिक इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रश्न 07 : अतिवादी समूह (Extremist Group)
भूमिका
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अतिवादी समूह का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर दो प्रमुख विचारधाराएँ विकसित हुईं—उदारवादी (Moderates) और अतिवादी (Extremists)। उदारवादी नेता संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से सुधारों की मांग करते थे, जबकि अतिवादी नेता अधिक सक्रिय, संघर्षपूर्ण और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर थे।
अतिवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सरकार केवल प्रार्थनाओं, निवेदनों और याचिकाओं से भारतीयों को अधिकार नहीं देगी। इसलिए जनता को संगठित करके राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए। अतिवादी नेताओं ने स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। उनके प्रयासों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान की।
अतिवादी समूह के उदय की पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उदारवादी नेताओं ने संवैधानिक तरीकों से अनेक मांगें उठाईं, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनकी अधिकांश मांगों को स्वीकार नहीं किया।
ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियाँ, आर्थिक शोषण, अकाल, प्लेग जैसी समस्याएँ तथा प्रशासन में भारतीयों की सीमित भागीदारी के कारण जनता में असंतोष बढ़ने लगा। इसके अतिरिक्त 1905 में बंगाल विभाजन ने राष्ट्रीय भावना को और अधिक प्रबल बना दिया।
इन परिस्थितियों में एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता महसूस हुई जो अधिक दृढ़ता और संघर्ष के साथ राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर अतिवादी विचारधारा का विकास हुआ।
अतिवादी समूह का उदय
अतिवादी समूह का प्रभाव लगभग 1905 से 1919 के बीच सबसे अधिक दिखाई देता है। इस विचारधारा के नेताओं का विश्वास था कि भारत को स्वशासन और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना होगा।
इन नेताओं ने जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी पर बल दिया तथा राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन बनाने का प्रयास किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव को भी विशेष महत्व दिया।
अतिवादी समूह के प्रमुख नेता
बाल गंगाधर तिलक
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अतिवादी आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता थे। उन्होंने स्वराज को भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार बताया।
उनका प्रसिद्ध कथन—”स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”—भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया।
लाला लाजपत राय
लाला लाजपत राय पंजाब के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बिपिन चंद्र पाल
बिपिन चंद्र पाल बंगाल के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अरविंद घोष
अरविंद घोष ने राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी समझाया।
इन नेताओं को सामूहिक रूप से “लाल-बाल-पाल” के नाम से भी जाना जाता है।
अतिवादी समूह की विचारधारा
स्वराज की मांग
अतिवादी नेताओं का मुख्य लक्ष्य स्वराज प्राप्त करना था। वे मानते थे कि भारत को अपने शासन का अधिकार स्वयं मिलना चाहिए।
राष्ट्रीय गौरव का विकास
उन्होंने भारतीय संस्कृति, इतिहास और परंपराओं के प्रति गर्व की भावना विकसित करने का प्रयास किया।
जनता की भागीदारी
अतिवादी नेताओं का विश्वास था कि स्वतंत्रता संघर्ष में केवल शिक्षित वर्ग ही नहीं, बल्कि सामान्य जनता की भी सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
संघर्ष की नीति
वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक सक्रिय और प्रभावशाली संघर्ष के पक्षधर थे।
अतिवादी समूह के प्रमुख कार्यक्रम
स्वदेशी आंदोलन
अतिवादियों ने भारतीय वस्तुओं के उपयोग पर बल दिया। उनका मानना था कि स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग देश की आर्थिक उन्नति में सहायक होगा।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार अतिवादी आंदोलन का एक प्रमुख कार्यक्रम था। लोगों को विदेशी वस्तुएँ न खरीदने के लिए प्रेरित किया गया।
राष्ट्रीय शिक्षा
अतिवादी नेता ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहते थे जो भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय मूल्यों पर आधारित हो।
निष्क्रिय प्रतिरोध
उन्होंने अन्यायपूर्ण सरकारी नीतियों के विरोध में शांतिपूर्ण प्रतिरोध और असहयोग की भावना को प्रोत्साहित किया।
बंगाल विभाजन और अतिवादी आंदोलन
1905 में बंगाल विभाजन ने अतिवादी आंदोलन को अत्यधिक बल प्रदान किया। ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय का पूरे देश में विरोध हुआ।
अतिवादी नेताओं ने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलनों का नेतृत्व किया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ और जनता में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी।
सूरत विभाजन (1907)
1907 के कांग्रेस अधिवेशन में उदारवादी और अतिवादी नेताओं के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरूप कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई।
इस घटना को सूरत विभाजन कहा जाता है। यद्यपि इससे राष्ट्रीय आंदोलन को कुछ समय के लिए नुकसान हुआ, लेकिन अतिवादी विचारधारा का प्रभाव लगातार बढ़ता रहा।
अतिवादी समूह की उपलब्धियाँ
राष्ट्रीय चेतना का विस्तार
अतिवादी नेताओं ने स्वतंत्रता की भावना को जन-जन तक पहुँचाया।
स्वराज को लोकप्रिय बनाया
उन्होंने स्वराज की मांग को राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य बना दिया।
जन-आंदोलन का आधार तैयार किया
अतिवादियों ने जनता की भागीदारी बढ़ाकर भविष्य के आंदोलनों के लिए आधार तैयार किया।
स्वदेशी भावना का विकास
देशी वस्तुओं के उपयोग और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला।
राष्ट्रीय आत्मविश्वास में वृद्धि
भारतीयों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और आत्मविश्वास का विकास हुआ।
अतिवादी समूह की सीमाएँ
संगठनात्मक कमजोरियाँ
अतिवादी नेताओं के पास व्यापक संगठनात्मक ढांचा अपेक्षाकृत सीमित था।
सरकारी दमन
ब्रिटिश सरकार ने अनेक राष्ट्रवादी नेताओं को गिरफ्तार किया और आंदोलन पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया।
कांग्रेस में मतभेद
उदारवादी और अतिवादी नेताओं के बीच मतभेदों ने राष्ट्रीय आंदोलन को कुछ समय के लिए कमजोर किया।
अतिवादी समूह का ऐतिहासिक महत्व
अतिवादी समूह ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि केवल याचिकाओं और प्रार्थनाओं से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती।
उनके विचारों ने आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए जन-आंदोलनों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। स्वदेशी, बहिष्कार और जनभागीदारी जैसे विचार बाद के राष्ट्रीय आंदोलनों में भी महत्वपूर्ण बने रहे।
अतिवादी नेताओं ने भारतीय जनता में आत्मसम्मान, राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा को मजबूत किया। यही कारण है कि उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद के प्रमुख निर्माता माना जाता है।
निष्कर्ष
अतिवादी समूह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण था। इस समूह के नेताओं ने स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान की। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और अरविंद घोष जैसे नेताओं ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना और आत्मविश्वास का विकास किया। यद्यपि उन्हें कई कठिनाइयों और सरकारी दमन का सामना करना पड़ा, फिर भी उनके योगदान ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया। इसलिए अतिवादी समूह भारतीय राष्ट्रवाद के विकास और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
प्रश्न 08 : जनजातीय आंदोलन
भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जनजातीय आंदोलनों का विशेष महत्व है। भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले जनजातीय समुदायों ने ब्रिटिश शासन, जमींदारों, साहूकारों और शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध समय-समय पर संघर्ष किए। इन आंदोलनों का उद्देश्य केवल आर्थिक शोषण का विरोध करना ही नहीं था, बल्कि अपनी भूमि, संस्कृति, परंपराओं और जीवन-शैली की रक्षा करना भी था।
ब्रिटिश शासन के दौरान लागू की गई वन नीतियों, भूमि संबंधी कानूनों, अत्यधिक करों तथा बाहरी लोगों के हस्तक्षेप ने जनजातीय समाज के पारंपरिक जीवन को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में जनजातीय विद्रोह और आंदोलन हुए। इन आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना को मजबूत किया और भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक आधार प्रदान किया।
जनजातीय आंदोलन का अर्थ
जनजातीय आंदोलन से आशय उन संघर्षों और विद्रोहों से है जिन्हें विभिन्न जनजातीय समुदायों ने अपने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संचालित किया।
इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य बाहरी शोषण से मुक्ति, भूमि पर अधिकारों की रक्षा तथा पारंपरिक जीवन-व्यवस्था को बनाए रखना था। अधिकांश जनजातीय आंदोलन स्थानीय स्तर पर प्रारंभ हुए, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक रहा।
जनजातीय आंदोलनों की पृष्ठभूमि
ब्रिटिश शासन से पहले जनजातीय समुदाय अपेक्षाकृत स्वतंत्र जीवन व्यतीत करते थे। वे जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहते थे। उनकी अपनी सामाजिक व्यवस्था और पारंपरिक शासन प्रणाली थी।
ब्रिटिश शासन के आगमन के बाद अनेक परिवर्तन हुए। वन कानूनों के कारण जनजातियों के जंगलों पर अधिकार सीमित कर दिए गए। भूमि पर नए कर लगाए गए तथा साहूकारों और जमींदारों का प्रभाव बढ़ गया।
इन नीतियों के कारण जनजातीय समाज को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनकी भूमि उनसे छिनने लगी और पारंपरिक आजीविका के साधनों पर प्रतिबंध लगाए जाने लगे। यही परिस्थितियाँ विभिन्न जनजातीय आंदोलनों का कारण बनीं।
जनजातीय आंदोलनों के प्रमुख कारण
भूमि से बेदखली
ब्रिटिश भूमि नीतियों के कारण अनेक जनजातीय समुदाय अपनी पारंपरिक भूमि से वंचित हो गए। जमींदारों और साहूकारों ने उनकी भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया।
वन कानूनों का प्रभाव
वन अधिनियमों के कारण जनजातियों को जंगलों से लकड़ी, फल, जड़ी-बूटियाँ तथा अन्य संसाधन प्राप्त करने में कठिनाई होने लगी।
अत्यधिक कर और शोषण
ब्रिटिश प्रशासन द्वारा लगाए गए करों और स्थानीय शोषकों के अत्याचारों ने जनजातीय जीवन को प्रभावित किया।
सांस्कृतिक हस्तक्षेप
जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करना चाहते थे। बाहरी हस्तक्षेप के कारण उनमें असंतोष बढ़ा।
साहूकारों और महाजनों का अत्याचार
ऋण के बोझ और ऊँचे ब्याज दरों के कारण अनेक जनजातीय परिवार आर्थिक संकट में फँस गए।
प्रमुख जनजातीय आंदोलन
संथाल विद्रोह (1855-56)
संथाल विद्रोह भारत के सबसे महत्वपूर्ण जनजातीय आंदोलनों में से एक था। यह वर्तमान झारखंड और पश्चिम बंगाल के क्षेत्रों में हुआ।
सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में संथालों ने जमींदारों, साहूकारों और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह किया। विद्रोह का मुख्य उद्देश्य आर्थिक शोषण से मुक्ति प्राप्त करना था।
ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को कठोरता से दबा दिया, लेकिन इसने जनजातीय प्रतिरोध की भावना को मजबूत किया।
कोल विद्रोह (1831-32)
कोल जनजाति ने छोटानागपुर क्षेत्र में ब्रिटिश शासन और बाहरी शोषकों के विरुद्ध विद्रोह किया।
भूमि संबंधी समस्याएँ और जमींदारों का अत्याचार इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे। यद्यपि इसे दबा दिया गया, फिर भी इसने औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध जनजातीय असंतोष को उजागर किया।
भील आंदोलन
भील जनजाति ने पश्चिमी और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
उन्होंने अपनी भूमि और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। भीलों के कई विद्रोह स्थानीय स्तर पर हुए और उन्होंने लंबे समय तक औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी।
मुंडा आंदोलन (उलगुलान)
मुंडा आंदोलन का नेतृत्व बिरसा मुंडा ने किया। यह आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में छोटानागपुर क्षेत्र में हुआ।
बिरसा मुंडा ने जनजातीय लोगों को संगठित किया और भूमि अधिकारों तथा सामाजिक सुधारों के लिए संघर्ष किया। इस आंदोलन को “उलगुलान” अर्थात महान आंदोलन कहा जाता है।
रम्पा विद्रोह
आंध्र प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में रम्पा विद्रोह हुआ। इसका नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया।
इस आंदोलन का उद्देश्य वन कानूनों और ब्रिटिश दमनकारी नीतियों का विरोध करना था। यह दक्षिण भारत के प्रमुख जनजातीय आंदोलनों में से एक था।
बिरसा मुंडा और उनका योगदान
जनजातीय जागरण के नेता
बिरसा मुंडा भारतीय जनजातीय इतिहास के महान नेताओं में से एक थे। उन्होंने मुंडा समुदाय को संगठित किया और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
सामाजिक सुधार
उन्होंने जनजातीय समाज में सामाजिक सुधारों पर बल दिया तथा लोगों को एकजुट किया।
भूमि अधिकारों की रक्षा
बिरसा मुंडा का मुख्य उद्देश्य जनजातीय लोगों की भूमि की रक्षा करना और शोषण समाप्त करना था।
राष्ट्रीय प्रेरणा
उनका संघर्ष आज भी जनजातीय अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
जनजातीय आंदोलनों की विशेषताएँ
स्थानीय स्वरूप
अधिकांश जनजातीय आंदोलन विशेष क्षेत्रों तक सीमित थे और स्थानीय समस्याओं से जुड़े हुए थे।
भूमि और जंगलों पर अधिकार
इन आंदोलनों का मुख्य केंद्र भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा था।
पारंपरिक नेतृत्व
अधिकांश आंदोलनों का नेतृत्व स्थानीय जनजातीय नेताओं द्वारा किया गया।
शोषण के विरुद्ध संघर्ष
सभी आंदोलनों में आर्थिक और सामाजिक शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।
जनजातीय आंदोलनों का महत्व
औपनिवेशिक शासन का विरोध
इन आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों का विरोध किया और औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी।
जनजातीय अधिकारों की रक्षा
इन संघर्षों के माध्यम से जनजातीय समुदायों ने अपने अधिकारों और संसाधनों की रक्षा करने का प्रयास किया।
राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरणा
जनजातीय विद्रोहों ने स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की भावना को मजबूत किया, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन को भी प्रेरणा मिली।
सामाजिक जागरूकता का विकास
इन आंदोलनों ने समाज का ध्यान जनजातीय समस्याओं और उनके अधिकारों की ओर आकर्षित किया।
जनजातीय आंदोलनों की सीमाएँ
क्षेत्रीय प्रभाव
अधिकांश आंदोलन सीमित क्षेत्रों तक ही केंद्रित रहे और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप नहीं ले सके।
संगठनात्मक कमजोरी
जनजातीय समुदायों के पास संसाधनों और संगठन की कमी थी।
सरकारी दमन
ब्रिटिश सरकार ने सैन्य शक्ति का प्रयोग करके अधिकांश आंदोलनों को दबा दिया।
जनजातीय आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व
जनजातीय आंदोलन भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों की रक्षा के प्रतीक हैं। इन आंदोलनों ने यह सिद्ध किया कि जनजातीय समुदाय अपने अधिकारों और पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष करने में सक्षम थे।
इन संघर्षों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक प्रतिरोध को जन्म दिया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि को मजबूत किया। आज भी जनजातीय आंदोलनों को सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की रक्षा के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
निष्कर्ष
जनजातीय आंदोलन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों, भूमि से बेदखली, वन कानूनों तथा आर्थिक उत्पीड़न के विरुद्ध विभिन्न जनजातीय समुदायों ने संघर्ष किया। संथाल विद्रोह, कोल विद्रोह, भील आंदोलन, मुंडा आंदोलन और रम्पा विद्रोह जैसे आंदोलनों ने जनजातीय समाज की संघर्षशीलता और आत्मसम्मान को प्रदर्शित किया। यद्यपि इन आंदोलनों को तत्काल सफलता नहीं मिली, फिर भी उन्होंने जनजातीय अधिकारों की रक्षा और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरणा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए जनजातीय आंदोलनों का भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।