प्रश्न 01. व्यष्टि अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए तथा इसके क्षेत्र और सीमाओं का वर्णन कीजिए।
परिचय
अर्थशास्त्र का मुख्य संबंध मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों से है। मनुष्य की आवश्यकताएँ बहुत अधिक होती हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के साधन सीमित होते हैं। इसलिए मनुष्य को यह तय करना पड़ता है कि उपलब्ध साधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए। अर्थशास्त्र इसी प्रकार के आर्थिक निर्णयों का अध्ययन करता है। अर्थशास्त्र को मुख्य रूप से व्यष्टि अर्थशास्त्र और समष्टि अर्थशास्त्र में बाँटा जाता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र में अर्थव्यवस्था के छोटे भागों, जैसे उपभोक्ता, फर्म, वस्तु की कीमत और किसी एक बाजार का अध्ययन किया जाता है।
व्यष्टि अर्थशास्त्र का अर्थ
‘व्यष्टि’ का अर्थ है किसी एक व्यक्ति या अर्थव्यवस्था की किसी एक छोटी इकाई से संबंधित। इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र में पूरी अर्थव्यवस्था का अध्ययन न करके उसकी अलग-अलग छोटी इकाइयों का अध्ययन किया जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी देश में सभी लोगों की आय का अध्ययन करने के बजाय किसी एक व्यक्ति की आय और उसके खर्च का अध्ययन करना व्यष्टि अर्थशास्त्र का विषय है। इसी प्रकार पूरे उद्योग का अध्ययन करने के बजाय किसी एक फर्म के उत्पादन और लागत का अध्ययन करना भी व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत आता है।
व्यष्टि अर्थशास्त्र की परिभाषा
व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थशास्त्र की वह शाखा है जिसमें व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के आर्थिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसमें उपभोक्ता, उत्पादक, फर्म, किसी वस्तु की कीमत, उत्पादन, लागत, आय तथा किसी विशेष बाजार जैसी छोटी आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है।
सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के छोटे-छोटे भागों के आर्थिक व्यवहार का अध्ययन करता है।
व्यष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र
व्यष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र काफी व्यापक है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जाता है।
उपभोक्ता का व्यवहार
व्यष्टि अर्थशास्त्र में यह देखा जाता है कि उपभोक्ता अपनी सीमित आय का उपयोग किस प्रकार करता है। वह अलग-अलग वस्तुओं में से किस वस्तु को खरीदता है और किसी वस्तु की कीमत बढ़ने या घटने पर उसकी माँग में क्या परिवर्तन होता है, इसका अध्ययन किया जाता है।
माँग का अध्ययन
किसी वस्तु की माँग उसकी कीमत, आय और अन्य परिस्थितियों से प्रभावित होती है। व्यष्टि अर्थशास्त्र में माँग के नियम तथा माँग में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाता है।
उत्पादन का अध्ययन
उत्पादक सीमित साधनों का प्रयोग करके वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र में यह अध्ययन किया जाता है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए श्रम, पूँजी और अन्य साधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए।
लागत और आय
किसी फर्म को वस्तुओं का उत्पादन करने में जो खर्च करना पड़ता है, उसे लागत कहते हैं। व्यष्टि अर्थशास्त्र में उत्पादन लागत, कुल आय, औसत आय तथा लाभ का अध्ययन किया जाता है।
वस्तु की कीमत का निर्धारण
व्यष्टि अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र वस्तु की कीमत का निर्धारण है। किसी वस्तु की कीमत माँग और पूर्ति के आधार पर किस प्रकार तय होती है, इसका अध्ययन किया जाता है।
बाजार का अध्ययन
व्यष्टि अर्थशास्त्र में विभिन्न प्रकार के बाजारों का अध्ययन किया जाता है। जैसे पूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकार और अन्य बाजार स्थितियों में वस्तु की कीमत तथा उत्पादन किस प्रकार निर्धारित होता है।
उत्पादन के साधनों का मूल्य निर्धारण
भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यमिता उत्पादन के प्रमुख साधन हैं। व्यष्टि अर्थशास्त्र में इन साधनों को मिलने वाली आय का भी अध्ययन किया जाता है। जैसे श्रम को मजदूरी और पूँजी को ब्याज मिलता है।
व्यष्टि अर्थशास्त्र की सीमाएँ
व्यष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक समस्याओं को समझने में बहुत उपयोगी है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं।
पूरी अर्थव्यवस्था का अध्ययन नहीं
व्यष्टि अर्थशास्त्र मुख्य रूप से व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन करता है। इसलिए इससे पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिति का पूरा ज्ञान नहीं मिलता। देश की कुल आय, कुल रोजगार और सामान्य मूल्य स्तर जैसी समस्याएँ मुख्य रूप से समष्टि अर्थशास्त्र के विषय हैं।
व्यक्तिगत इकाइयों पर अधिक ध्यान
इसमें उपभोक्ता और फर्म जैसी छोटी इकाइयों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इसलिए अर्थव्यवस्था के बड़े स्तर पर होने वाली समस्याओं को समझने में इसकी उपयोगिता सीमित हो सकती है।
कुछ मान्यताओं पर निर्भरता
व्यष्टि अर्थशास्त्र में कई बार यह मान लिया जाता है कि कुछ परिस्थितियाँ स्थिर हैं। वास्तविक जीवन में परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहती हैं। इसलिए हर स्थिति में इसके नियम पूरी तरह सही नहीं बैठते।
सामाजिक समस्याओं की सीमित जानकारी
गरीबी, बेरोजगारी, महँगाई और आर्थिक विकास जैसी बड़ी सामाजिक समस्याओं को समझने के लिए केवल व्यष्टि अर्थशास्त्र पर्याप्त नहीं है। इनके अध्ययन के लिए समष्टि अर्थशास्त्र की भी आवश्यकता होती है।
वास्तविक जीवन की जटिलता
वास्तविक जीवन में उपभोक्ता और उत्पादक हमेशा पूरी जानकारी के आधार पर निर्णय नहीं लेते। उनकी पसंद, आदत, भावनाएँ और अन्य परिस्थितियाँ भी निर्णय को प्रभावित करती हैं। इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र की कुछ धारणाएँ वास्तविक जीवन में पूरी तरह लागू नहीं होतीं।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थशास्त्र की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इसमें उपभोक्ता, उत्पादक, फर्म, माँग, पूर्ति, कीमत, उत्पादन, लागत और बाजार जैसी छोटी आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि व्यक्ति और फर्म आर्थिक निर्णय किस प्रकार लेते हैं। हालांकि इसकी कुछ सीमाएँ हैं और इससे पूरी अर्थव्यवस्था की समस्याओं को नहीं समझा जा सकता। फिर भी आर्थिक गतिविधियों की मूल बातें समझने के लिए व्यष्टि अर्थशास्त्र का विशेष महत्व है।
प्रश्न 02. किसी अर्थव्यवस्था की प्रमुख केंद्रीय समस्याएँ क्या हैं? समझाइए।
परिचय
किसी भी अर्थव्यवस्था में मनुष्य की आवश्यकताएँ बहुत अधिक होती हैं, जबकि उन्हें पूरा करने के साधन सीमित होते हैं। भूमि, श्रम, पूँजी, कच्चा माल और समय जैसे साधन सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं और इनके कई अलग-अलग उपयोग हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक अर्थव्यवस्था के सामने यह समस्या रहती है कि सीमित साधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए, ताकि अधिक से अधिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इसी कारण प्रत्येक अर्थव्यवस्था को कुछ मूल आर्थिक निर्णय लेने पड़ते हैं। इन्हें केंद्रीय आर्थिक समस्याएँ कहा जाता है।
केंद्रीय आर्थिक समस्याओं का अर्थ
केंद्रीय समस्याएँ वे मूल आर्थिक समस्याएँ हैं जो साधनों की कमी और उनके अनेक उपयोग होने के कारण प्रत्येक अर्थव्यवस्था के सामने उत्पन्न होती हैं। चाहे अर्थव्यवस्था पूँजीवादी हो, समाजवादी हो या मिश्रित हो, इन समस्याओं का सामना किसी न किसी रूप में करना पड़ता है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो केंद्रीय आर्थिक समस्याओं का संबंध इस बात से है कि क्या उत्पादन किया जाए, कैसे उत्पादन किया जाए और किसके लिए उत्पादन किया जाए।
केंद्रीय समस्याओं के प्रमुख कारण
केंद्रीय समस्याएँ मुख्य रूप से दो कारणों से उत्पन्न होती हैं।
साधनों की कमी
मनुष्य की आवश्यकताएँ असीमित हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए उपलब्ध साधन सीमित हैं। उदाहरण के लिए, किसी परिवार की आय सीमित होती है, जबकि भोजन, कपड़े, शिक्षा, मकान और स्वास्थ्य जैसी अनेक आवश्यकताएँ होती हैं।
साधनों के अनेक उपयोग
एक ही साधन का उपयोग अलग-अलग कामों में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, भूमि का उपयोग खेती, मकान या कारखाना बनाने के लिए किया जा सकता है। इसलिए यह निर्णय लेना पड़ता है कि उपलब्ध साधन का उपयोग किस काम में किया जाए।
क्या उत्पादन किया जाए
यह किसी अर्थव्यवस्था की पहली प्रमुख केंद्रीय समस्या है। इसका अर्थ है कि उपलब्ध सीमित साधनों से कौन-कौन सी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाए तथा कितनी मात्रा में किया जाए।
उदाहरण के लिए, यदि किसी देश के पास सीमित भूमि है, तो उसे यह तय करना होगा कि उस भूमि पर गेहूँ उगाया जाए, चावल उगाया जाए या किसी अन्य फसल का उत्पादन किया जाए। इसी प्रकार देश को यह भी तय करना होता है कि अधिक उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन किया जाए या मशीनों और पूँजीगत वस्तुओं का।
इस समस्या में दो महत्वपूर्ण निर्णय शामिल होते हैं।
- कौन-सी वस्तुओं का उत्पादन किया जाए।
- प्रत्येक वस्तु का कितना उत्पादन किया जाए।
कैसे उत्पादन किया जाए
दूसरी केंद्रीय समस्या यह है कि चुनी गई वस्तुओं का उत्पादन किस तकनीक और किस प्रकार के साधनों से किया जाए। उत्पादन के लिए भूमि, श्रम और पूँजी जैसे साधनों की आवश्यकता होती है।
उत्पादन मुख्य रूप से दो तरीकों से किया जा सकता है।
- श्रम प्रधान तकनीक — इसमें मशीनों की तुलना में श्रम का अधिक उपयोग किया जाता है।
- पूँजी प्रधान तकनीक — इसमें श्रम की तुलना में मशीनों और पूँजी का अधिक उपयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी देश में श्रमिक अधिक हैं और पूँजी कम है, तो वह श्रम प्रधान तकनीक को अधिक महत्व दे सकता है। इसके विपरीत, जहाँ मशीनें और पूँजी अधिक उपलब्ध हैं, वहाँ पूँजी प्रधान तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।
इस समस्या का उद्देश्य उपलब्ध साधनों का उचित और कम खर्च में उपयोग करके उत्पादन करना है।
किसके लिए उत्पादन किया जाए
तीसरी केंद्रीय समस्या यह है कि उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का वितरण किसके बीच किया जाए। इसका संबंध आय के वितरण से भी है।
किसी अर्थव्यवस्था में अलग-अलग लोगों की आय अलग होती है। कुछ लोगों की आय अधिक होती है, जबकि कुछ लोगों की आय कम होती है। इसलिए यह प्रश्न उठता है कि उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का लाभ किस वर्ग को कितना मिले।
उदाहरण के लिए, यदि किसी देश में महँगी कारों का उत्पादन अधिक होता है, तो उनका लाभ मुख्य रूप से अधिक आय वाले लोगों को मिलेगा। वहीं यदि सरकार सस्ती खाद्य सामग्री और आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन पर अधिक ध्यान देती है, तो इसका लाभ कम आय वाले लोगों को भी मिल सकता है।
संसाधनों का पूर्ण उपयोग
किसी अर्थव्यवस्था के सामने यह समस्या भी रहती है कि उपलब्ध साधनों का पूरा उपयोग कैसे किया जाए। यदि भूमि खाली पड़ी है, मशीनें बंद हैं या श्रमिकों को काम नहीं मिल रहा है, तो उपलब्ध साधनों का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है।
इसलिए अर्थव्यवस्था का प्रयास होता है कि उपलब्ध भूमि, श्रम, पूँजी और अन्य साधनों का अधिकतम और उचित उपयोग किया जाए।
आर्थिक विकास की समस्या
आधुनिक अर्थव्यवस्था के सामने आर्थिक विकास भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। केवल वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करना पर्याप्त नहीं है। भविष्य में अधिक उत्पादन करने के लिए पूँजी निर्माण, शिक्षा, तकनीक और आधारभूत सुविधाओं पर भी ध्यान देना पड़ता है।
इसलिए अर्थव्यवस्था को यह निर्णय लेना पड़ता है कि वर्तमान उपभोग पर कितना खर्च किया जाए और भविष्य के विकास के लिए कितना निवेश किया जाए।
अवसर लागत और केंद्रीय समस्याएँ
जब किसी सीमित साधन का उपयोग एक काम के लिए किया जाता है, तो उसी साधन का उपयोग दूसरे काम में नहीं किया जा सकता। जिस दूसरे सबसे अच्छे विकल्प को छोड़ना पड़ता है, उसकी कीमत को अवसर लागत कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसान अपनी भूमि पर गेहूँ उगाता है, तो उसी भूमि पर चावल उगाने का अवसर छोड़ना पड़ेगा। इस प्रकार सही चुनाव करना केंद्रीय आर्थिक समस्या का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि किसी भी अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याओं का मूल कारण साधनों की कमी और उनके अनेक उपयोग हैं। इसलिए प्रत्येक अर्थव्यवस्था को यह तय करना पड़ता है कि क्या उत्पादन किया जाए, कैसे उत्पादन किया जाए और किसके लिए उत्पादन किया जाए। इसके साथ ही संसाधनों का पूरा उपयोग और आर्थिक विकास भी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं। इन समस्याओं का सही समाधान करके उपलब्ध सीमित साधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है और लोगों की अधिक से अधिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।
प्रश्न 03. माँग की कीमत लोच को मापने की ‘बिंदु विधि’ और ‘कुल व्यय विधि’ को समझाइए।
परिचय
अर्थशास्त्र में माँग का अर्थ किसी वस्तु की उस मात्रा से है जिसे उपभोक्ता किसी निश्चित कीमत पर खरीदना चाहता है और खरीदने की क्षमता भी रखता है। सामान्य रूप से किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी माँग में भी परिवर्तन होता है। लेकिन कीमत में जितना परिवर्तन होता है, माँग में उतना ही परिवर्तन हो, यह जरूरी नहीं है। कीमत में परिवर्तन के कारण माँग में होने वाले परिवर्तन की मात्रा को माँग की कीमत लोच कहा जाता है। माँग की कीमत लोच को मापने की कई विधियाँ हैं। इनमें बिंदु विधि और कुल व्यय विधि महत्वपूर्ण हैं।
माँग की कीमत लोच का अर्थ
माँग की कीमत लोच से पता चलता है कि किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी माँगी गई मात्रा में कितना परिवर्तन होता है।
सरल शब्दों में, यदि किसी वस्तु की कीमत थोड़ी बदलने पर उसकी माँग में बहुत अधिक परिवर्तन होता है, तो माँग लोचदार कहलाती है। यदि कीमत में परिवर्तन होने पर माँग में बहुत कम परिवर्तन होता है, तो माँग बेलोचदार कहलाती है।
माँग की कीमत लोच का सामान्य सूत्र है—
माँग की कीमत लोच = माँग की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन ÷ कीमत में प्रतिशत परिवर्तन
बिंदु विधि
बिंदु विधि का उपयोग माँग वक्र के किसी विशेष बिंदु पर माँग की कीमत लोच को मापने के लिए किया जाता है। इस विधि में माँग वक्र के किसी एक बिंदु पर लोच ज्ञात की जाती है। इसलिए इसे बिंदु विधि कहा जाता है।
इस विधि में माँग वक्र को एक सीधी रेखा मानकर उसके अलग-अलग बिंदुओं पर लोच का पता लगाया जाता है। माँग वक्र के अलग-अलग हिस्सों पर लोच अलग हो सकती है।
बिंदु विधि का सूत्र
यदि माँग वक्र एक सीधी रेखा है, तो किसी बिंदु पर माँग की कीमत लोच इस प्रकार निकाली जा सकती है—
माँग की कीमत लोच = माँग वक्र के नीचे का भाग ÷ माँग वक्र के ऊपर का भाग
यदि किसी बिंदु पर माँग वक्र का नीचे वाला भाग बड़ा है और ऊपर वाला भाग छोटा है, तो उस बिंदु पर माँग अधिक लोचदार होगी। इसके विपरीत, ऊपर वाला भाग बड़ा और नीचे वाला भाग छोटा होने पर माँग कम लोचदार होगी।
बिंदु विधि की विशेषता
इस विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे माँग वक्र के किसी विशेष बिंदु पर लोच का पता लगाया जा सकता है। इसलिए जब किसी एक कीमत पर माँग की लोच जाननी हो, तब यह विधि उपयोगी होती है।
कुल व्यय विधि
कुल व्यय विधि को कुल व्यय या कुल आय विधि भी कहा जाता है। इस विधि का संबंध उपभोक्ता द्वारा किसी वस्तु पर किए गए कुल खर्च से है।
इस विधि में कीमत में परिवर्तन के बाद यह देखा जाता है कि वस्तु पर किया गया कुल व्यय बढ़ा है, घटा है या समान रहा है। कुल व्यय ज्ञात करने के लिए वस्तु की कीमत को उसकी माँगी गई मात्रा से गुणा किया जाता है।
कुल व्यय = कीमत × माँगी गई मात्रा
इस विधि को अर्थशास्त्री मार्शल से जोड़ा जाता है।
जब माँग लोचदार हो
यदि कीमत घटने पर कुल व्यय बढ़ जाता है या कीमत बढ़ने पर कुल व्यय घट जाता है, तो माँग को लोचदार माना जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी वस्तु की कीमत घटने के बाद उसकी माँग इतनी अधिक बढ़ जाए कि उपभोक्ताओं का कुल खर्च पहले से अधिक हो जाए, तो माँग लोचदार होगी।
जब माँग बेलोचदार हो
यदि कीमत घटने पर कुल व्यय घट जाता है या कीमत बढ़ने पर कुल व्यय बढ़ जाता है, तो माँग बेलोचदार मानी जाती है।
उदाहरण के लिए, किसी आवश्यक वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी माँग में बहुत कम कमी आती है। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता उस वस्तु पर पहले की तुलना में अधिक कुल खर्च कर सकता है।
जब माँग की लोच इकाई के बराबर हो
यदि कीमत में परिवर्तन के बाद कुल व्यय में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो माँग की लोच इकाई के बराबर होती है।
उदाहरण के लिए, यदि कीमत घटती है और माँग इतनी बढ़ती है कि कुल व्यय पहले जितना ही बना रहता है, तो माँग की कीमत लोच इकाई के बराबर होगी।
कुल व्यय विधि में लोच की पहचान
कुल व्यय विधि को सरल रूप में इस प्रकार याद किया जा सकता है—
- कीमत घटे और कुल व्यय बढ़े — माँग लोचदार
- कीमत घटे और कुल व्यय घटे — माँग बेलोचदार
- कीमत घटे और कुल व्यय समान रहे — इकाई लोच
- कीमत बढ़े और कुल व्यय घटे — माँग लोचदार
- कीमत बढ़े और कुल व्यय बढ़े — माँग बेलोचदार
- कीमत बढ़े और कुल व्यय समान रहे — इकाई लोच
बिंदु विधि और कुल व्यय विधि का महत्व
दोनों विधियाँ माँग की कीमत लोच को समझने में उपयोगी हैं, लेकिन उनका उपयोग अलग-अलग परिस्थितियों में किया जाता है। बिंदु विधि से माँग वक्र के किसी विशेष बिंदु पर लोच ज्ञात की जाती है, जबकि कुल व्यय विधि में कीमत और कुल व्यय के संबंध को देखकर लोच का पता लगाया जाता है।
निष्कर्ष
प्रश्न 04. उपयोगिता की अवधारणा को समझाइए। गणनावाचक और क्रमवाचक दृष्टिकोण में क्या अंतर है?
परिचय
अर्थशास्त्र में उपयोगिता का संबंध उपभोक्ता की संतुष्टि से है। जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु या सेवा का उपयोग करता है और उसे संतुष्टि प्राप्त होती है, तो उस वस्तु या सेवा में उपयोगिता मानी जाती है। उदाहरण के लिए, गर्मी के मौसम में किसी व्यक्ति को ठंडा पानी पीने से संतुष्टि मिलती है, इसलिए उसके लिए पानी की उपयोगिता है। इसी प्रकार भूखे व्यक्ति के लिए भोजन की उपयोगिता अधिक होती है। उपयोगिता का अध्ययन मुख्य रूप से यह समझने के लिए किया जाता है कि उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अलग-अलग वस्तुओं का चुनाव किस प्रकार करता है।
उपयोगिता का अर्थ
उपयोगिता का अर्थ किसी वस्तु या सेवा की वह क्षमता है जिससे वह उपभोक्ता की आवश्यकता या इच्छा को पूरा करके उसे संतुष्टि प्रदान करती है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो किसी वस्तु से मिलने वाली संतुष्टि को उपयोगिता कहते हैं।
उपयोगिता किसी वस्तु के नैतिक या सामाजिक रूप से अच्छे होने पर निर्भर नहीं करती। इसका संबंध केवल इस बात से है कि वह वस्तु किसी व्यक्ति की आवश्यकता को कितना पूरा करती है।
उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के लिए चाय उपयोगी हो सकती है, जबकि दूसरे व्यक्ति के लिए उसकी उपयोगिता कम या बिल्कुल नहीं हो सकती। इसलिए उपयोगिता व्यक्ति की पसंद और आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
उपयोगिता की प्रमुख विशेषताएँ
उपयोगिता की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- उपयोगिता व्यक्ति की आवश्यकता और पसंद पर निर्भर करती है।
- अलग-अलग व्यक्तियों के लिए एक ही वस्तु की उपयोगिता अलग हो सकती है।
- उपयोगिता समय और परिस्थिति के अनुसार बदल सकती है।
- उपयोगिता का संबंध वस्तु से मिलने वाली संतुष्टि से है।
- उपयोगिता नैतिकता पर आधारित नहीं होती।
- किसी वस्तु की उपयोगिता उसके उपयोग और आवश्यकता के अनुसार बढ़ या घट सकती है।
गणनावाचक दृष्टिकोण
गणनावाचक दृष्टिकोण को मात्रात्मक दृष्टिकोण भी कहा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार उपयोगिता को संख्या के रूप में मापा जा सकता है।
इस विचार के प्रमुख समर्थकों में अल्फ्रेड मार्शल का नाम लिया जाता है। इस दृष्टिकोण में माना जाता है कि उपभोक्ता किसी वस्तु से मिलने वाली संतुष्टि को निश्चित संख्याओं में व्यक्त कर सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को एक कप चाय से 10 इकाई उपयोगिता और दूसरे कप से 7 इकाई उपयोगिता मिलती है, तो गणनावाचक दृष्टिकोण के अनुसार इन दोनों उपयोगिताओं को संख्याओं के रूप में मापा जा सकता है।
इस दृष्टिकोण में उपयोगिता की इकाई को सामान्य रूप से यूटिल कहा जाता है।
गणनावाचक दृष्टिकोण में कुल उपयोगिता और सीमांत उपयोगिता की सहायता से उपभोक्ता के व्यवहार को समझाया जाता है।
क्रमवाचक दृष्टिकोण
क्रमवाचक दृष्टिकोण को क्रमात्मक दृष्टिकोण भी कहा जाता है। इसके अनुसार उपयोगिता को निश्चित संख्या में मापना संभव नहीं है। उपभोक्ता केवल अलग-अलग वस्तुओं या विकल्पों को अपनी पसंद के क्रम में रख सकता है।
इस दृष्टिकोण का संबंध मुख्य रूप से जे. आर. हिक्स और आर. जी. डी. एलेन के विचारों से है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को चाय, कॉफी और दूध में सबसे अधिक पसंद चाय है, उसके बाद कॉफी और फिर दूध, तो वह अपनी पसंद का क्रम बता सकता है। लेकिन वह यह निश्चित रूप से नहीं बता सकता कि चाय से उसे 20 इकाई और कॉफी से 10 इकाई संतुष्टि मिलती है।
इस दृष्टिकोण में उदासीनता वक्र और बजट रेखा जैसी अवधारणाओं की सहायता से उपभोक्ता के व्यवहार को समझाया जाता है।
गणनावाचक और क्रमवाचक दृष्टिकोण में अंतर
दोनों दृष्टिकोणों के बीच मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं—
उपयोगिता का मापन
- गणनावाचक दृष्टिकोण में उपयोगिता को संख्याओं में मापा जा सकता है।
- क्रमवाचक दृष्टिकोण में उपयोगिता को संख्याओं में नहीं मापा जाता, बल्कि पसंद का क्रम बताया जाता है।
संतुष्टि का स्वरूप
- गणनावाचक दृष्टिकोण में संतुष्टि की मात्रा बताई जा सकती है।
- क्रमवाचक दृष्टिकोण में केवल यह बताया जाता है कि कौन-सा विकल्प अधिक पसंद है और कौन-सा कम।
मुख्य आधार
- गणनावाचक दृष्टिकोण में कुल उपयोगिता और सीमांत उपयोगिता महत्वपूर्ण हैं।
- क्रमवाचक दृष्टिकोण में उदासीनता वक्र और बजट रेखा महत्वपूर्ण हैं।
प्रमुख अर्थशास्त्री
- गणनावाचक दृष्टिकोण को विकसित करने में मार्शल का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
- क्रमवाचक दृष्टिकोण के प्रमुख समर्थक हिक्स और एलेन माने जाते हैं।
मापन की इकाई
- गणनावाचक दृष्टिकोण में उपयोगिता को यूटिल जैसी इकाई में व्यक्त किया जाता है।
- क्रमवाचक दृष्टिकोण में किसी निश्चित इकाई की आवश्यकता नहीं होती।
वास्तविकता
- गणनावाचक दृष्टिकोण में यह मानना पड़ता है कि संतुष्टि को संख्यात्मक रूप से मापा जा सकता है।
- क्रमवाचक दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक माना जाता है क्योंकि वास्तविक जीवन में व्यक्ति अपनी पसंद का क्रम तो बता सकता है, लेकिन संतुष्टि की सही मात्रा बताना कठिन है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि उपयोगिता का अर्थ किसी वस्तु या सेवा से प्राप्त होने वाली संतुष्टि है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न वस्तुओं का चुनाव करता है और इसी चुनाव को समझने में उपयोगिता की अवधारणा महत्वपूर्ण है। गणनावाचक दृष्टिकोण उपयोगिता को संख्यात्मक रूप से मापने की बात करता है, जबकि क्रमवाचक दृष्टिकोण केवल पसंद के क्रम पर जोर देता है। आधुनिक अर्थशास्त्र में क्रमवाचक दृष्टिकोण को अधिक व्यावहारिक माना जाता है।
प्रश्न 06. बजट रेखा (Budget Line) क्या है? इसमें खिसकाव (Shift) किन कारणों से होता है?
परिचय
प्रत्येक उपभोक्ता की आय सीमित होती है, जबकि उसकी आवश्यकताएँ अनेक होती हैं। इसलिए उपभोक्ता अपनी सीमित आय का उपयोग सोच-समझकर करता है। वह अपनी आय और वस्तुओं की कीमतों को ध्यान में रखकर अलग-अलग वस्तुओं के ऐसे संयोजन का चुनाव करता है, जिन्हें वह खरीद सकता है। उपभोक्ता की आय और वस्तुओं की कीमतों के आधार पर उपलब्ध विभिन्न संयोजनों को दिखाने वाली रेखा को बजट रेखा कहा जाता है। यह उपभोक्ता की क्रय शक्ति और उसकी खरीदने की सीमा को समझने में सहायता करती है।
बजट रेखा का अर्थ
बजट रेखा वह रेखा है जो दो वस्तुओं के उन सभी संभावित संयोजनों को दिखाती है जिन्हें उपभोक्ता अपनी निश्चित आय और दी गई कीमतों पर खरीद सकता है।
सरल शब्दों में, बजट रेखा उपभोक्ता की आय और वस्तुओं की कीमतों के आधार पर उसकी अधिकतम खरीद क्षमता को दर्शाती है।
मान लीजिए किसी उपभोक्ता के पास 100 रुपये हैं और वह केवल सेब तथा केले खरीदना चाहता है। यदि एक सेब 10 रुपये और एक केला 5 रुपये का है, तो वह अपनी 100 रुपये की पूरी आय से इन दोनों वस्तुओं के अलग-अलग संयोजन खरीद सकता है। इन सभी अधिकतम संभव संयोजनों को मिलाने पर बजट रेखा प्राप्त होती है।
बजट रेखा का समीकरण
बजट रेखा को सामान्य रूप से इस प्रकार लिखा जा सकता है—
M = Px × X + Py × Y
यहाँ—
- M = उपभोक्ता की आय
- Px = वस्तु X की कीमत
- Py = वस्तु Y की कीमत
- X और Y = दोनों वस्तुओं की खरीदी गई मात्रा
इससे स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता अपनी पूरी आय को दोनों वस्तुओं पर खर्च करता है।
बजट रेखा की मुख्य विशेषता
बजट रेखा सामान्यतः बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुकी होती है। इसका कारण यह है कि यदि उपभोक्ता एक वस्तु की अधिक मात्रा खरीदता है, तो समान आय में दूसरी वस्तु की मात्रा कम करनी पड़ती है।
बजट रेखा का ढलान दोनों वस्तुओं की कीमतों के अनुपात को दर्शाता है।
बजट रेखा में खिसकाव का अर्थ
जब उपभोक्ता की आय या दोनों वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन होता है, तो उसकी खरीदने की क्षमता बदल जाती है। इसके कारण बजट रेखा अपनी पुरानी स्थिति से आगे या पीछे चली जाती है। इसे बजट रेखा में खिसकाव कहा जाता है।
बजट रेखा में खिसकाव मुख्य रूप से उपभोक्ता की आय में परिवर्तन के कारण होता है।
आय में वृद्धि के कारण खिसकाव
यदि दोनों वस्तुओं की कीमतें समान रहती हैं और उपभोक्ता की आय बढ़ जाती है, तो वह दोनों वस्तुओं की अधिक मात्रा खरीद सकता है।
इस स्थिति में बजट रेखा समानांतर रूप से बाहर की ओर खिसकती है।
उदाहरण के लिए, यदि उपभोक्ता की आय 1,000 रुपये से बढ़कर 1,500 रुपये हो जाती है और वस्तुओं की कीमतों में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो उसकी खरीदने की क्षमता बढ़ जाएगी।
इसलिए नई बजट रेखा पुरानी रेखा से ऊपर और दाईं ओर होगी।
आय में कमी के कारण खिसकाव
यदि दोनों वस्तुओं की कीमतें समान रहती हैं और उपभोक्ता की आय कम हो जाती है, तो उसकी खरीदने की क्षमता भी कम हो जाती है।
इस स्थिति में बजट रेखा समानांतर रूप से अंदर की ओर खिसकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी उपभोक्ता की आय 1,000 रुपये से घटकर 700 रुपये हो जाती है, तो वह पहले की तुलना में दोनों वस्तुओं की कम मात्रा खरीद पाएगा।
वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन
बजट रेखा में परिवर्तन केवल आय के कारण ही नहीं होता। यदि किसी एक वस्तु या दोनों वस्तुओं की कीमत बदलती है, तो बजट रेखा का स्थान या उसका ढलान भी बदल सकता है।
एक वस्तु की कीमत में कमी
यदि एक वस्तु की कीमत घटती है और दूसरी वस्तु की कीमत तथा उपभोक्ता की आय समान रहती है, तो उपभोक्ता उस वस्तु की अधिक मात्रा खरीद सकता है।
इस स्थिति में बजट रेखा उस वस्तु की ओर बाहर की तरफ घूमती है।
एक वस्तु की कीमत में वृद्धि
यदि एक वस्तु की कीमत बढ़ जाती है और दूसरी वस्तु की कीमत तथा आय समान रहती है, तो उस वस्तु की अधिकतम खरीदी जाने वाली मात्रा कम हो जाती है।
इस स्थिति में बजट रेखा उस वस्तु की ओर अंदर की तरफ घूमती है।
दोनों वस्तुओं की कीमतों में समान परिवर्तन
यदि दोनों वस्तुओं की कीमतें समान अनुपात में बढ़ती हैं और आय में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो उपभोक्ता की वास्तविक क्रय शक्ति कम हो जाती है। इससे बजट रेखा अंदर की ओर खिसकती है।
इसके विपरीत, यदि दोनों वस्तुओं की कीमतें समान अनुपात में घटती हैं, तो उपभोक्ता की वास्तविक क्रय शक्ति बढ़ जाती है और बजट रेखा बाहर की ओर खिसकती है।
बजट रेखा के खिसकाव को याद रखने का आसान तरीका
परीक्षा में इसे आसानी से इस प्रकार याद रखा जा सकता है—
- आय बढ़े → बजट रेखा बाहर की ओर खिसकेगी।
- आय घटे → बजट रेखा अंदर की ओर खिसकेगी।
- एक वस्तु की कीमत घटे → उस वस्तु की ओर रेखा बाहर घूमेगी।
- एक वस्तु की कीमत बढ़े → उस वस्तु की ओर रेखा अंदर घूमेगी।
- दोनों वस्तुओं की कीमत समान अनुपात में घटे → रेखा बाहर खिसकेगी।
- दोनों वस्तुओं की कीमत समान अनुपात में बढ़े → रेखा अंदर खिसकेगी।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि बजट रेखा उपभोक्ता की सीमित आय और वस्तुओं की कीमतों के आधार पर उसकी खरीदने की क्षमता को दर्शाती है। यह दो वस्तुओं के उन सभी संयोजनों को दिखाती है जिन्हें उपभोक्ता अपनी पूरी आय खर्च करके खरीद सकता है। बजट रेखा में खिसकाव मुख्य रूप से आय और वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन के कारण होता है। आय बढ़ने पर यह बाहर की ओर और आय घटने पर अंदर की ओर खिसकती है। इस प्रकार बजट रेखा उपभोक्ता के आर्थिक व्यवहार को समझने का महत्वपूर्ण साधन है।
प्रश्न 07. गिफिन वस्तुओं (Giffen Goods) के संदर्भ में कीमत प्रभाव और प्रतिस्थापन प्रभाव को समझाइए।
परिचय
सामान्य रूप से किसी वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी माँग कम हो जाती है और कीमत घटने पर माँग बढ़ जाती है। लेकिन कुछ विशेष वस्तुओं के मामले में इसका उल्टा भी हो सकता है। ऐसी वस्तुओं को गिफिन वस्तुएँ कहा जाता है। गिफिन वस्तुओं की माँग पर कीमत में परिवर्तन का प्रभाव समझने के लिए कीमत प्रभाव और प्रतिस्थापन प्रभाव को समझना जरूरी है। इन दोनों प्रभावों की सहायता से यह समझा जा सकता है कि कीमत बदलने पर उपभोक्ता अपने वस्तु-चयन में किस प्रकार परिवर्तन करता है।
गिफिन वस्तुओं का अर्थ
गिफिन वस्तुएँ वे निम्न स्तर की वस्तुएँ हैं जिनकी कीमत बढ़ने पर उनकी माँग बढ़ सकती है और कीमत घटने पर उनकी माँग कम हो सकती है। यह सामान्य माँग के नियम के विपरीत स्थिति है।
ऐसी वस्तुएँ सामान्यतः गरीब उपभोक्ताओं के बजट में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन वस्तुओं का सस्ता होना उपभोक्ता की वास्तविक आय को प्रभावित करता है और कीमत बढ़ने पर आय प्रभाव इतना अधिक हो सकता है कि वह प्रतिस्थापन प्रभाव को भी पीछे छोड़ देता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी गरीब परिवार के भोजन में सस्ता अनाज मुख्य वस्तु है और उसकी कीमत बढ़ जाती है, तो परिवार की वास्तविक आय कम हो सकती है। परिवार महँगी वस्तुओं की खरीद और कम करके उसी सस्ते अनाज पर अधिक निर्भर हो सकता है। इस प्रकार कीमत बढ़ने के बावजूद उस वस्तु की माँग बढ़ सकती है।
कीमत प्रभाव का अर्थ
किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन के कारण उसकी माँग में होने वाले कुल परिवर्तन को कीमत प्रभाव कहा जाता है।
सरल शब्दों में, जब किसी वस्तु की कीमत बदलती है, तो उपभोक्ता की खरीद की मात्रा में जो कुल बदलाव होता है, वह कीमत प्रभाव कहलाता है।
कीमत प्रभाव में दो प्रभाव शामिल होते हैं—
- प्रतिस्थापन प्रभाव
- आय प्रभाव
इस प्रकार—
कीमत प्रभाव = प्रतिस्थापन प्रभाव + आय प्रभाव
गिफिन वस्तुओं के मामले में कीमत प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ आय प्रभाव बहुत मजबूत होता है।
प्रतिस्थापन प्रभाव का अर्थ
जब किसी वस्तु की कीमत बदलती है, तो दूसरी वस्तुओं की तुलना में वह वस्तु सस्ती या महँगी हो जाती है। इसके कारण उपभोक्ता महँगी वस्तु के स्थान पर अपेक्षाकृत सस्ती वस्तु को अधिक खरीदने की कोशिश करता है। इसे प्रतिस्थापन प्रभाव कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि चावल की कीमत कम हो जाती है और दाल की कीमत समान रहती है, तो चावल दाल की तुलना में सस्ता हो जाता है। उपभोक्ता दाल के स्थान पर चावल की मात्रा बढ़ा सकता है। यही प्रतिस्थापन प्रभाव है।
गिफिन वस्तु के मामले में भी प्रतिस्थापन प्रभाव सामान्य रूप से काम करता है। यदि गिफिन वस्तु की कीमत बढ़ती है, तो उपभोक्ता दूसरी वस्तुओं की तुलना में उसे कम खरीदना चाहेगा।
गिफिन वस्तुओं में आय प्रभाव
गिफिन वस्तुओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनका मजबूत ऋणात्मक आय प्रभाव है। जब किसी गिफिन वस्तु की कीमत बढ़ती है, तो गरीब उपभोक्ता की वास्तविक आय कम हो जाती है। वह पहले की तुलना में कम वस्तुएँ खरीद पाता है।
ऐसी स्थिति में उपभोक्ता महँगी और बेहतर वस्तुओं की खरीद कम करके गिफिन वस्तु की ओर अधिक झुक सकता है, क्योंकि वह उसके लिए मुख्य भोजन या आवश्यक वस्तु होती है।
उदाहरण के लिए, किसी गरीब परिवार के भोजन में मोटा अनाज मुख्य भोजन है। यदि उसकी कीमत बढ़ती है, तो परिवार के पास दूध, फल या मांस जैसी अन्य वस्तुओं के लिए कम पैसा बचेगा। इसलिए परिवार इन वस्तुओं की मात्रा कम करके मोटे अनाज का अधिक सेवन कर सकता है।
गिफिन वस्तुओं में कीमत प्रभाव और प्रतिस्थापन प्रभाव का संबंध
गिफिन वस्तुओं में कीमत प्रभाव और प्रतिस्थापन प्रभाव की दिशा अलग हो सकती है।
यदि गिफिन वस्तु की कीमत बढ़ती है—
- प्रतिस्थापन प्रभाव के कारण उसकी माँग कम होती है।
- आय प्रभाव के कारण उसकी माँग बढ़ सकती है।
- जब आय प्रभाव प्रतिस्थापन प्रभाव से अधिक शक्तिशाली होता है, तो कुल कीमत प्रभाव सकारात्मक हो जाता है।
- परिणामस्वरूप कीमत बढ़ने पर गिफिन वस्तु की माँग भी बढ़ सकती है।
इसी कारण गिफिन वस्तुएँ माँग के सामान्य नियम के अपवाद के रूप में देखी जाती हैं।
गिफिन वस्तुओं में कीमत घटने की स्थिति
यदि गिफिन वस्तु की कीमत घटती है, तो सामान्य रूप से प्रतिस्थापन प्रभाव के कारण उपभोक्ता उसकी अधिक मात्रा खरीदना चाहेगा। लेकिन कीमत घटने से उपभोक्ता की वास्तविक आय बढ़ जाती है। मजबूत आय प्रभाव के कारण वह गिफिन वस्तु की जगह बेहतर और महँगी वस्तुओं का अधिक सेवन कर सकता है।
इस स्थिति में गिफिन वस्तु की माँग घट सकती है।
इस प्रकार गिफिन वस्तु की कीमत घटने पर भी उसकी माँग में कमी आ सकती है।
गिफिन वस्तु की मुख्य शर्तें
किसी वस्तु को गिफिन वस्तु बनने के लिए सामान्यतः कुछ परिस्थितियाँ आवश्यक मानी जाती हैं—
- वह वस्तु निम्न स्तर की वस्तु हो।
- उपभोक्ता की आय बहुत कम हो।
- उस वस्तु पर आय का बड़ा हिस्सा खर्च होता हो।
- उसके स्थान पर उपलब्ध बेहतर वस्तुएँ अपेक्षाकृत महँगी हों।
- आय प्रभाव इतना मजबूत हो कि वह प्रतिस्थापन प्रभाव को पीछे छोड़ दे।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि गिफिन वस्तुएँ माँग के सामान्य नियम का एक महत्वपूर्ण अपवाद हैं। इन वस्तुओं में कीमत बढ़ने पर सामान्यतः प्रतिस्थापन प्रभाव माँग को कम करता है, लेकिन मजबूत ऋणात्मक आय प्रभाव माँग को बढ़ा सकता है। जब आय प्रभाव प्रतिस्थापन प्रभाव से अधिक हो जाता है, तब कीमत बढ़ने पर भी गिफिन वस्तु की माँग बढ़ जाती है। इसलिए गिफिन वस्तुओं को समझने के लिए कीमत प्रभाव, प्रतिस्थापन प्रभाव और आय प्रभाव के बीच संबंध को समझना आवश्यक है।
प्रश्न 08. परिवर्तनशील अनुपातों के नियम (Law of Variable Proportions) की तीनों अवस्थाओं की व्याख्या कीजिए।
परिचय
उत्पादन करने के लिए भूमि, श्रम, पूँजी और अन्य साधनों की आवश्यकता होती है। अल्पकाल में कुछ साधन स्थिर रहते हैं, जबकि कुछ साधनों की मात्रा को बदला जा सकता है। जब स्थिर साधनों के साथ किसी एक परिवर्तनशील साधन की मात्रा लगातार बढ़ाई जाती है, तो उत्पादन में अलग-अलग प्रकार के परिवर्तन होते हैं। इन्हीं परिवर्तनों को समझाने के लिए परिवर्तनशील अनुपातों का नियम प्रयोग किया जाता है। यह नियम उत्पादन के अल्पकालीन व्यवहार को समझने में बहुत महत्वपूर्ण है।
परिवर्तनशील अनुपातों के नियम का अर्थ
परिवर्तनशील अनुपातों का नियम बताता है कि जब अन्य उत्पादन साधनों को स्थिर रखते हुए किसी एक परिवर्तनशील साधन की मात्रा लगातार बढ़ाई जाती है, तो कुल उत्पादन पहले बढ़ती दर से बढ़ता है, फिर घटती दर से बढ़ता है और अंत में घटने भी लगता है।
सरल शब्दों में, जब स्थिर साधनों के साथ परिवर्तनशील साधन की मात्रा बढ़ाई जाती है, तो उत्पादन में पहले तेजी से वृद्धि होती है, फिर धीमी गति से वृद्धि होती है और अंत में उत्पादन घटने लगता है।
उदाहरण के लिए, यदि एक किसान के पास भूमि निश्चित है और वह उस भूमि पर लगातार अधिक श्रमिक लगाता है, तो शुरुआत में श्रमिकों की संख्या बढ़ने से उत्पादन तेजी से बढ़ेगा। कुछ समय बाद श्रमिकों की अधिक संख्या के कारण उत्पादन कम गति से बढ़ेगा और बहुत अधिक श्रमिक लगाने पर कुल उत्पादन घट भी सकता है।
परिवर्तनशील अनुपातों के नियम की तीन अवस्थाएँ होती हैं।
पहली अवस्था — बढ़ते प्रतिफल की अवस्था
इस अवस्था में परिवर्तनशील साधन की मात्रा बढ़ाने पर कुल उत्पादन बढ़ती दर से बढ़ता है। अर्थात प्रत्येक अतिरिक्त श्रमिक पहले वाले श्रमिक की तुलना में अधिक उत्पादन बढ़ाने में सहायता करता है।
इस अवस्था में स्थिर साधनों का पूरा उपयोग नहीं हो रहा होता है। इसलिए जब परिवर्तनशील साधन की मात्रा बढ़ाई जाती है, तो स्थिर और परिवर्तनशील साधनों का बेहतर तालमेल बनता है।
पहली अवस्था की मुख्य विशेषताएँ
- कुल उत्पादन तेजी से बढ़ता है।
- औसत उत्पादन बढ़ता है।
- सीमांत उत्पादन बढ़ता है।
- स्थिर साधनों का बेहतर उपयोग होने लगता है।
- उत्पादन में बढ़ती हुई दर से वृद्धि होती है।
उदाहरण के लिए, यदि एक खेत में केवल एक श्रमिक काम कर रहा है, तो वह भूमि का पूरा उपयोग नहीं कर पाएगा। दो या तीन श्रमिक लगाने पर खेत का बेहतर उपयोग होगा और उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है।
यह अवस्था तब समाप्त होती है जब औसत उत्पादन अपने अधिकतम स्तर पर पहुँच जाता है।
दूसरी अवस्था — घटते प्रतिफल की अवस्था
दूसरी अवस्था में परिवर्तनशील साधन की मात्रा बढ़ाने पर कुल उत्पादन बढ़ता तो है, लेकिन अब उत्पादन बढ़ने की गति कम हो जाती है। इस अवस्था में प्रत्येक अतिरिक्त श्रमिक पहले की तुलना में कम अतिरिक्त उत्पादन करता है।
इसका मुख्य कारण यह है कि स्थिर साधन सीमित होते हैं। जैसे-जैसे श्रमिकों की संख्या बढ़ती जाती है, प्रत्येक श्रमिक को उपलब्ध स्थिर साधन का कम हिस्सा मिलता है।
दूसरी अवस्था की मुख्य विशेषताएँ
- कुल उत्पादन बढ़ता है, लेकिन घटती दर से।
- सीमांत उत्पादन घटता है, लेकिन धनात्मक रहता है।
- औसत उत्पादन भी धीरे-धीरे घटने लगता है।
- स्थिर साधनों पर दबाव बढ़ता है।
- उत्पादन की दृष्टि से यह सबसे महत्वपूर्ण और तर्कसंगत अवस्था है।
उदाहरण के लिए, एक निश्चित आकार के खेत में श्रमिकों की संख्या बढ़ाने पर शुरुआत में उत्पादन तेजी से बढ़ेगा, लेकिन एक सीमा के बाद अतिरिक्त श्रमिकों के लिए पर्याप्त भूमि और साधन उपलब्ध नहीं होंगे। इसलिए प्रत्येक अतिरिक्त श्रमिक का योगदान कम होता जाएगा।
दूसरी अवस्था उस समय समाप्त होती है जब सीमांत उत्पादन शून्य हो जाता है और कुल उत्पादन अपने अधिकतम स्तर पर पहुँच जाता है।
तीसरी अवस्था — ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था
तीसरी अवस्था में परिवर्तनशील साधन की मात्रा बढ़ाने पर कुल उत्पादन घटने लगता है। इस अवस्था में परिवर्तनशील साधन इतने अधिक हो जाते हैं कि स्थिर साधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
उदाहरण के लिए, यदि एक निश्चित आकार के खेत में आवश्यकता से बहुत अधिक श्रमिक लगा दिए जाएँ, तो वे एक-दूसरे के काम में बाधा डाल सकते हैं। इससे उत्पादन बढ़ने के बजाय कम होने लगता है।
तीसरी अवस्था की मुख्य विशेषताएँ
- कुल उत्पादन घटने लगता है।
- सीमांत उत्पादन ऋणात्मक हो जाता है।
- औसत उत्पादन भी घटता रहता है।
- परिवर्तनशील साधन आवश्यकता से अधिक हो जाते हैं।
- स्थिर साधनों का अत्यधिक दबाव के साथ उपयोग होता है।
इस अवस्था में अतिरिक्त परिवर्तनशील साधन लगाने से कुल उत्पादन कम होता है। इसलिए कोई भी उत्पादक सामान्य स्थिति में इस अवस्था में उत्पादन करना पसंद नहीं करेगा।
तीनों अवस्थाओं का संक्षिप्त क्रम
परिवर्तनशील अनुपातों के नियम की तीनों अवस्थाओं को आसानी से इस प्रकार याद किया जा सकता है—
- पहली अवस्था: उत्पादन तेजी से बढ़ता है।
- दूसरी अवस्था: उत्पादन बढ़ता है, लेकिन धीमी गति से।
- तीसरी अवस्था: उत्पादन घटने लगता है।
उत्पादक के लिए सामान्यतः दूसरी अवस्था सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि इस अवस्था में सीमांत उत्पादन धनात्मक रहता है और उपलब्ध साधनों का उचित उपयोग होता है।
नियम का महत्व
परिवर्तनशील अनुपातों का नियम उत्पादन संबंधी निर्णय लेने में बहुत उपयोगी है। इससे उत्पादक को यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी स्थिर साधन के साथ परिवर्तनशील साधन की कितनी मात्रा का उपयोग करना उचित होगा।
इसके माध्यम से—
- उत्पादन की सही मात्रा तय करने में सहायता मिलती है।
- श्रमिकों की उचित संख्या तय की जा सकती है।
- साधनों के बेहतर उपयोग का पता चलता है।
- उत्पादन की लागत को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।
- उत्पादक को उचित उत्पादन अवस्था चुनने में मदद मिलती है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि परिवर्तनशील अनुपातों का नियम यह बताता है कि अल्पकाल में जब स्थिर साधनों के साथ परिवर्तनशील साधन को बढ़ाया जाता है, तो उत्पादन में तीन अवस्थाएँ आती हैं। पहली अवस्था में बढ़ते प्रतिफल, दूसरी अवस्था में घटते प्रतिफल और तीसरी अवस्था में ऋणात्मक प्रतिफल प्राप्त होता है। इनमें दूसरी अवस्था उत्पादक के लिए सबसे उचित मानी जाती है, क्योंकि इसमें परिवर्तनशील साधन का उपयोग उचित मात्रा में होता है और कुल उत्पादन भी अधिकतम स्तर की ओर बढ़ता है।
प्रश्न 09. आंतरिक और बाह्य मितव्ययिताओं (Economies of Scale) में क्या अंतर है?
परिचय
जब कोई फर्म अपने उत्पादन का आकार बढ़ाती है, तो कई बार प्रति इकाई उत्पादन लागत कम होने लगती है। उत्पादन के बड़े स्तर पर कम लागत में वस्तुओं का उत्पादन करने से फर्म को लाभ मिलता है। इसे मितव्ययिताएँ या पैमाने की बचत कहा जाता है। मितव्ययिताएँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं—आंतरिक मितव्ययिताएँ और बाह्य मितव्ययिताएँ। दोनों का संबंध उत्पादन लागत में कमी से है, लेकिन इनके कारण और प्रभाव अलग-अलग होते हैं।
मितव्ययिताओं का अर्थ
मितव्ययिता का अर्थ उत्पादन के बड़े स्तर पर प्रति इकाई लागत में होने वाली कमी से है। जब किसी फर्म का उत्पादन बढ़ता है और उसके कारण एक वस्तु की औसत लागत कम हो जाती है, तो इसे पैमाने की बचत कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी फर्म द्वारा 1,000 वस्तुओं का उत्पादन करने पर प्रति वस्तु लागत 20 रुपये है, लेकिन उत्पादन बढ़ाकर 5,000 वस्तुएँ करने पर प्रति वस्तु लागत 15 रुपये रह जाती है, तो लागत में यह कमी मितव्ययिता का उदाहरण है।
आंतरिक मितव्ययिताएँ
आंतरिक मितव्ययिताएँ वे लाभ हैं जो किसी फर्म को अपने उत्पादन का आकार बढ़ाने के कारण स्वयं प्राप्त होते हैं। इनका संबंध फर्म के अंदर होने वाले विस्तार और बेहतर व्यवस्था से होता है।
अर्थात आंतरिक मितव्ययिता का लाभ केवल उस फर्म को मिलता है जो अपने उत्पादन का विस्तार करती है।
आंतरिक मितव्ययिताओं के प्रमुख कारण
- तकनीकी मितव्ययिता: बड़े स्तर पर आधुनिक मशीनों और बेहतर तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।
- प्रबंधकीय मितव्ययिता: बड़े व्यवसाय में काम को अलग-अलग विभागों में बाँटकर विशेषज्ञ कर्मचारियों की सहायता ली जा सकती है।
- विपणन मितव्ययिता: बड़ी मात्रा में उत्पादन और बिक्री करने से विज्ञापन तथा बिक्री पर होने वाला खर्च प्रति इकाई कम हो सकता है।
- वित्तीय मितव्ययिता: बड़ी फर्मों को बैंकों और अन्य संस्थाओं से अपेक्षाकृत आसानी से और कम लागत पर ऋण मिल सकता है।
- जोखिम उठाने की क्षमता: बड़ी फर्म अपने जोखिम को अलग-अलग उत्पादों और बाजारों में बाँट सकती है।
बाह्य मितव्ययिताएँ
बाह्य मितव्ययिताएँ वे लाभ हैं जो किसी एक फर्म के उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि पूरे उद्योग या क्षेत्र के विकास के कारण प्राप्त होते हैं। जब किसी क्षेत्र में एक ही प्रकार की कई फर्में स्थापित होती हैं, तो वहाँ सुविधाएँ और सेवाएँ विकसित होने लगती हैं। इससे उस क्षेत्र की सभी फर्मों की लागत कम हो सकती है।
अर्थात बाह्य मितव्ययिता का लाभ किसी एक फर्म के बजाय पूरे उद्योग की फर्मों को मिल सकता है।
बाह्य मितव्ययिताओं के प्रमुख कारण
- उद्योग के आसपास बेहतर परिवहन सुविधाएँ विकसित होना।
- कुशल श्रमिकों की उपलब्धता बढ़ना।
- कच्चे माल की आसानी से उपलब्धता।
- बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का विकास।
- बिजली और संचार जैसी सुविधाओं में सुधार।
- सहायक उद्योगों का विकास।
- नई तकनीक और जानकारी का तेजी से प्रसार।
उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में कपड़ा उद्योग का विकास होता है, तो वहाँ कपड़े से संबंधित कच्चे माल, परिवहन, कुशल श्रमिक और अन्य सेवाएँ आसानी से उपलब्ध होने लगती हैं। इससे उस क्षेत्र की सभी कपड़ा फर्मों को लाभ मिल सकता है।
आंतरिक और बाह्य मितव्ययिताओं में अंतर
लाभ का आधार
- आंतरिक मितव्ययिता फर्म के अपने विस्तार से उत्पन्न होती है।
- बाह्य मितव्ययिता पूरे उद्योग या क्षेत्र के विकास से उत्पन्न होती है।
लाभ किसे मिलता है
- आंतरिक मितव्ययिता का लाभ मुख्य रूप से उसी फर्म को मिलता है जो उत्पादन बढ़ाती है।
- बाह्य मितव्ययिता का लाभ एक ही उद्योग की कई फर्मों को मिल सकता है।
मुख्य कारण
- आंतरिक मितव्ययिता के कारण फर्म की तकनीक, प्रबंधन, वित्त और उत्पादन व्यवस्था में सुधार होता है।
- बाह्य मितव्ययिता के कारण उद्योग के आसपास परिवहन, श्रम, कच्चे माल और अन्य सुविधाओं का विकास होता है।
नियंत्रण
- आंतरिक मितव्ययिता पर फर्म का काफी नियंत्रण होता है।
- बाह्य मितव्ययिता पर किसी एक फर्म का सीधा नियंत्रण नहीं होता।
प्रभाव का क्षेत्र
- आंतरिक मितव्ययिता का प्रभाव मुख्य रूप से एक फर्म तक सीमित रहता है।
- बाह्य मितव्ययिता का प्रभाव पूरे उद्योग या क्षेत्र पर पड़ सकता है।
उदाहरण
- बड़ी फर्म द्वारा आधुनिक मशीन लगाकर लागत कम करना आंतरिक मितव्ययिता है।
- किसी औद्योगिक क्षेत्र में बेहतर सड़क और परिवहन सुविधा विकसित होने से सभी फर्मों की लागत कम होना बाह्य मितव्ययिता है।
सरल रूप में अंतर याद रखने का तरीका
परीक्षा में दोनों के अंतर को आसानी से इस प्रकार याद रखा जा सकता है—
- फर्म का विस्तार → आंतरिक मितव्ययिता
- उद्योग का विस्तार → बाह्य मितव्ययिता
- लाभ एक फर्म को → आंतरिक
- लाभ कई फर्मों को → बाह्य
- फर्म के अंदर के कारण → आंतरिक
- उद्योग या क्षेत्र के कारण → बाह्य
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि आंतरिक और बाह्य दोनों मितव्ययिताओं का मुख्य उद्देश्य उत्पादन की प्रति इकाई लागत को कम करना है। आंतरिक मितव्ययिताएँ फर्म के अपने विस्तार और बेहतर प्रबंधन के कारण उत्पन्न होती हैं, जबकि बाह्य मितव्ययिताएँ पूरे उद्योग या क्षेत्र के विकास के कारण प्राप्त होती हैं। इसलिए दोनों में मुख्य अंतर उनके उत्पन्न होने के कारण और लाभ प्राप्त करने वाली इकाइयों का है। दोनों ही उत्पादन बढ़ाने और लागत कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न 10. दीर्घकालीन औसत लागत वक्र (LAC) को ‘लिफाफा वक्र’ (Envelope Curve) क्यों कहा जाता है?
परिचय
उत्पादन की लागत का अध्ययन व्यष्टि अर्थशास्त्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी फर्म के लिए यह जानना जरूरी होता है कि अलग-अलग उत्पादन स्तरों पर उसकी प्रति इकाई लागत कितनी होगी। अल्पकाल में कुछ उत्पादन साधन स्थिर रहते हैं, इसलिए फर्म के पास अलग-अलग आकार के कारखानों के अनुसार अलग-अलग औसत लागत वक्र होते हैं। लेकिन दीर्घकाल में फर्म सभी उत्पादन साधनों को बदल सकती है और अपनी आवश्यकता के अनुसार उत्पादन का आकार भी तय कर सकती है। ऐसे में अलग-अलग अल्पकालीन औसत लागत वक्रों को मिलाकर जो दीर्घकालीन औसत लागत वक्र प्राप्त होता है, उसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
दीर्घकालीन औसत लागत वक्र का अर्थ
दीर्घकालीन औसत लागत वक्र को LAC कहा जाता है। यह बताता है कि दीर्घकाल में किसी फर्म द्वारा अलग-अलग उत्पादन स्तरों पर प्रति इकाई उत्पादन की न्यूनतम औसत लागत कितनी होगी।
दीर्घकाल में फर्म उत्पादन के सभी साधनों को बदल सकती है। वह छोटे, मध्यम या बड़े आकार के कारखाने में से अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी भी आकार का चुनाव कर सकती है। इसलिए LAC फर्म को यह बताता है कि प्रत्येक उत्पादन स्तर पर किस आकार के संयंत्र से सबसे कम औसत लागत प्राप्त की जा सकती है।
लिफाफा वक्र का अर्थ
लिफाफा वह होता है जो कई वस्तुओं या रेखाओं को अपने अंदर समेटे रहता है। इसी प्रकार LAC वक्र कई अल्पकालीन औसत लागत वक्रों को अपने अंदर समेटता या स्पर्श करता है। इसलिए इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
सरल शब्दों में, LAC वक्र विभिन्न अल्पकालीन औसत लागत वक्रों के ऐसे भागों को जोड़ता है जहाँ फर्म को किसी विशेष उत्पादन स्तर पर न्यूनतम औसत लागत प्राप्त होती है।
अल्पकालीन औसत लागत वक्र और LAC का संबंध
अल्पकाल में फर्म के पास संयंत्र का आकार बदलने की पूरी स्वतंत्रता नहीं होती। इसलिए अलग-अलग संयंत्र आकारों के लिए अलग-अलग अल्पकालीन औसत लागत वक्र होते हैं। इन्हें सामान्य रूप से SAC वक्र कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी फर्म के पास छोटे, मध्यम और बड़े आकार के तीन संयंत्र हैं। इन तीनों संयंत्रों के लिए अलग-अलग SAC वक्र होंगे।
दीर्घकाल में फर्म इन तीनों में से किसी भी संयंत्र का चुनाव कर सकती है। इसलिए प्रत्येक उत्पादन स्तर पर वह उस संयंत्र को चुनेगी जिसकी औसत लागत सबसे कम हो।
इन न्यूनतम लागत वाले बिंदुओं को मिलाने से LAC वक्र प्राप्त होता है।
LAC को लिफाफा वक्र कहने के मुख्य कारण
कई SAC वक्रों को समेटता है
LAC अनेक अल्पकालीन औसत लागत वक्रों से संबंधित होता है। अलग-अलग संयंत्र आकारों के लिए अलग-अलग SAC वक्र होते हैं और LAC उनके उपयुक्त भागों को समेटता है।
इसी कारण इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
न्यूनतम औसत लागत को दर्शाता है
LAC प्रत्येक उत्पादन स्तर पर न्यूनतम संभव औसत लागत बताता है। फर्म दीर्घकाल में ऐसे संयंत्र का चुनाव करती है जिससे उस उत्पादन स्तर पर लागत सबसे कम हो।
इस प्रकार LAC विभिन्न SAC वक्रों में से न्यूनतम लागत वाले विकल्प को दर्शाता है।
SAC वक्रों को स्पर्श करता है
सामान्य स्थिति में LAC अलग-अलग SAC वक्रों को उनके न्यूनतम लागत वाले उपयुक्त भागों के आसपास स्पर्श करता है। इस कारण LAC को कई SAC वक्रों का लिफाफा माना जाता है।
हालाँकि प्रत्येक SAC वक्र का पूरा भाग LAC का हिस्सा नहीं होता। केवल वह भाग महत्वपूर्ण होता है जहाँ संबंधित संयंत्र से अन्य उपलब्ध संयंत्रों की तुलना में कम लागत प्राप्त होती है।
संयंत्र के उचित आकार का चुनाव
दीर्घकाल में फर्म अपने संयंत्र का आकार बदल सकती है। इसलिए LAC फर्म को यह तय करने में सहायता करता है कि किसी विशेष उत्पादन स्तर पर कौन-सा संयंत्र आकार अधिक उचित और कम लागत वाला है।
इस प्रकार LAC अलग-अलग उत्पादन स्तरों के लिए सबसे कम लागत वाले संयंत्र का चुनाव दिखाता है।
LAC का आकार
LAC वक्र सामान्यतः U आकार का माना जाता है। इसका कारण पैमाने की बचत और पैमाने की हानियाँ हैं।
शुरुआत में उत्पादन बढ़ाने पर प्रति इकाई लागत कम होती है। इसे पैमाने की बढ़ती बचत कहा जाता है। एक स्तर के बाद औसत लागत न्यूनतम हो जाती है। इसके बाद यदि उत्पादन का आकार बहुत अधिक बढ़ाया जाए, तो प्रबंधन और अन्य समस्याओं के कारण प्रति इकाई लागत बढ़ सकती है। इसे पैमाने की घटती बचत कहा जाता है।
इस प्रकार LAC वक्र पहले नीचे आता है, फिर न्यूनतम बिंदु के आसपास पहुँचता है और उसके बाद ऊपर उठ सकता है।
एक आसान उदाहरण
मान लीजिए किसी फर्म के पास तीन अलग-अलग आकार के कारखाने हैं—
- छोटा कारखाना
- मध्यम कारखाना
- बड़ा कारखाना
छोटे उत्पादन के लिए छोटा कारखाना सबसे कम लागत वाला हो सकता है। मध्यम उत्पादन के लिए मध्यम कारखाना और बड़े उत्पादन के लिए बड़ा कारखाना अधिक लाभदायक हो सकता है।
इस प्रकार प्रत्येक उत्पादन स्तर पर सबसे कम लागत वाले संयंत्र को चुनने पर जो वक्र बनता है, वही LAC है। क्योंकि यह अलग-अलग SAC वक्रों को अपने अंदर समेटता है, इसलिए इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि दीर्घकालीन औसत लागत वक्र को लिफाफा वक्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न अल्पकालीन औसत लागत वक्रों के उपयुक्त और न्यूनतम लागत वाले भागों को समेटता है। दीर्घकाल में फर्म अपने संयंत्र का आकार बदल सकती है और प्रत्येक उत्पादन स्तर पर सबसे कम लागत वाला संयंत्र चुन सकती है। इसलिए LAC फर्म को विभिन्न उत्पादन स्तरों पर न्यूनतम औसत लागत बताता है। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है और इसी कारण इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
प्रश्न 10. दीर्घकालीन औसत लागत वक्र (LAC) को ‘लिफाफा वक्र’ (Envelope Curve) क्यों कहा जाता है?
परिचय
उत्पादन की लागत का अध्ययन व्यष्टि अर्थशास्त्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी फर्म के लिए यह जानना जरूरी होता है कि अलग-अलग उत्पादन स्तरों पर उसकी प्रति इकाई लागत कितनी होगी। अल्पकाल में कुछ उत्पादन साधन स्थिर रहते हैं, इसलिए फर्म के पास अलग-अलग आकार के कारखानों के अनुसार अलग-अलग औसत लागत वक्र होते हैं। लेकिन दीर्घकाल में फर्म सभी उत्पादन साधनों को बदल सकती है और अपनी आवश्यकता के अनुसार उत्पादन का आकार भी तय कर सकती है। ऐसे में अलग-अलग अल्पकालीन औसत लागत वक्रों को मिलाकर जो दीर्घकालीन औसत लागत वक्र प्राप्त होता है, उसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
दीर्घकालीन औसत लागत वक्र का अर्थ
दीर्घकालीन औसत लागत वक्र को LAC कहा जाता है। यह बताता है कि दीर्घकाल में किसी फर्म द्वारा अलग-अलग उत्पादन स्तरों पर प्रति इकाई उत्पादन की न्यूनतम औसत लागत कितनी होगी।
दीर्घकाल में फर्म उत्पादन के सभी साधनों को बदल सकती है। वह छोटे, मध्यम या बड़े आकार के कारखाने में से अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी भी आकार का चुनाव कर सकती है। इसलिए LAC फर्म को यह बताता है कि प्रत्येक उत्पादन स्तर पर किस आकार के संयंत्र से सबसे कम औसत लागत प्राप्त की जा सकती है।
लिफाफा वक्र का अर्थ
लिफाफा वह होता है जो कई वस्तुओं या रेखाओं को अपने अंदर समेटे रहता है। इसी प्रकार LAC वक्र कई अल्पकालीन औसत लागत वक्रों को अपने अंदर समेटता या स्पर्श करता है। इसलिए इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
सरल शब्दों में, LAC वक्र विभिन्न अल्पकालीन औसत लागत वक्रों के ऐसे भागों को जोड़ता है जहाँ फर्म को किसी विशेष उत्पादन स्तर पर न्यूनतम औसत लागत प्राप्त होती है।
अल्पकालीन औसत लागत वक्र और LAC का संबंध
अल्पकाल में फर्म के पास संयंत्र का आकार बदलने की पूरी स्वतंत्रता नहीं होती। इसलिए अलग-अलग संयंत्र आकारों के लिए अलग-अलग अल्पकालीन औसत लागत वक्र होते हैं। इन्हें सामान्य रूप से SAC वक्र कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी फर्म के पास छोटे, मध्यम और बड़े आकार के तीन संयंत्र हैं। इन तीनों संयंत्रों के लिए अलग-अलग SAC वक्र होंगे।
दीर्घकाल में फर्म इन तीनों में से किसी भी संयंत्र का चुनाव कर सकती है। इसलिए प्रत्येक उत्पादन स्तर पर वह उस संयंत्र को चुनेगी जिसकी औसत लागत सबसे कम हो।
इन न्यूनतम लागत वाले बिंदुओं को मिलाने से LAC वक्र प्राप्त होता है।
LAC को लिफाफा वक्र कहने के मुख्य कारण
कई SAC वक्रों को समेटता है
LAC अनेक अल्पकालीन औसत लागत वक्रों से संबंधित होता है। अलग-अलग संयंत्र आकारों के लिए अलग-अलग SAC वक्र होते हैं और LAC उनके उपयुक्त भागों को समेटता है।
इसी कारण इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
न्यूनतम औसत लागत को दर्शाता है
LAC प्रत्येक उत्पादन स्तर पर न्यूनतम संभव औसत लागत बताता है। फर्म दीर्घकाल में ऐसे संयंत्र का चुनाव करती है जिससे उस उत्पादन स्तर पर लागत सबसे कम हो।
इस प्रकार LAC विभिन्न SAC वक्रों में से न्यूनतम लागत वाले विकल्प को दर्शाता है।
SAC वक्रों को स्पर्श करता है
सामान्य स्थिति में LAC अलग-अलग SAC वक्रों को उनके न्यूनतम लागत वाले उपयुक्त भागों के आसपास स्पर्श करता है। इस कारण LAC को कई SAC वक्रों का लिफाफा माना जाता है।
हालाँकि प्रत्येक SAC वक्र का पूरा भाग LAC का हिस्सा नहीं होता। केवल वह भाग महत्वपूर्ण होता है जहाँ संबंधित संयंत्र से अन्य उपलब्ध संयंत्रों की तुलना में कम लागत प्राप्त होती है।
संयंत्र के उचित आकार का चुनाव
दीर्घकाल में फर्म अपने संयंत्र का आकार बदल सकती है। इसलिए LAC फर्म को यह तय करने में सहायता करता है कि किसी विशेष उत्पादन स्तर पर कौन-सा संयंत्र आकार अधिक उचित और कम लागत वाला है।
इस प्रकार LAC अलग-अलग उत्पादन स्तरों के लिए सबसे कम लागत वाले संयंत्र का चुनाव दिखाता है।
LAC का आकार
LAC वक्र सामान्यतः U आकार का माना जाता है। इसका कारण पैमाने की बचत और पैमाने की हानियाँ हैं।
शुरुआत में उत्पादन बढ़ाने पर प्रति इकाई लागत कम होती है। इसे पैमाने की बढ़ती बचत कहा जाता है। एक स्तर के बाद औसत लागत न्यूनतम हो जाती है। इसके बाद यदि उत्पादन का आकार बहुत अधिक बढ़ाया जाए, तो प्रबंधन और अन्य समस्याओं के कारण प्रति इकाई लागत बढ़ सकती है। इसे पैमाने की घटती बचत कहा जाता है।
इस प्रकार LAC वक्र पहले नीचे आता है, फिर न्यूनतम बिंदु के आसपास पहुँचता है और उसके बाद ऊपर उठ सकता है।
एक आसान उदाहरण
मान लीजिए किसी फर्म के पास तीन अलग-अलग आकार के कारखाने हैं—
- छोटा कारखाना
- मध्यम कारखाना
- बड़ा कारखाना
छोटे उत्पादन के लिए छोटा कारखाना सबसे कम लागत वाला हो सकता है। मध्यम उत्पादन के लिए मध्यम कारखाना और बड़े उत्पादन के लिए बड़ा कारखाना अधिक लाभदायक हो सकता है।
इस प्रकार प्रत्येक उत्पादन स्तर पर सबसे कम लागत वाले संयंत्र को चुनने पर जो वक्र बनता है, वही LAC है। क्योंकि यह अलग-अलग SAC वक्रों को अपने अंदर समेटता है, इसलिए इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि दीर्घकालीन औसत लागत वक्र को लिफाफा वक्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न अल्पकालीन औसत लागत वक्रों के उपयुक्त और न्यूनतम लागत वाले भागों को समेटता है। दीर्घकाल में फर्म अपने संयंत्र का आकार बदल सकती है और प्रत्येक उत्पादन स्तर पर सबसे कम लागत वाला संयंत्र चुन सकती है। इसलिए LAC फर्म को विभिन्न उत्पादन स्तरों पर न्यूनतम औसत लागत बताता है। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है और इसी कारण इसे लिफाफा वक्र कहा जाता है।
प्रश्न 12. अल्पकालीन लागत वक्रों (Short-run Cost Curves) का आकार ‘U’ जैसा क्यों होता है? दीर्घकालीन औसत लागत वक्र (LAC) की व्युत्पत्ति कैसे होती है? इसे ‘लिफाफा वक्र’ और ‘आयोजन वक्र’ क्यों कहा जाता है?
परिचय
किसी फर्म के लिए उत्पादन के साथ लागत का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण होता है। उत्पादन बढ़ाने पर फर्म की कुल लागत, औसत लागत और सीमांत लागत में परिवर्तन होता है। अल्पकाल में कुछ उत्पादन साधन स्थिर रहते हैं, इसलिए उत्पादन बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से परिवर्तनशील साधनों की मात्रा बढ़ानी पड़ती है। इसके कारण अल्पकालीन औसत लागत वक्र सामान्यतः ‘U’ आकार का होता है। दूसरी ओर, दीर्घकाल में फर्म अपने सभी साधनों और संयंत्र के आकार को बदल सकती है। इसलिए दीर्घकालीन औसत लागत वक्र अलग-अलग अल्पकालीन औसत लागत वक्रों से प्राप्त होता है और इसे लिफाफा वक्र तथा आयोजन वक्र कहा जाता है।
अल्पकालीन लागत वक्र का अर्थ
अल्पकाल वह समय होता है जिसमें उत्पादन के कुछ साधन स्थिर रहते हैं और कुछ साधनों को बदला जा सकता है। जैसे किसी कारखाने की इमारत और बड़ी मशीनें अल्पकाल में स्थिर रह सकती हैं, जबकि श्रमिकों और कच्चे माल की मात्रा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है।
अल्पकालीन औसत लागत से आशय प्रति इकाई उत्पादन पर होने वाली औसत लागत से है।
औसत लागत = कुल लागत ÷ कुल उत्पादन
अल्पकालीन औसत लागत वक्र को सामान्य रूप से SAC कहा जाता है।
अल्पकालीन औसत लागत वक्र ‘U’ आकार का क्यों होता है
अल्पकालीन औसत लागत वक्र के ‘U’ आकार का मुख्य कारण बढ़ते और घटते प्रतिफल का नियम तथा स्थिर लागत और परिवर्तनशील लागत का व्यवहार है।
शुरुआत में जब उत्पादन बढ़ता है, तो स्थिर लागत अधिक मात्रा में उत्पादन पर फैल जाती है। इसके कारण प्रति इकाई स्थिर लागत कम होती जाती है। साथ ही परिवर्तनशील साधनों का उपयोग भी अधिक कुशलता से होने लगता है। परिणामस्वरूप औसत लागत घटती है।
लेकिन एक सीमा के बाद स्थिर साधनों पर दबाव बढ़ने लगता है। परिवर्तनशील साधनों की अधिक मात्रा लगाने पर उत्पादन बढ़ने की गति कम हो जाती है। इसके कारण प्रति इकाई लागत बढ़ने लगती है।
इस प्रकार औसत लागत पहले घटती है, फिर न्यूनतम स्तर पर पहुँचती है और उसके बाद बढ़ने लगती है। इसी कारण अल्पकालीन औसत लागत वक्र ‘U’ आकार का होता है।
पहला चरण — औसत लागत में कमी
उत्पादन बढ़ने पर शुरुआत में औसत लागत तेजी से घटती है। इसका कारण यह है कि स्थिर लागत अधिक इकाइयों में बाँट जाती है और उत्पादन साधनों का बेहतर उपयोग होता है।
दूसरा चरण — न्यूनतम औसत लागत
एक निश्चित उत्पादन स्तर पर औसत लागत न्यूनतम हो जाती है। यह SAC वक्र का सबसे निचला बिंदु होता है।
तीसरा चरण — औसत लागत में वृद्धि
इसके बाद उत्पादन बढ़ाने पर स्थिर साधनों पर अधिक दबाव पड़ता है। परिवर्तनशील साधनों की उत्पादकता कम होने लगती है और औसत लागत बढ़ने लगती है।
इस प्रकार SAC वक्र का आकार ‘U’ जैसा दिखाई देता है।
दीर्घकालीन औसत लागत वक्र का अर्थ
दीर्घकाल में उत्पादन के सभी साधनों को बदला जा सकता है। फर्म अपनी आवश्यकता के अनुसार छोटे, मध्यम या बड़े आकार का संयंत्र चुन सकती है।
दीर्घकालीन औसत लागत वक्र को LAC कहा जाता है। यह विभिन्न उत्पादन स्तरों पर फर्म की न्यूनतम औसत लागत को दर्शाता है।
LAC की व्युत्पत्ति
LAC की व्युत्पत्ति अलग-अलग अल्पकालीन औसत लागत वक्रों से की जाती है। मान लीजिए किसी फर्म के पास अलग-अलग आकार के कई संयंत्र हैं। प्रत्येक संयंत्र के लिए एक अलग SAC वक्र होगा।
मान लीजिए छोटे संयंत्र के लिए SAC₁, मध्यम संयंत्र के लिए SAC₂ और बड़े संयंत्र के लिए SAC₃ है। प्रत्येक उत्पादन स्तर पर फर्म उस संयंत्र का चुनाव करेगी जिसकी औसत लागत सबसे कम होगी।
जब अलग-अलग SAC वक्रों से न्यूनतम लागत वाले बिंदुओं को चुना और जोड़ा जाता है, तो एक नया वक्र प्राप्त होता है। यही दीर्घकालीन औसत लागत वक्र यानी LAC है।
सरल शब्दों में—
विभिन्न SAC वक्रों के न्यूनतम लागत वाले उपयुक्त भागों को मिलाने से LAC वक्र प्राप्त होता है।
LAC प्रत्येक उत्पादन स्तर पर फर्म के लिए सबसे कम संभव औसत लागत बताता है।
LAC को लिफाफा वक्र क्यों कहा जाता है
LAC को लिफाफा वक्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह कई अल्पकालीन औसत लागत वक्रों के उपयुक्त भागों को अपने अंदर समेटता है और उन्हें स्पर्श करता है।
अलग-अलग संयंत्र आकारों के लिए अलग-अलग SAC वक्र होते हैं। फर्म प्रत्येक उत्पादन स्तर पर सबसे कम लागत वाले संयंत्र का चुनाव करती है। इन न्यूनतम लागत वाले विकल्पों को मिलाने से LAC प्राप्त होता है।
इस प्रकार LAC कई SAC वक्रों के लिए एक लिफाफे की तरह काम करता है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि LAC प्रत्येक SAC वक्र के पूरे भाग को नहीं दर्शाता। यह केवल उन भागों से संबंधित होता है जहाँ किसी विशेष उत्पादन स्तर पर संबंधित संयंत्र से सबसे कम औसत लागत प्राप्त होती है।
LAC को आयोजन वक्र क्यों कहा जाता है
LAC को आयोजन वक्र या योजना वक्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह फर्म को दीर्घकाल में उत्पादन की योजना बनाने में सहायता करता है।
दीर्घकाल में फर्म के पास संयंत्र का आकार बदलने का अवसर होता है। इसलिए वह पहले से यह तय कर सकती है कि अलग-अलग उत्पादन स्तरों के लिए किस आकार के संयंत्र का उपयोग करना अधिक उचित होगा।
उदाहरण के लिए, यदि फर्म को कम मात्रा में उत्पादन करना है, तो वह छोटा संयंत्र चुन सकती है। यदि उत्पादन की मात्रा बढ़ानी है, तो वह मध्यम या बड़े संयंत्र का चुनाव कर सकती है।
इस प्रकार LAC फर्म को यह बताता है कि किस उत्पादन स्तर पर कौन-सा संयंत्र सबसे कम लागत वाला रहेगा। इसलिए इसे आयोजन वक्र कहा जाता है।
LAC का महत्व
LAC फर्म के दीर्घकालीन निर्णयों के लिए बहुत उपयोगी है। इसके द्वारा फर्म—
- उचित संयंत्र का आकार चुन सकती है।
- विभिन्न उत्पादन स्तरों की लागत जान सकती है।
- न्यूनतम औसत लागत प्राप्त करने की योजना बना सकती है।
- उत्पादन का उचित स्तर तय कर सकती है।
- पैमाने की बचत और पैमाने की हानियों को समझ सकती है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि अल्पकालीन औसत लागत वक्र ‘U’ आकार का होता है क्योंकि शुरुआत में उत्पादन बढ़ने पर स्थिर लागत प्रति इकाई कम होती है और साधनों का बेहतर उपयोग होता है, जबकि बाद में स्थिर साधनों पर दबाव बढ़ने के कारण लागत बढ़ने लगती है। दीर्घकाल में फर्म अपने सभी साधनों और संयंत्र के आकार को बदल सकती है। इसलिए विभिन्न SAC वक्रों से न्यूनतम औसत लागत वाले बिंदुओं को मिलाकर LAC वक्र प्राप्त किया जाता है। यह कई SAC वक्रों को समेटता है, इसलिए इसे लिफाफा वक्र और फर्म को दीर्घकालीन उत्पादन योजना बनाने में सहायता करने के कारण आयोजन वक्र कहा जाता है।
प्रश्न 13. औसत आगम (AR) और सीमांत आगम (MR) की अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिए। पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार बाजारों के अंतर्गत आगम वक्रों के व्यवहार की तुलना कीजिए।
परिचय
किसी फर्म के लिए उत्पादन के साथ-साथ अपनी बिक्री से प्राप्त होने वाली आय को जानना भी बहुत जरूरी है। किसी वस्तु की बिक्री से फर्म को जो कुल धन प्राप्त होता है, उसे आगम कहा जाता है। आगम के अध्ययन से फर्म को यह समझने में सहायता मिलती है कि वस्तु की कीमत और बिक्री की मात्रा में परिवर्तन होने पर उसकी आय किस प्रकार बदलती है। आगम के मुख्य रूप से तीन रूप हैं—कुल आगम, औसत आगम और सीमांत आगम। इनमें औसत आगम और सीमांत आगम का बाजार की स्थिति के अनुसार अलग-अलग व्यवहार होता है।
औसत आगम का अर्थ
औसत आगम से आशय प्रति इकाई वस्तु की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय से है। इसे AR से दर्शाया जाता है।
औसत आगम निकालने का सूत्र है—
औसत आगम = कुल आगम ÷ बेची गई वस्तुओं की मात्रा
यदि किसी फर्म को 100 वस्तुएँ बेचने पर कुल 5,000 रुपये प्राप्त होते हैं, तो उसका औसत आगम 50 रुपये प्रति वस्तु होगा।
क्योंकि कुल आगम सामान्य रूप से—
कुल आगम = कीमत × बिक्री की मात्रा
इसलिए,
AR = TR ÷ Q = P
अर्थात सामान्य स्थिति में औसत आगम वस्तु की कीमत के बराबर होता है।
सीमांत आगम का अर्थ
किसी फर्म द्वारा एक अतिरिक्त इकाई वस्तु बेचने से कुल आगम में जो अतिरिक्त वृद्धि होती है, उसे सीमांत आगम कहते हैं। इसे MR से दर्शाया जाता है।
सीमांत आगम का सूत्र है—
MR = कुल आगम में परिवर्तन ÷ बिक्री की मात्रा में परिवर्तन
अर्थात,
MR = ΔTR ÷ ΔQ
उदाहरण के लिए, यदि 10 वस्तुएँ बेचने पर कुल आगम 1,000 रुपये है और 11 वस्तुएँ बेचने पर कुल आगम 1,080 रुपये हो जाता है, तो 11वीं वस्तु से प्राप्त सीमांत आगम 80 रुपये होगा।
पूर्ण प्रतियोगिता में AR और MR
पूर्ण प्रतियोगिता वह बाजार स्थिति है जिसमें बहुत अधिक संख्या में खरीदार और विक्रेता होते हैं तथा सभी फर्मों को बाजार में निर्धारित कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। कोई एक फर्म अकेले बाजार की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती।
पूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु की कीमत बाजार की माँग और पूर्ति से निर्धारित होती है। फर्म उस निर्धारित कीमत पर जितनी मात्रा बेचना चाहती है, बेच सकती है।
इस स्थिति में—
AR = MR = कीमत
इसलिए पूर्ण प्रतियोगिता में AR और MR दोनों एक ही सीधी क्षैतिज रेखा के रूप में दिखाई देते हैं।
पूर्ण प्रतियोगिता में आगम वक्र की विशेषताएँ
- AR वक्र एक क्षैतिज सीधी रेखा होता है।
- MR वक्र भी उसी क्षैतिज रेखा पर होता है।
- AR और MR दोनों कीमत के बराबर होते हैं।
- कीमत में परिवर्तन न होने के कारण अतिरिक्त इकाई बेचने पर भी सीमांत आगम समान रहता है।
- फर्म को कीमत स्वीकार करने वाली फर्म कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि बाजार में किसी वस्तु की कीमत 20 रुपये तय है, तो फर्म एक वस्तु बेचे या 100 वस्तुएँ, प्रत्येक इकाई पर औसत आगम और सीमांत आगम 20 रुपये रहेगा।
एकाधिकार में AR और MR
एकाधिकार बाजार में किसी वस्तु का केवल एक प्रमुख विक्रेता होता है और उस वस्तु का निकट विकल्प आसानी से उपलब्ध नहीं होता। इसलिए एकाधिकारी फर्म का वस्तु की कीमत पर काफी नियंत्रण होता है।
एकाधिकारी फर्म अधिक मात्रा बेचने के लिए कीमत कम कर सकती है। इसलिए अधिक मात्रा बेचने पर कीमत घटती है। चूँकि AR वस्तु की कीमत के बराबर होता है, इसलिए AR वक्र नीचे की ओर झुका हुआ होता है।
MR वक्र भी नीचे की ओर झुका होता है, लेकिन यह AR वक्र के नीचे स्थित रहता है।
एकाधिकार में आगम वक्र की विशेषताएँ
- AR वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुका होता है।
- MR वक्र भी नीचे की ओर झुका होता है।
- MR वक्र AR वक्र के नीचे रहता है।
- अधिक मात्रा बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है।
- AR और MR बराबर नहीं होते।
- एकाधिकारी फर्म कीमत को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार में आगम वक्रों का अंतर
AR वक्र का व्यवहार
पूर्ण प्रतियोगिता में AR वक्र क्षैतिज सीधी रेखा होता है क्योंकि कीमत स्थिर रहती है। एकाधिकार में AR वक्र नीचे की ओर झुका होता है क्योंकि अधिक मात्रा बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है।
MR वक्र का व्यवहार
पूर्ण प्रतियोगिता में MR वक्र AR के बराबर होता है। एकाधिकार में MR वक्र AR से नीचे होता है।
कीमत और उत्पादन का संबंध
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म बाजार द्वारा निर्धारित कीमत को स्वीकार करती है। एकाधिकार में फर्म कीमत और उत्पादन की मात्रा के बीच चुनाव कर सकती है।
AR और MR का संबंध
पूर्ण प्रतियोगिता में—
AR = MR = P
एकाधिकार में—
AR > MR
अर्थात एकाधिकार बाजार में अतिरिक्त इकाई बेचने से प्राप्त सीमांत आगम वस्तु की कीमत से कम होता है।
आगम वक्रों की दिशा
- पूर्ण प्रतियोगिता → AR और MR क्षैतिज।
- एकाधिकार → AR और MR नीचे की ओर झुके हुए।
- पूर्ण प्रतियोगिता → AR = MR।
- एकाधिकार → AR > MR।
एक सरल उदाहरण
मान लीजिए पूर्ण प्रतियोगिता में किसी वस्तु की बाजार कीमत 50 रुपये है। फर्म जितनी भी मात्रा बेचे, कीमत 50 रुपये ही रहती है। इसलिए AR और MR दोनों 50 रुपये रहेंगे।
इसके विपरीत, एकाधिकारी फर्म यदि 100 इकाइयाँ 50 रुपये प्रति इकाई पर बेचती है और 101वीं इकाई बेचने के लिए कीमत 49 रुपये करनी पड़ती है, तो अतिरिक्त इकाई से प्राप्त MR 49 रुपये से भी कम हो सकता है, क्योंकि कीमत घटने का प्रभाव पहले बेची गई इकाइयों पर भी पड़ सकता है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि औसत आगम प्रति इकाई बिक्री से प्राप्त आय है, जबकि सीमांत आगम एक अतिरिक्त इकाई बेचने से कुल आगम में होने वाली वृद्धि है। पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती, इसलिए वहाँ AR और MR बराबर होते हैं तथा दोनों क्षैतिज रेखा के रूप में दिखाई देते हैं। इसके विपरीत, एकाधिकार में अधिक मात्रा बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है, इसलिए AR नीचे की ओर झुका होता है और MR, AR से नीचे रहता है। इस प्रकार दोनों बाजारों में आगम वक्रों का व्यवहार उनकी बाजार संरचना के कारण अलग-अलग होता है।
प्रश्न 14. पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। इस बाजार में एक फर्म और उद्योग का अल्पकाल तथा दीर्घकाल में संतुलन (Price and Output Determination) कैसे प्राप्त होता है?
परिचय
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार अर्थशास्त्र में बाजार की एक आदर्श स्थिति को समझाने वाली महत्वपूर्ण अवधारणा है। इसमें बहुत अधिक संख्या में खरीदार और विक्रेता होते हैं तथा किसी एक फर्म का बाजार की कीमत पर नियंत्रण नहीं होता। बाजार में वस्तु की कीमत माँग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है और प्रत्येक फर्म उस कीमत को स्वीकार करके उत्पादन करती है। इस कारण पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म को कीमत स्वीकार करने वाली फर्म कहा जाता है। फर्म का मुख्य उद्देश्य दी गई बाजार कीमत पर ऐसा उत्पादन स्तर तय करना होता है, जहाँ उसे अधिकतम लाभ या न्यूनतम हानि प्राप्त हो।
पूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ
पूर्ण प्रतियोगिता वह बाजार स्थिति है जिसमें बहुत अधिक संख्या में खरीदार और विक्रेता होते हैं, वस्तु एक जैसी होती है तथा फर्मों का बाजार में स्वतंत्र रूप से प्रवेश और बाहर निकलना संभव होता है। किसी एक फर्म की कुल उत्पादन मात्रा बाजार की कुल मात्रा की तुलना में बहुत कम होती है। इसलिए कोई भी अकेली फर्म बाजार की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती।
पूर्ण प्रतियोगिता में बाजार की कीमत पूरे उद्योग की माँग और पूर्ति से निर्धारित होती है। इसके बाद प्रत्येक फर्म उस कीमत पर अपनी उत्पादन मात्रा तय करती है।
पूर्ण प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताएँ
खरीदारों और विक्रेताओं की बड़ी संख्या
इस बाजार में खरीदारों और विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है। किसी एक खरीदार या विक्रेता की मात्रा इतनी कम होती है कि वह बाजार की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता।
वस्तु की एकरूपता
सभी फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तु एक जैसी होती है। उपभोक्ता के लिए एक फर्म की वस्तु और दूसरी फर्म की वस्तु में कोई विशेष अंतर नहीं होता। इसलिए कोई फर्म अधिक कीमत पर अपनी वस्तु बेचने में सफल नहीं होगी।
कीमत पर फर्म का नियंत्रण नहीं
पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत उद्योग की माँग और पूर्ति से तय होती है। फर्म उस कीमत को स्वीकार करती है। इसलिए इसे कीमत स्वीकार करने वाली फर्म कहा जाता है।
फर्मों का स्वतंत्र प्रवेश और बाहर निकलना
दीर्घकाल में नई फर्में उद्योग में प्रवेश कर सकती हैं और पुरानी फर्में उद्योग छोड़ सकती हैं। इस कारण यदि उद्योग में असामान्य लाभ होता है, तो नई फर्में प्रवेश करती हैं और लाभ कम होने लगता है।
बाजार की पूर्ण जानकारी
खरीदारों और विक्रेताओं को बाजार में वस्तु की कीमत और उपलब्धता की पूरी जानकारी मानी जाती है। इसलिए किसी एक फर्म के लिए अधिक कीमत वसूलना संभव नहीं होता।
उत्पादन साधनों की गतिशीलता
श्रम और पूँजी जैसे उत्पादन साधन एक स्थान या उद्योग से दूसरे स्थान पर जाने के लिए स्वतंत्र माने जाते हैं। इससे साधनों का उचित उपयोग संभव होता है।
पूर्ण प्रतियोगिता में उद्योग का संतुलन
उद्योग का संतुलन उस स्थिति में प्राप्त होता है जहाँ बाजार में वस्तु की माँग और पूर्ति बराबर हो जाती है। इस बिंदु पर बाजार की कीमत निर्धारित होती है।
यदि माँग पूर्ति से अधिक है, तो वस्तु की कीमत बढ़ने लगती है। इसके विपरीत, यदि पूर्ति माँग से अधिक है, तो कीमत घटने लगती है। जब माँग और पूर्ति बराबर हो जाती हैं, तब संतुलन कीमत निर्धारित होती है।
इस प्रकार—
संतुलन कीमत = माँग = पूर्ति
उद्योग की संतुलन कीमत मिलने के बाद प्रत्येक फर्म उसी कीमत को स्वीकार करके अपना उत्पादन निर्धारित करती है।
अल्पकाल में फर्म का संतुलन
अल्पकाल में कुछ उत्पादन साधन स्थिर होते हैं। इसलिए फर्म उत्पादन को पूरी तरह स्वतंत्र रूप से नहीं बदल सकती। फर्म का संतुलन उस उत्पादन स्तर पर होता है जहाँ उसे अधिकतम लाभ या न्यूनतम हानि प्राप्त होती है।
पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के लिए कीमत स्थिर होती है। इसलिए—
AR = MR = Price
फर्म का संतुलन सामान्यतः उस बिंदु पर प्राप्त होता है जहाँ—
MR = MC
और MC वक्र बढ़ती हुई दिशा में MR को काटता है।
यदि बाजार कीमत औसत लागत से अधिक है, तो फर्म को असामान्य लाभ मिल सकता है। यदि कीमत औसत लागत के बराबर है, तो फर्म को सामान्य लाभ मिलता है। यदि कीमत औसत लागत से कम लेकिन औसत परिवर्ती लागत से अधिक है, तो फर्म अल्पकाल में हानि के बावजूद उत्पादन जारी रख सकती है।
अल्पकाल में उद्योग का संतुलन
अल्पकाल में उद्योग की सभी फर्मों की पूर्ति को जोड़कर उद्योग की कुल पूर्ति प्राप्त होती है। बाजार की माँग और उद्योग की पूर्ति जहाँ बराबर होती हैं, वहीं संतुलन कीमत निर्धारित होती है।
इसके बाद प्रत्येक फर्म निर्धारित कीमत को स्वीकार करती है और अपनी लागत के आधार पर उत्पादन करती है। इसलिए अल्पकाल में उद्योग का संतुलन मुख्य रूप से माँग और पूर्ति द्वारा तथा फर्म का संतुलन कीमत और लागत के संबंध द्वारा निर्धारित होता है।
दीर्घकाल में फर्म का संतुलन
दीर्घकाल में सभी उत्पादन साधनों को बदला जा सकता है। फर्म अपने संयंत्र का आकार बदल सकती है और नई फर्में उद्योग में प्रवेश कर सकती हैं या पुरानी फर्में उद्योग छोड़ सकती हैं।
पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकालीन संतुलन की मुख्य शर्त है—
P = AR = MR = LMC = LAC
दीर्घकाल में सामान्यतः असामान्य लाभ समाप्त हो जाता है। यदि फर्मों को अधिक लाभ मिलता है, तो नई फर्में उद्योग में प्रवेश करती हैं। इससे बाजार में पूर्ति बढ़ती है और कीमत कम होने लगती है। दूसरी ओर, यदि फर्मों को लगातार हानि हो रही है, तो कुछ फर्में उद्योग छोड़ देती हैं। इससे पूर्ति कम होती है और कीमत बढ़ने लगती है।
अंततः ऐसी स्थिति आती है जहाँ फर्मों को केवल सामान्य लाभ मिलता है और उद्योग संतुलन में पहुँच जाता है।
दीर्घकाल में उद्योग का संतुलन
दीर्घकाल में उद्योग का संतुलन उस स्थिति में प्राप्त होता है जहाँ उद्योग की माँग और दीर्घकालीन पूर्ति एक-दूसरे के बराबर होती हैं। इस स्थिति में बाजार कीमत ऐसी होती है जिस पर फर्में सामान्य लाभ अर्जित करती हैं और उद्योग में प्रवेश तथा बाहर निकलने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है।
इस प्रकार दीर्घकालीन संतुलन में—
- नई फर्मों के प्रवेश की प्रेरणा नहीं रहती।
- पुरानी फर्मों के उद्योग छोड़ने की आवश्यकता नहीं रहती।
- फर्मों को सामान्य लाभ प्राप्त होता है।
- कीमत और उत्पादन स्थिर स्थिति में आ जाते हैं।
अल्पकाल और दीर्घकाल के संतुलन में अंतर
अल्पकाल में फर्म को असामान्य लाभ या हानि दोनों हो सकते हैं, क्योंकि कुछ साधन स्थिर होते हैं। इसके विपरीत, दीर्घकाल में फर्मों के प्रवेश और बाहर निकलने के कारण असामान्य लाभ और हानि समाप्त होकर सामान्य लाभ की स्थिति बन जाती है।
अल्पकाल में उद्योग की फर्मों की संख्या स्थिर मानी जाती है, जबकि दीर्घकाल में फर्मों की संख्या बदल सकती है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में बहुत अधिक खरीदार और विक्रेता, एकरूप वस्तु, पूर्ण जानकारी और स्वतंत्र प्रवेश तथा बाहर निकलने जैसी प्रमुख विशेषताएँ होती हैं। उद्योग में कीमत माँग और पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है, जबकि फर्म उस कीमत को स्वीकार करके अपना उत्पादन तय करती है। अल्पकाल में फर्म को असामान्य लाभ, सामान्य लाभ या हानि हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में नई फर्मों के प्रवेश और पुरानी फर्मों के बाहर निकलने के कारण असामान्य लाभ और हानि समाप्त हो जाती है। अंततः फर्म सामान्य लाभ की स्थिति में संतुलन प्राप्त करती है।
प्रश्न 15. एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? एडवर्ड चेम्बरलिन के दृष्टिकोण के अनुसार इसमें एक फर्म के ‘समूह संतुलन’ की व्याख्या कीजिए।
परिचय
एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता बाजार की वह स्थिति है जिसमें बहुत-सी फर्में एक-दूसरे से प्रतियोगिता करती हैं, लेकिन उनकी वस्तुएँ पूरी तरह एक जैसी नहीं होतीं। प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु को दूसरी फर्मों की वस्तुओं से थोड़ा अलग दिखाने का प्रयास करती है। इसलिए इस बाजार में प्रतियोगिता और एकाधिकार दोनों के तत्व दिखाई देते हैं। इस बाजार की व्याख्या करने में अर्थशास्त्री एडवर्ड चेम्बरलिन का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने फर्मों के बीच वस्तु की भिन्नता, बिक्री लागत और समूह संतुलन की अवधारणा को विशेष महत्व दिया।
एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता का अर्थ
एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता वह बाजार स्थिति है जिसमें बहुत-सी फर्में समान प्रकार की वस्तुएँ बेचती हैं, लेकिन उनकी वस्तुओं में कुछ अंतर होता है। वस्तुएँ एक-दूसरे की स्थानापन्न होती हैं, लेकिन पूरी तरह समान नहीं होतीं।
उदाहरण के लिए, साबुन, टूथपेस्ट, कपड़े और रेस्तराँ जैसी सेवाओं के बाजार में कई फर्में होती हैं, लेकिन प्रत्येक फर्म अपने उत्पाद में कुछ अलग विशेषता, पैकिंग, गुणवत्ता या ब्रांड पहचान रखने का प्रयास करती है।
एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता की मुख्य विशेषताएँ
फर्मों की बड़ी संख्या
इस बाजार में बहुत-सी फर्में होती हैं। प्रत्येक फर्म बाजार की कुल बिक्री की तुलना में थोड़ी मात्रा में उत्पादन करती है। इसलिए कोई एक फर्म पूरे बाजार पर नियंत्रण नहीं रखती।
वस्तु में भिन्नता
इस बाजार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता वस्तु में भिन्नता है। अलग-अलग फर्मों की वस्तुएँ एक ही प्रकार की आवश्यकता पूरी करती हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता, डिजाइन, पैकिंग, आकार, स्वाद या ब्रांड में अंतर हो सकता है।
एकाधिकार और प्रतियोगिता दोनों
प्रत्येक फर्म को अपनी अलग वस्तु पर कुछ हद तक एकाधिकार प्राप्त होता है, क्योंकि वह अपनी कीमत में कुछ बदलाव कर सकती है। लेकिन दूसरी ओर, बाजार में कई प्रतिस्पर्धी वस्तुएँ उपलब्ध होने के कारण उसे प्रतियोगिता का सामना भी करना पड़ता है।
प्रवेश और बाहर निकलने की स्वतंत्रता
दीर्घकाल में नई फर्में बाजार में प्रवेश कर सकती हैं और पुरानी फर्में बाजार से बाहर निकल सकती हैं। इसलिए लंबे समय में असामान्य लाभ समाप्त होने की प्रवृत्ति रहती है।
बिक्री लागत
इस बाजार में फर्में अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन, प्रचार, पैकिंग और अन्य तरीकों पर खर्च करती हैं। इन खर्चों को बिक्री लागत कहा जाता है।
फर्म की माँग वक्र नीचे की ओर झुकी होती है
क्योंकि प्रत्येक फर्म का उत्पाद दूसरे उत्पादों से कुछ अलग होता है, इसलिए वह अपनी कीमत को कुछ सीमा तक बदल सकती है। इसी कारण उसकी माँग वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुकी होती है।
चेम्बरलिन की समूह अवधारणा
एडवर्ड चेम्बरलिन ने एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता के अध्ययन में समूह की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार एक ही प्रकार की आवश्यकता पूरी करने वाली, लेकिन कुछ भिन्न विशेषताओं वाली वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फर्मों को एक समूह में रखा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, अलग-अलग कंपनियों के साबुन एक ही प्रकार की आवश्यकता पूरी करते हैं, लेकिन उनमें गुणवत्ता, खुशबू, पैकिंग और कीमत का अंतर हो सकता है। इसलिए इन फर्मों को साबुन के एक समूह में रखा जा सकता है।
चेम्बरलिन के अनुसार यहाँ प्रत्येक फर्म को अपने उत्पाद के संबंध में कुछ एकाधिकार प्राप्त होता है, लेकिन उसी समूह की दूसरी फर्में उसकी प्रतियोगी होती हैं।
समूह संतुलन का अर्थ
चेम्बरलिन के अनुसार किसी समूह का संतुलन उस स्थिति में होता है जब समूह की सभी फर्में अपनी-अपनी कीमत और उत्पादन का ऐसा स्तर निर्धारित करती हैं जहाँ उन्हें अधिकतम लाभ प्राप्त होता है और नई फर्मों के प्रवेश या पुरानी फर्मों के बाहर निकलने की कोई विशेष प्रेरणा नहीं रहती।
समूह संतुलन में यह मान लिया जाता है कि समूह की फर्मों की लागत और माँग की परिस्थितियाँ लगभग समान हैं। इसलिए एक सामान्य फर्म के संतुलन का अध्ययन करके पूरे समूह की स्थिति को समझा जा सकता है।
समूह संतुलन की प्रक्रिया
पहली स्थिति — असामान्य लाभ
यदि किसी फर्म को असामान्य लाभ प्राप्त हो रहा है, तो नई फर्मों के बाजार में प्रवेश करने की संभावना बढ़ जाती है। नई फर्मों के प्रवेश से उपभोक्ताओं के पास अधिक विकल्प उपलब्ध होते हैं और मौजूदा फर्म की बिक्री कम हो सकती है।
इससे उसकी माँग वक्र बाईं ओर खिसक सकती है और उसका लाभ कम होने लगता है।
दूसरी स्थिति — सामान्य लाभ की ओर
जैसे-जैसे नई फर्में बाजार में प्रवेश करती हैं, प्रतियोगिता बढ़ती जाती है। इससे प्रत्येक फर्म के लिए उपलब्ध बाजार का हिस्सा कम हो सकता है। अंततः ऐसी स्थिति आ सकती है जहाँ फर्म को केवल सामान्य लाभ प्राप्त हो।
इस स्थिति में नई फर्मों के प्रवेश की प्रेरणा समाप्त हो जाती है।
तीसरी स्थिति — समूह संतुलन
जब समूह की सभी फर्मों को सामान्य लाभ प्राप्त हो और नई फर्मों के प्रवेश की कोई प्रेरणा न हो, तब समूह संतुलन की स्थिति बनती है।
फर्म का संतुलन उस बिंदु पर होता है जहाँ—
MR = MC
और इस बिंदु पर फर्म अपनी वस्तु की कीमत माँग वक्र के आधार पर निर्धारित करती है।
समूह संतुलन की मुख्य बातें
- समूह में कई प्रतिस्पर्धी फर्में होती हैं।
- प्रत्येक फर्म का अपना अलग उत्पाद होता है।
- प्रत्येक फर्म को अपने उत्पाद पर सीमित एकाधिकार प्राप्त होता है।
- फर्म की माँग वक्र नीचे की ओर झुकी होती है।
- फर्म लाभ को अधिकतम करने के लिए MR = MC की स्थिति पर उत्पादन करती है।
- दीर्घकाल में नई फर्मों के प्रवेश के कारण असामान्य लाभ समाप्त हो जाता है।
- दीर्घकाल में सामान्य लाभ की स्थिति प्राप्त होती है।
चेम्बरलिन के विचार का महत्व
चेम्बरलिन का सिद्धांत वास्तविक बाजारों को समझने में उपयोगी है। वास्तविक जीवन में अधिकांश वस्तुएँ पूरी तरह समान नहीं होतीं। कंपनियाँ गुणवत्ता, ब्रांड, पैकिंग, विज्ञापन और डिजाइन के माध्यम से अपने उत्पादों को अलग दिखाती हैं। इसलिए एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता का सिद्धांत वास्तविक बाजारों की स्थिति को समझने में सहायता करता है।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता में एकाधिकार और प्रतियोगिता दोनों के तत्व पाए जाते हैं। इसमें बहुत-सी फर्में होती हैं और उनकी वस्तुओं में कुछ भिन्नता होती है। चेम्बरलिन ने ऐसी फर्मों को समूह के रूप में समझाया और बताया कि समूह में फर्में एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते हुए भी अपने उत्पाद पर कुछ नियंत्रण रखती हैं। दीर्घकाल में नई फर्मों के प्रवेश के कारण असामान्य लाभ समाप्त होकर सामान्य लाभ की स्थिति बनती है। यही स्थिति समूह संतुलन कहलाती है।
प्रश्न 16. रिकार्डो के लगान सिद्धांत और आधुनिक लगान सिद्धांत की तुलनात्मक व्याख्या कीजिए।
परिचय
अर्थशास्त्र में लगान उत्पादन के साधनों से मिलने वाली आय का एक महत्वपूर्ण रूप है। भूमि उत्पादन का एक प्रमुख साधन है और भूमि के मालिक को भूमि के उपयोग के बदले जो आय प्राप्त होती है, उसे सामान्य रूप से लगान कहा जाता है। लगान के संबंध में सबसे प्रसिद्ध विचार डेविड रिकार्डो ने दिया था। बाद में आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने लगान की अवधारणा को केवल भूमि तक सीमित न रखकर सभी उत्पादन साधनों पर लागू किया। इसी कारण रिकार्डो के लगान सिद्धांत और आधुनिक लगान सिद्धांत में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
रिकार्डो के लगान सिद्धांत का अर्थ
डेविड रिकार्डो के अनुसार लगान भूमि की प्राकृतिक और मूल शक्तियों के उपयोग के बदले भूमि के मालिक को मिलने वाला भुगतान है। उनके अनुसार भूमि की उर्वरता और स्थिति सभी स्थानों पर समान नहीं होती। कुछ भूमि अधिक उपजाऊ होती है, जबकि कुछ भूमि कम उपजाऊ होती है।
जब जनसंख्या और खाद्य पदार्थों की माँग बढ़ती है, तो कम उपजाऊ भूमि पर भी खेती करनी पड़ती है। इस कारण अधिक उपजाऊ भूमि को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है। इसी अतिरिक्त लाभ को रिकार्डो ने लगान माना।
रिकार्डो के सिद्धांत की मुख्य बातें
भूमि की उर्वरता में अंतर
रिकार्डो ने माना कि अलग-अलग भूमि की उर्वरता समान नहीं होती। कुछ भूमि अधिक उपजाऊ और कुछ कम उपजाऊ होती है। अधिक उपजाऊ भूमि कम उपजाऊ भूमि की तुलना में अधिक उत्पादन देती है।
भूमि की सीमितता
भूमि की मात्रा सीमित है। जनसंख्या और खाद्य पदार्थों की माँग बढ़ने पर अधिक भूमि को खेती के लिए उपयोग में लाना पड़ता है। इससे कम उपजाऊ भूमि भी खेती में शामिल हो जाती है।
लगान कीमत का कारण नहीं है
रिकार्डो के अनुसार लगान वस्तु की कीमत निर्धारित नहीं करता, बल्कि वस्तु की कीमत के कारण लगान उत्पन्न होता है। जब बाजार कीमत बढ़ती है, तो कम उपजाऊ भूमि पर भी उत्पादन करना लाभदायक हो जाता है और अच्छी भूमि को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
सीमांत भूमि
जिस भूमि पर खेती करने से केवल सामान्य लागत की पूर्ति होती है और कोई अतिरिक्त लगान प्राप्त नहीं होता, उसे सीमांत भूमि कहा जाता है। इसके ऊपर की अधिक उपजाऊ भूमि से प्राप्त अतिरिक्त उत्पादन लगान का आधार बनता है।
अंतर का सिद्धांत
रिकार्डो का लगान सिद्धांत मुख्य रूप से भूमि की अलग-अलग उर्वरता और स्थिति से मिलने वाले अतिरिक्त उत्पादन के अंतर पर आधारित है। इसलिए इसे अंतर लगान सिद्धांत भी कहा जाता है।
आधुनिक लगान सिद्धांत
आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने लगान की अवधारणा को अधिक व्यापक रूप दिया। आधुनिक सिद्धांत के अनुसार लगान केवल भूमि से मिलने वाली आय नहीं है। उत्पादन के किसी भी साधन को उसकी वर्तमान उपयोगिता में बनाए रखने के लिए जितना न्यूनतम भुगतान आवश्यक है, उससे अधिक प्राप्त होने वाली आय को आर्थिक लगान कहा जा सकता है।
इस विचार को अवसर लागत की अवधारणा से समझाया जाता है।
यदि किसी उत्पादन साधन को उसके वर्तमान काम में रखने के लिए 10,000 रुपये देना जरूरी है, लेकिन उसे 15,000 रुपये मिल रहे हैं, तो 5,000 रुपये की अतिरिक्त राशि आर्थिक लगान मानी जा सकती है।
आधुनिक लगान सिद्धांत की मुख्य बातें
सभी उत्पादन साधनों पर लागू
आधुनिक सिद्धांत केवल भूमि तक सीमित नहीं है। श्रम, पूँजी और उद्यमिता जैसे उत्पादन साधनों को भी आर्थिक लगान प्राप्त हो सकता है।
अवसर लागत का महत्व
आधुनिक सिद्धांत में लगान को अवसर लागत के आधार पर समझाया जाता है। किसी साधन को उसके वर्तमान उपयोग में बनाए रखने के लिए जितना न्यूनतम भुगतान आवश्यक है, उसे अलग रखने के बाद मिलने वाली अतिरिक्त आय आर्थिक लगान है।
पूर्ति की लोच का महत्व
आधुनिक सिद्धांत में उत्पादन साधन की पूर्ति कितनी आसानी से बढ़ाई या घटाई जा सकती है, इसका भी महत्व है। यदि किसी साधन की पूर्ति बहुत कम बदल सकती है, तो उसकी आय का बड़ा भाग आर्थिक लगान हो सकता है।
लगान केवल भूमि की विशेषता नहीं
आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार लगान किसी भी ऐसे उत्पादन साधन को मिल सकता है जिसकी आय उसकी अवसर लागत से अधिक हो।
रिकार्डो और आधुनिक लगान सिद्धांत में अंतर
क्षेत्र
- रिकार्डो का सिद्धांत मुख्य रूप से भूमि पर लागू होता है।
- आधुनिक सिद्धांत सभी उत्पादन साधनों पर लागू होता है।
लगान का आधार
- रिकार्डो के अनुसार लगान भूमि की उर्वरता और स्थिति में अंतर से उत्पन्न होता है।
- आधुनिक सिद्धांत के अनुसार लगान साधन की आय और उसकी अवसर लागत के अंतर से उत्पन्न होता है।
भूमि की विशेषता
- रिकार्डो ने भूमि की प्राकृतिक शक्तियों को विशेष महत्व दिया।
- आधुनिक सिद्धांत में उत्पादन साधनों की पूर्ति और उनके वैकल्पिक उपयोग को अधिक महत्व दिया जाता है।
अवसर लागत
- रिकार्डो के सिद्धांत में अवसर लागत की स्पष्ट भूमिका नहीं है।
- आधुनिक सिद्धांत में अवसर लागत लगान की अवधारणा का मुख्य आधार है।
स्थिर और परिवर्तनशील पूर्ति
- रिकार्डो ने भूमि की सीमित मात्रा और उर्वरता के अंतर पर अधिक जोर दिया।
- आधुनिक सिद्धांत में साधन की पूर्ति की लोच को महत्वपूर्ण माना जाता है।
दोनों सिद्धांतों में समानता
दोनों सिद्धांतों का उद्देश्य उत्पादन के साधन को मिलने वाली अतिरिक्त आय को समझाना है। दोनों में यह माना जाता है कि जब किसी साधन की सेवाओं की माँग बढ़ती है और उसकी उपलब्धता सीमित होती है, तो उसकी आय बढ़ सकती है।
रिकार्डो का सिद्धांत आधुनिक लगान सिद्धांत के विकास का एक महत्वपूर्ण आधार भी माना जाता है। आधुनिक सिद्धांत ने रिकार्डो की अवधारणा को अधिक व्यापक बनाकर उसे भूमि के साथ अन्य उत्पादन साधनों पर भी लागू किया।
निष्कर्ष
अंत में कहा जा सकता है कि रिकार्डो का लगान सिद्धांत मुख्य रूप से भूमि की उर्वरता और स्थिति में अंतर तथा भूमि की सीमितता पर आधारित है। इसके विपरीत आधुनिक लगान सिद्धांत अधिक व्यापक है और अवसर लागत तथा साधनों की पूर्ति को आधार बनाकर आर्थिक लगान की व्याख्या करता है। रिकार्डो ने लगान को मुख्य रूप से भूमि से जोड़ा, जबकि आधुनिक अर्थशास्त्र में लगान को किसी भी उत्पादन साधन की ऐसी अतिरिक्त आय माना जाता है जो उसकी अवसर लागत से अधिक हो। इस प्रकार आधुनिक लगान सिद्धांत रिकार्डो के विचारों को व्यापक रूप देता है।
दोस्तों, मेरा नाम दिनेश सिंह है। मैं CHILWAL EDUCATION वेबसाइट का Owner और Content Writer हूँ। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (UOU) के विद्यार्थियों के लिए हल प्रश्न-पत्र, स्टडी नोट्स, महत्वपूर्ण प्रश्न, MCQs और परीक्षा से जुड़ी उपयोगी अध्ययन सामग्री साझा करता हूँ। मेरा उद्देश्य विद्यार्थियों तक सरल, सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहुँचाना है, ताकि उनकी परीक्षा की तैयारी आसान हो सके। इसके अलावा मेरा एक YouTube Channel भी है, जिसका नाम CHILWAL EDUCATION है, जहाँ मैं UOU से जुड़ी नई अपडेट्स और पढ़ाई से संबंधित उपयोगी वीडियो नियमित रूप से साझा करता हूँ।

